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भड़काऊ बयानबाज़ी को लेकर सतर्क हैं गुजरात के मुसलमान!
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, डबोई से
''माफ़ करना, लेकिन यहां से टोपी और दाढ़ी वाले निकल जाओ. हम डबोई को दुबई नहीं बनने देना चाहते हैं.'' पिछले दिनों एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए बीजेपी प्रत्याशी शैलेष मेहता ने यह भड़काऊ बयान दिया.
डबोई गुजरात में वड़ोदरा ज़िले का एक विधानसभा क्षेत्र है. यहां शैलेष के सामने कांग्रेस प्रत्याशी सिद्धार्थ पटेल हैं जो प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के बेटे हैं. यहां मुस्लिमों के वोट क़रीब 25 हज़ार हैं और पटेल मतदाता भी अच्छी तादाद में हैं.
मैं शनिवार शाम डबोई पहुंचा तो शहर की मुख्य सड़क के बगल में बीजेपी कार्यकर्ता एक पंडाल में जमा थे और शैलेष मेहता का इंतज़ार कर रहे थे जो अभिनेता से नेता बने परेश रावल के साथ इलाक़े में चुनाव प्रचार करने गए थे.
मैं पास की ही एक दुकान पर गया. कुछ देर वहाँ बैठा तो समझ में आ गया कि यह दुकान किसी मुसलमान की है. दुकान पर पिता-पुत्र थे. मैंने उनसे पूछा कि ये टोपी और दाढ़ी वाला वाक़या क्या है? हिन्दी में पूछा तो वे थोड़ा आश्वस्त हुए कि मैं स्थानीय नहीं हूं. उनके बेटे ने कुछ बोलना चाहा तो उन्होंने उसे डांटकर चुप करा दिया.
मैंने सोचा कि जो बोल रहे हैं उसे रिकॉर्ड कर लूं, लेकिन उन्होंने मोबाइल देखते ही इसे जेब में रखने को कहा. वो इतना डरे हुए थे कि दो शब्द बोलने के बाद अगल-बगल झांकने लगते थे. उन्होंने कहा कि आप यहां से चले जाइए, मेरे लिए मुश्किल हो जाएगी. बस एक बात उन्होंने बताई कि बीजेपी को शायद इस बात का डर है कि मुसलमान और पटेल साथ हैं और शैलेष मेहता कहीं हार न जाएं.
दाढ़ी-टोपी वाले भाषण पर मैंने शैलेष मेहता की भी राय जाननी चाही. शुक्रवार की रात उनसे फ़ोन पर हुई बातचीत में पहले तो उन्होंने कहा कि मामला हफ्ते भर पुराना है और फिर मिलकर बात करने के लिए मुझे डबोई बुलाया.
उनसे मिलने के इरादे से ही मैं शनिवार दोपहर डबोई पहुंचा. मैंने शैलेष मेहता को फ़ोन किया तो उन्होंने कहा कि परेश भाई के साथ प्रचार कर रहा हूं और अभी उनके पास टाइम नहीं है. इसके बाद भी मैंने प्रयास किया, लेकिन शैलेष मेहता से आमने-सामने बात नहीं हो पाई, लिहाजा दाढ़ी-टोपी पर शैलेष से सवाल-जवाब नहीं हो सके.
ख़ैर, सिद्धार्थ पटेल से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग से शिकायत कर दी है, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है. सिद्धार्थ ने आरोप लगाया कि हार के डर के कारण बीजेपी सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रही है.
कांग्रेस ने इस बार 182 विधानसभा सीटों वाले गुजरात विधानसभा चुनाव में 6 मुसलमानों को टिकट दिया है, दूसरी ओर बीजेपी ने पिछली बार की तरह इस बार भी किसी मुसलमान पर दांव नहीं खेला है. दिलचस्प है कि 1980 के बाद से अब तक बीजेपी ने सिर्फ़ 1998 में ही एक मुसलमान को टिकट दिया था.
प्रदेश में चुनावी कैंपेन में एक बात जो देखने को मिल रही है वो ये कि मुसलमान वोटर्स तकरीबन ख़ामोश है और भड़काऊ बयानबाज़ी को लेकर सतर्क भी.
वडोदरा के सोशल एक्टिविस्ट ज़ुबैर गोपलानी ने बीबीसी से कहा, ''गुजरात 2002 के बाद काफ़ी बदल चुका है. 2002 तक बड़ी तादाद में ऐसे संपन्न मुसलमान थे जिन्हें मुसलमानों की बस्ती में रहना या आना नापसंद था. लेकिन 2002 के बाद आज की तारीख़ में वही लोग इन बस्तियों में रह रहे हैं.''
ज़ुबैर गोपलानी ने कहा कि इस तरह की बयानबाज़ी धर्म के नाम पर गोलबंदी करने के लिए होती है, लेकिन इस बार मुसलमान सतर्क हैं.
उन्होंने कहा, ''मंडावी में कुछ महीने पहले ब्राह्मणों ने शहर में परशुराम जयंती के दिन हवन करने की योजना बनाई. वो इलाक़ा थोड़ा संवेदनशील है और पुलिस ने मना कर दिया. हमलोग सामने आए और कहा कि हवन से मुसलमानों को कोई आपत्ति नहीं है. हम अड़ते तो ये मुद्दा बन सकता था."
लेकिन हकीकत ये भी है कि पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जमालपुर-खेड़िया जैसी विधानसभा सीट पर भी जीत दर्ज की थी, जहां 61 फ़ीसदी मुसलमान हैं. आख़िर ऐसा कैसे हो गया था?
ज़ुबैर गोपलानी जवाब देते हैं, ''ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बीजेपी ने कई निर्दलीय मुसलमानों को खड़ा करा दिया था और वोट बंट गए थे. इस बार ऐसा नहीं हुआ है.''
गुजरात सियासत के संपादक अब्दुल हाफ़िज़ लखानी कहते हैं, "इस बार लगा था कि कांग्रेस अपनी रणनीति पर ठीक से आगे बढ़ रही है, लेकिन अब लगता है कि कांग्रेस का भी पूरा ध्यान हिन्दू वोटों पर ही है.''
लखानी ने कहा, ''कांग्रेस को लगता है कि मुसलमान आख़िर कहां जाएंगे? इसलिए राहुल गांधी का भी पूरा ध्यान अल्पेश, जिग्नेश और हार्दिक के समीकरणों पर है.''
लखानी कहते हैं, ''बीजेपी के एजेंडे में ही मुसलमान नहीं होता है. अच्छा होता कि बीजेपी अपने एजेंडे में मुसलमानों को भी शामिल करती. अगर ऐसा होता तो मुसलमानों के पास विकल्प होता, न कि कांग्रेस उनकी मजबूरी.''
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