कैसे 'धक्का पाकर' हिमाचल के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे जयराम ठाकुर?

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इमेज कैप्शन, हिमाचल में बीजेपी की जीत के बाद पार्टी नेता मोदी और अमित शाह से मुलाकात करते हुए
    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जयराम ठाकुर हिमाचल प्रदेश के तेरहवें मुख्यमंत्री के रूप में बुधवार सुबह शपथ लेने जा रहे हैं. वो डॉक्टर यशवंत सिंह परमार, रामलाल ठाकुर, वीरभद्र सिंह, शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल के बाद सीएम की कुर्सी पर बैठने वाले छठे राजनेता हैं.

जयराम ठाकुर जिस मंडी जिले की सिराज सीट से चुनकर विधानसभा में पहुंचे हैं, वहां से पहले भी कई दिग्गज नेता मुख्यमंत्री पद के करीब आते-आते रह चुके हैं. इस जिले में 10 विधानसभा सीटें हैं और सीटों के हिसाब से यह हिमाचल का दूसरा सबसे बड़ा जिला है.

जयराम ठाकुर

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ऐसे हुआ राजनीति में प्रवेश

जयराम ठाकुर का जन्म मंडी के तांदी गांव के एक आम परिवार में 6 जनवरी 1965 को हुआ था. उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत कॉलेज से हुई थी, जहां वह एबीवीपी के सदस्य बने और 1984 में पहली बार क्लास रिप्रेजेंटेटिव चुने गए.

इसके बाद जयराम ठाकुर का संगठन से जुड़ाव बना रहा और 1986 में उन्हें एबीपीवी की स्टेट यूनिट का संयुक्त सचिव बनाया गया. 1983 से लेकर 1993 तक वह विद्यार्थी परिषद की जम्मू और कश्मीर इकाई के संगठन सचिव रहे.

1993 में वह भारतीय जनता युवा मोर्चा में आए और पहले प्रदेश सचिव बने फिर प्रदेशाध्यक्ष. 1993 में ही उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखा और मंडी की चच्योट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा. पहले चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा.

खास बात यह है कि उनकी पत्नी डॉक्टर साधना मूलत: कर्नाटक की हैं मगर उनके बचपन में ही परिवार जयपुर आ गया था. मेडिकल की पढ़ाई के दौरान विद्यार्थी परिषद से जुड़ी हुई थीं और यहीं दोनों एक दूसरे के संपर्क में आए थे.

बाद में जयराम सक्रिय राजनीति में व्यस्त हो गए और डॉक्टर साधना मेडिकल कैंप, ब्लड डोनेशन कैंप और महिला सशक्तीकरण जैसे कार्यक्रमों से जुड़ी रहीं.

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पांच बार से लगातार जीत

इस बीच 1998 के विधानसभा चुनाव में जयराम ठाकुर फिर चच्योट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े और इस बात जीत हासिल की. इसी बात डॉक्टर साधना और जयराम ठाकुर ने शादी करने का फैसला किया.

बहरहाल, इस बीच चच्योट सीट पुनर्सीमांकन के बाद सिराज सीट में बदल गई मगर यहां से भी जयराम की जीत का सिलसिला जारी रहा. साथ ही वह पार्टी में विभिन जिम्मेदारियों भी संभालते रहे.

साल 200 से लेकर 2003 तक वह मंडी जिला के भाजपा अध्यक्ष रहे, 2003 में उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया और 2006 में प्रदेशाध्यक्ष बन गए. यह वह दौर था जब प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल समर्थक गुटों में बंटी हुई थी. इस दौरान जयराम ठाकुर ने इस गुटबाजी को खत्म करने में काफी हद तक कामयाबी पाई. उन्हीं के प्रदेशाध्यक्ष रहते हुए 2007 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी सरकार बनाने में सफल हुई थी. धूमल मुख्यमंत्री बने थे और जयराम ठाकुर पंचायती राज मंत्री.

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पहले से ही दौड़ में न होकर भी थे दौड़ में

2012 में जयराम चौथी बार सिराज से विधायक चुने गए मगर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी. वहीं इस बार यानी 2017 के चुनाव प्रचार के दौरान जब अमित शाह उनके चुनाव क्षेत्र में जनसभा को संबोधित कर रहे थे, तब उन्होंने कहा था कि धूमल मुख्यमंत्री बनेंगे और जयराम ठाकुर को सरकार में सबसे ऊंचा पद दिया जाएगा.

इसके बाद अपने इलाके में प्रचार के दौरान जयराम ठाकुर खुद को अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, सीएम की दौड़ में शामिल जता रहे थे. दरअसल एक कार्यक्रम में उन्होंने लोगों से कहा कि मैं आपके आशीर्वाद से सभी पदों पर रहा. इस बीच लोगों ने कहा कि अब वे उन्हें सीएम देखना चाहते हैं. तो जयराम ने कहा था- "तो थोड़ा सा धक्का और दीजिए, हालांकि इसे पार्टी तय करेगी."

मगर शायद ही जयराम ठाकुर को उस वक्त क्या पता होगा कि वह वाकई इस बार सीएम बन जाएंगे. बीजेपी के सीएम कैंडिडेट प्रेम कुमार धूमल जब खुद चुनाव हार गए तो चुने गए विधायकों मे से किसी चेहरे की तलाश होने लगी. ऐसे में जयराम ठाकुर सबसे आगे खड़े नजर आए.

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क्या हैं चुनौतियां?

प्रदेशाध्यक्ष के तौर पर कार्यकाल, लगातार पांचवीं बार जीतना और 10 में से नौ सीटें देने वाले मंडी जिले से होना उनके पक्ष में रहा. साथ ही बीजेपी यह संदेश भी देना चाहती थी कि हमने एक आम कार्यकर्ता को सीएम बनाया है जो मजदूर का बेटा है और गरीब पृष्ठभूमि से आता है.

आज शपथ लेने के बाद जयराम ठाकुर को ताज तो मिल जाएगा लेकिन ये ताज कांटों भरा होगा. हिमाचल पर लगभग 45 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है. बीजेपी खुद ही प्रदेश में बढ़ते अपराध और बिगड़ती कानून व्यवस्था से लेकर बेरोज़गारी और सरकारी भर्तियों में अपरादर्शिता को मुद्दा बनाती रही है. नए मुख्यमंत्री पर अपने वादों को पूरा करने के साथ-साथ असंतोष को दूर करते हुए पार्टी को एकजुट रखने की भी चुनौती होगी.

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