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एक पारसी पुजारी और हिन्दू लड़की की प्रेम कहानी
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अंकलेश्वर
गोरखपुर की दीपिका दुबे के लिए प्रेम की उड़ान जाति के आकाश तक ही सीमित थी. मजहब की दीवार को तोड़ना तो दूर की बात थी. पर दीपिका ने उड़ान को सीमित नहीं किया बल्कि आकाश के विस्तार और दीवार के परे प्रेम को ले जाने का फ़ैसला किया.
दीपिका और कुरुष की मुलाक़ात नोयडा के एमिटी यूनिवर्सिटी में हुई थी. दोनों ने एक दूसरे को प्रपोज नहीं किया, लेकिन प्रेम बिना प्रस्ताव के पांव जमा चुका था. कुरुष पारसी हैं. पारसी ही नहीं बल्कि वो पारसी पुजारी हैं. एक पारसी पुजारी की हिन्दू ब्राह्मण लड़की से शादी आसान नहीं थी.
प्रेम में मजहब और जाति को किनारे कर दिया जाता है, लेकिन जब शादी की बात आती है तो मामला माता-पिता तक पहुंचता है. प्रेम जब तक व्यक्तिगत होता है तब तक पाबंदी काम नहीं आती, लेकिन जब सार्वजनिक होता है तो उसकी जाति और मजहब सिर उठाने लगते हैं. कुरुष और दीपिका के साथ भी ऐसा ही हुआ.
दीपिका कहती हैं, ''मुझे नहीं लगता कि प्रेम में पाबंदियों को तोड़ना कोई मुश्किल काम है. या आप कह सकते हैं कि हम इस रिश्ते को लेकर आर-पार के मूड में थे.''
कुरुष कहते हैं कि जब वो दीपिका के साथ रिलेशन में आए तो एक साल तक काफ़ी ऊहापोह की स्थिति रही कि आगे बढ़ना चाहिए या नहीं. कुरुष कहते हैं, ''हम ऊहापोह के कारण रुके नहीं. अंदर से लगता था कि हम दोनों माता-पिता को समझा लेंगे.''
2010 में दीपिका एमिटी से एमबीए के बाद बेंगलुरु जॉब करने चली गईं और कुरुष अपने होमटाउन गुजरात के अंकलेश्वर चले आए. दोनों 2015 तक अलग रहकर भी साथ रहे. आख़िरकार ये दूरियां 2015 के जनवरी महीने में सिमट गई और इन्होंने शादी कर ली.
इस शादी में जितनी मुश्किलें दीपिका के लिए थीं उससे कम कुरुष के लिए भी नहीं थीं. पारसी लड़के या लड़कियों के लिए ग़ैर-पारसी से शादी करना किसी जंग से कम नहीं है. अगर कोई पारसी लड़का किसी हिन्दू या मुस्लिम लड़की से शादी करता है तो उसकी पत्नी कभी पारसी नहीं हो पाती है.
वो लड़की पारसी पति की पत्नी होकर भी हिन्दू या मुस्लिम ही रहेगी. मतलब जीवन के सारे रस्मो-रिवाज उसके मूल मजहब से ही तय होंगे. दीपिका के लिए भी ऐसा ही है.
दीपिका के पति पारसी पुजारी हैं, लेकिन वो पारसी मंदिर में नहीं जा सकती हैं. दीपिका जब कुरुष के साथ मंदिर जाती हैं तो वो मंदिर के बाहर ही रहती हैं.
आख़िर इतनी पाबंदियों के रहते हुए कुरुष ने इस प्रेम को अंजाम तक कैसे पहुंचाया? कुरुष कहते हैं, ''निजी तौर पर मैं मानवता में भरोसा करता हूं. मेरे लिए धर्म बाद में आता है. हम दोनों में प्रेम मानवता की बुनियाद पर ही है, इसलिए धर्म आड़े नहीं आया.'' दीपिका बताती हैं कि उनके लिए यह प्रेम आसान था लेकिन विवाह काफ़ी मुश्किल था.
वो कहती हैं, ''मेरे घर वाले तो अंतर्जातीय विवाह को लेकर ही बचपन से ख़िलाफ़ थे. दूसरे धर्म के लड़के से शादी के लिए सोचना ही पाप था. मुझे इस शादी की मुश्किलों को लेकर पता था, लेकिन जब मैंने फ़ैसला कर लिया तो पीछे हटने का सवाल ही नहीं था. मेरे लिए बड़ी बात ये थी कि पार्टनर अच्छा होना चाहिए.''
कुरुष कहते हैं कि इस रिश्ते को लेकर दीपिका की मां सबसे ज़्यादा ख़िलाफ़ थीं. दीपिका का कहना है कि गोरखपुर की परवरिश में दूसरे धर्म के लड़के से शादी के लिए कोई सोच नहीं सकती. इस कपल के लिए प्रेम किसी प्रस्ताव से ज़्यादा प्रश्न के रूप में आया. दीपिका कहती हैं कि दोनों दोस्ती के दौरान ही मज़ाक में बात करते थे कि दोस्ती ने करवट बदली तो क्या होगा?
आख़िर इतनी मुश्किलों के बीच यह प्रेम पूरा कैसे हुआ? कुरुष कहते हैं, ''दीपिका के माता-पिता हां-ना के बीच अंकलेश्वर आए. उनकी मुलाक़ात मुझसे हुई और घर पर आए तो थोड़ा कन्वेंस हुए. उन्हें लगा कि हम दोनों इस रिश्ते से बहुत ख़ुश हैं और उन्हें भला ये ख़ुशी कैसे बर्दाश्त नहीं होती.
तो दीपिका अभी क्या हैं? पारसी हैं या हिन्दू? कुरुष और दीपिका एक स्वर में कहते हैं कि एक मनुष्य. दीपिका ने प्रेम मजहब और जाति की उपेक्षा की तो उनकी छोटी बहन को भी प्रेम का यह आइडिया रास आया. उनकी छोटी बहन ने एक तमिल से शादी की.
कुरुष और दीपिका कहते हैं, ''आज की तारीख़ में हमलोग के माता-पिता काफ़ी ख़ुश हैं.'' पारसी बीफ़ भी खाते हैं. क्या दीपिका को खान-पान और रहन-सहन में एक पारसी के घर में सामंजस्य बैठाना पड़ा?
दीपिका कहती हैं, ''किसी ने किसी भी चीज़ के लिए दबाव नहीं बनाया. मैं अब भी शाकाहारी हूं. जो मुझे खाने में पसंद है उसे खाती हूं. सच तो यह है कि प्रेम में परिवेश और प्रथा का कोई टकराव नहीं होता. यहां स्वीकार्य की भावना सबसे ऊपर होती है. और वैसे भी पारसी बहुत लविंग होते हैं.''
अगर कोई पारसी लड़की किसी ग़ैर-पारसी लड़के से शादी करती है तो उसकी संतान को भी पारसी धर्म के लिए दरवाज़ा बंद रहता है. भारत में पारसियों की घटती आबादी के लिए इनके नियमों को भी ज़िम्मेदार ठहराया जाता है.
गुजरात में पारसी
पारसियों की एक पत्रिका के मुताबिक़ गुजरात में कुल दस हज़ार पारसी हैं. गुजरात के नवसारी में सबसे ज़्यादा पारसी हैं. यहां कुल तीन हज़ार पारसी हैं. आज़ादी के पहले तक गुजरात में पारसी शराब के धंधों में लगे थे. आज़ादी के बाद जब गुजरात में शराब पर पाबंदी लगाई गई तो यहां से पारसियों का पलायन हुआ.
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