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मुझे तो लोग डायन कहते थे: गुलाबो सपेरा
- Author, सुमिरन प्रीत कौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, जयपुर से
राजस्थान की गुलाबो सपेरा को पैदा होते ही मारने की कोशिश की गई. किसी तरह बचीं तो पाँच साल की उम्र में उनकी शादी भी तय हो गई. एक हादसे में पैर टूट गया तो सगाई भी टूट गई.
आज गुलाबो सपेरा ऐसा नाचती हैं कि दुनिया भर में परफ़ॉर्म कर चुकी हैं और लोग इनका डांस सीखने दुनिया भर से आते हैं. इनके डांस की धमक रेगिस्तान से परदेस तक फैली है.
'पैदा होते ही ज़मीन में गाड़ दिया'
जयपुर में रह रही गुलाबो का सफ़र कोई आम सफ़र नहीं. 45 साल की गुलाबो सपेरा जब पैदा हुईं तो दाई ने उन्हें ज़मीन में गाड़ने की कोशिश की.
इस बात का कारण पूछने पर गुलाबो ने बीबीसी को बताया, "हम घुमंतू समुदाय के हैं इसलिए लड़की पैदा होना अच्छी बात नहीं मानी जाती. उसको पालने पर ख़र्च को भी फालतू माना जाता है. उसकी सुरक्षा को लेकर भी चिंता रहती है. इसलिए बेटी के जन्म के बाद समाज के लोग बेटी को पैदा होते ही ज़मीन में गाड़ देते थे. ताकि बच्चा धीरे- धीरे मर जाए. कभी-कभी गड्ढा खोद कर उसपर घास डाल के उसे मरने के लिए छोड़ देते थे. लेकिन जब मेरे साथ ऐसा हुआ तो मेरी मां जाकर मुझे उस खड्डे से निकाल लाई."
गुलाबो कहती हैं कि उनके पिताजी और माताजी का इन सब चीज़ों में विश्वास नहीं था. रात को इनकी मां और मौसी उन्हें बचा ले आए. ये बात इनके समाज को पसंद नहीं आई.
गुलाबो के पिता सपेरा थे. लड़की को कोई नुकसान ना हो इसलिए वो गुलाबो को अपने साथ ले जाते. पिता बीन बजाते और गुलाबो सांप के साथ नाचतीं.
गुलाबो बताती हैं, "मेरा बचपन भाई-बहन के बीच नहीं, सांपों के साथ बीता. मुझे तो लोग डायन कहते क्योंकि गाड़ने के बाद मैं ज़िंदा निकली और थोड़ी बड़ी हुई तो नाचती रहती."
पाँच साल की उम्र में इनकी सगाई हो गई. एक हादसे में टाँग टूट गई तो सगाई भी टूट गई. इस बात से खुश नन्हीं गुलाबो फिर पिता के साथ जाती और नाचती. नाचते-नाचते पूरा पीछे मुड़ जाती और सब देखकर हैरान होते.
गुलाबो ने बताया, "हम गाँव के बाहर जंगलों में रहते थे. हमें गाँव वाले आने ही नहीं देते जब तक कोई काम ना होता. हम साँप का ज़हर निकालते या बीन बजाकर सांपों को नचाते और लोग पैसा या अनाज देते."
जब पद्मश्री मिला
अस्सी के दशक में एक मेले में किसी ने इनको नाचते हुए देखा और इनका लचीलापन देखकर बहुत प्रभावित हुए और इन्हें एक कार्यक्रम करने को कहा. उसके बाद गुलाबो की दुनिया ही बदल गई.
वो लंदन से लेकर अमरीका तक में परफ़ॉर्म कर चुकी हैं. अस्सी के दशक में महारानी एलिज़ाबेथ के सामने अल्बर्ट हॉल में परफ़ार्म कर चुकी हैं. 165 देशों ने उनका कमाल देखा है.
2016 में इन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया. गुलाबो ने बताया, "सपेरा डांस की शुरुआत मुझसे ही हुई. मुझसे पहले ऐसा कोई नाच नहीं था. जब मुझसे पूछा गया कि इस नृत्य का नाम क्या है तो मैंने इसे 'सपेरा' नाम दिया. क्योंकि एक तो मैं बीन की आवाज़ पर नाचती हूँ, साँप की जगह, ऊपर से मैं हमारे समाज का नाम दुनिया भर में फैलाना चाहती थी."
गुलाबो कहती हैं, "मेरी कामयाबी के बाद बहुत कुछ बदला. सबसे बड़ी जीत मेरी तब हुई जब मेरी कामयाबी के बाद मेरे समाज ने लड़कियों को मारना बंद किया."
गुलाबो अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ काम कर चुकी हैं. इनका अपना एक जिप्सी बैंड है जहाँ दुनिया भर के कलाकार एक साथ एक एलबम में काम करते हैं.
हाल ही में इन पर एक फ़िल्म बनाई है. इसके निर्माता सुयोजन फ़िल्म्स की राखी ठाकुर ने कहा, "जब भी कोई किसी ऐसी भारतीय महिला की बात करता है जिसकी कहानी से लोग प्रेरित होते हैं तो इनका नाम ज़रूर आता है. इतनी कामयाबी के बाद भी वो इतनी आसानी से और सच्चाई से बात करती हैं कि उनके लिए किसी स्क्रिप्ट की ज़रूरत नहीं पड़ती."
अलग-अलग देशों से उनके शागिर्द
अब वो उस्ताद बन गई हैं और दुनिया के अलग-अलग देशों से आने वाली लड़कियां उनकी शागिर्द हैं.
गुलाबो कहती हैं, "लोगों को स्कॉलरशिप मिलती है मेरा डांस सीखने के लिए. लोग तो अपने नाम के आगे भी सपेरा लगाते हैं. कोई मरीया सपेरा कोई क्रिस्टीन सपेरा."
गुलाबो हर साल डांस वर्कशॉप के लिए यूरोप जाती हैं.
दुनिया भर में घूम चुकी गुलाबो का सपना है कि उनका एक डांस स्कूल हो जहाँ उनके समाज की और दुनियाभर की लड़कियाँ उनका नाच सीखे. गुलाबो अब एक घर बनवा रही हैं जयपुर में और एक घर उनका डेनमार्क में है. और वो ये घर अपने बच्चों को तोहफ़े में देना चाहती हैं.
गुलाबो कहती हैं, "नाच ही मेरी ज़िंदगी है. बस भगवान से ये कामना है कि मरूं तो नाचते-नाचते."