दिल्ली गैंगरेप की घटना ने भारत में क्या बदला?

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दिल्ली की एक चलती बस में 23 साल की एक फ़िज़ियोथेरपी की छात्रा के साथ हुए भयानक सामूहिक बलात्कार को पांच साल बीत चुके हैं.
इन सालों में महिलाओं के लिए क्या बदला और कितनी बेहतर हुई ज़िन्दगी. बीबीसी संवाददाता गीता पांडे जानने की कोशिश कर रही हैं कि क्या आज भारत महिलाओं के लिए सुरक्षित जगह बन पाई है.
सबसे पहले उस भयानक रात हुए अपराध की बात करते हैं- युवा महिला और उनके पुरुष दोस्त रात के साल 2012 की 16 दिसंबर की रात नौ बजे के आसपास एक बस में चढ़े.
बस के ड्राइवर और उसमें सवार पांच अन्य लोगों ने चलती बस में महिला का बलात्कार किया और उनके दोस्त को बुरी तरह पीटा. इसके बाद दोनों को नग्न अवस्था में सड़क के किनारे मरने के लिए छोड़ दिया.
रास्ते में आते-जाते लोगों ने उन्हे देखा और पुलिस को बुलाया जो उन्हें लेकर अस्पताल गई. करीब दो सप्ताह तक वो बहादुर लड़की अपनी ज़िन्दगी से लड़ती रही, लेकिन फिर गंभीर ज़ख्मों के कारण उसकी मौत हो गई. उनके दोस्त अब भी जीवित हैं और इस घटना को एक बदनुमा दाग़ मानते हैं जिसे मिटाया नहीं जा सकता.

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निर्भया दिया था नाम
ये बलात्कार इतना बर्बर था कि पूरा देश सकते में था, प्रेस ने इस लड़की को नाम दिया निर्भया- वो जो डरती नहीं.
लेकिन मैं अपनी निर्भया से इस घटना से करीब दस साल पहले मिली थी जब मैं भारत में बलात्कार के बारे में बीबीसी रेडियो के लिए एक फीचर बना रही थी.
केंद्रीय दिल्ली में एक स्वयंसेवी संगठन के द्वारा चलाए जा रहे एक आश्रय स्थल में मेरी उससे मुलाक़ात हुई थी. वो गुजरात के एक गरीब परिवार से थी और एक खानाबदोश समुदाय से थी जिनका कोई निश्चित पता नहीं होता.
ये महिला अपने पति और बच्चे के साथ देश की राजधानी आई थी. कुछ महीने दोनों ने मज़दूरी की और फिर कुछ दिन के लिए गुजरात गए.
रेलवे स्टेशन में भीड़-भाड़ और अफरातफरी में वो अपने परिवार से बिछड़ गई. वो लोग चलती ट्रेन में चढ़ गए और वो पीछे प्लेटफॉर्म पर ही छूट गई.
वो काफी देर कर प्लेटफ़ॉर्म पर बैठी रोती रही, एक उदार दिखने वाले सिख व्यक्ति ने उसकी मदद की पेशकश की. उसने बताया कि वो एक ट्रक ड्राइवर है और उसे उसके घर ले जएगा.
उसके पास पैसे नहीं थे, तो उसने सिख व्यक्ति की बात मान ली. अगले चार दिन तक उसे ट्रक में ही घुमाया जाता रहा. ट्रक ड्राइवर और तीन अन्य पुरुषों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया.
बाद में उसे मरा समझ कर वो लोग उसे सड़क किनारे फेंक कर आगे बढ़ गए. यहां किसी ने उसे देखा और उसे अस्पताल पहुंचाया गया.

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जब मैं उससे मिली तब वो कई महीनों के इलाज के बाद अस्पताल से लौटी थी. उसका शरीर किसी जंग के मैदान से कम नहीं था.
बर्बरता
उसके शरीर के अंदरूनी हिस्से बुरी तरह जख्मी थे और उसके पेट के पास से एक पाइप लगाया गया था जो एक पाउच तक जाता था. उसे इस पाइप और पाउच के साथ ही चलना पड़ रहा था. उसने मुझे अपनी छाती पर जलने के दाग़ दिखाए. उसका बलात्कार करने वालों ने जलती सिगरेट से उसके शरीर को कई जगहों पर जलाया था.
उसे कोई अंदाज़ा भी नहीं था कि उसका परिवार कहां है. स्वयंसेवी संस्था ने बताया कि उसके परिवार को ढ़ूंढ़ने की सारी कोशिशें नाकाम रही हैं.
मैंने लगभग एक घंटे तक उससे बात की. उसने मुझे अपनी आपबीती सुनाई जिसे सुनकर मैं सिहर गई. आखिर एक इंसान किसी महिला पर कितनी बर्बरता कर सकता है?
मैं सकते में थी और पहली बार मेरी ज़िंदगी में मुझे डर लग रहा था. मैंने दो बहादुर लड़कियों - अपनी बहन और अपनी सबसे अच्छी दोस्त जो मेरे साथ बीबीसी में ही काम करती हैं- उन्हें अपने डर के बारे में बताया.

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जब भी वो मुझसे मिलने आते थे मैं उनसे कहती थी कि अपने घर पहुंचने के बाद वो मुझे मैसेज ज़रूर करें.
पहले तो उन्होंने मेरा मज़ाक उड़ाया, कई बार वो मुझसे नाराज़ भी हो गए क्योंकि जब वो मुझे मैसेज करना भूल जाते थे तो मैं उन्हें फ़ोन कर हाल ख़बर लेती थी.
और फिर 16 दिसंबर 2012 की वो घटना घटी. भारतीय मीडिया ने इस बर्बर बलात्कार के बारे में जानकारी छापी और पूरे देश के सामने उसका दर्द दिखाई देने लगा और पूरा देश सिहर गया.
करीब दो सप्ताह तक निर्भया अस्पताल के उस बिस्तर में पड़ी जीवन और मौत के बीच झूलती रही- टेलीविज़न चैनल और अख़बारों ने उसके साथ और उसके मामले में जो कुछ हो रहा है सभी बातें विस्तार से पेश कीं.

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मेरी बहन और मेरी दोस्त ने अब मेरा मज़ाक उड़ाना छोड़ दिया. लेकिन इस घटना के बाद जो बदला वो सिर्फ़ ये ही नहीं था.
बड़ा बदलाव
भारत की कई जगहों पर सड़कों पर निकले लाखों प्रदर्शनकरियों की मांगों को स्वीकार करते हुए सरकार महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों से निपटने के लिए कड़े कानून बनाए.
लेकिन सबसे बड़ा जो बदलाव आया वो लोगों के नज़रिए में आया- यौन हिंसा और बलात्कार के बारे में अब लोग अपने घरों में चर्चा करने लगे थे और ये एक बड़ी बात थी ख़ास कर ऐसे देश जहां सेक्स या सेक्स अपराध पर बात करने पर लगभग पाबंदी है ये इस पर विस्तार से चर्चा की ही नहीं जाती.

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इस विषय पर बात करना ही भारत को महिला के लिए एक बेहतर जगह बनाने की पहली सीढ़ी है. ये चर्चा अब सोशल मीडिया पर छिड़ चुकी थी और देश अब देश को इस चर्चा को आगे बढ़ने के लिए नोबल पुरस्कार विजेता वीएस नायपॉल की भाषा में कहना पड़ा, "अ मिलयन म्युटिनीज़ नाउ" यानी लाखों विद्रोह.
हर घटना चाहे वो छोटी हो या बड़ी, उसके बारे में बात होती है, लिखा जाता है और महिला के सुरक्षित रहने और उसकी समानता से संबंधित बातों की जांच हो रही है. हाल के सालों में हमने ऐसे कई अभियान देखे हैं और उनके बारे में लिखा है.
ऐसा नहीं है कि पहले महिलाएं खुद से जुड़े मुद्दों पर बात नहीं करती थीं, हमारे देश में ऐसी बहादुर महिलाएं हुई हैं जो दशकों तक अपने अधिकारों के लिए लड़ती रहीं- और पितृसत्तात्मक सोच के ख़िलाफ़ लड़ी हैं.
आने वाले कुछ दिनों में हम आपके लिए ऐसी ही उन महिलाओं की कहानियां लाएंगे जो महिलाओं के लिए बेहतर, सुरक्षित और अपने लिए एक समावेशी दुनिया के लिए अथक प्रयास करती रही हैं.
सवाल ये है कि क्या ये लड़ाइयां सफल रही हैं?

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हाल में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने साल 2016 के लिए आंकड़े जारी किए जिससे जो तस्वीर सामने आती है वो बेहतर नहीं है- महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों में इजाफ़ा हुआ है.
हमारे देश में आज भी दहेज के लिए हज़ारों वधुओं की हत्या की जाती है, सैकड़ों हज़ारों महिलाओं और बच्चियों का बलात्कार होता है और घरेलू हिंसा के सैकड़ों हज़ारों मामले और कन्या भ्रूण के मामले सामने आ रहे हैं.
केवल बीते एक सप्ताह में हमने छह साल की एक बच्ची के साथ ख़ौफनाक बलात्कार और हत्या, 16 साल की कैंसर पीड़िता के बलात्कार और एक युवा बॉलीवुड अभिनेत्री के साथ फ्लाइट में यौन हिंसा की खबरें सुनने को मिली थीं.
लेकिन जो बात दिल को सुकून देता है वो ये है कि महिलाएं जुल्म के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठा रही हैं. और इसी के साथ भारत में महिलाओं के बेहतर भविष्य की हमारी उम्मीदें भी ज़िंदा है.
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