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नज़रिया: क्या अदालतें भी 'लव जिहाद' कहनेवालों का पक्ष ले रही हैं?
- Author, फ्लेविया एग्नेस
- पदनाम, स्त्रीवादी क़ानूनी विद्वान और महिला अधिकार वकील
भारत उस राजनीतिक विवाद में उलझ गया है जो दो वयस्कों हदिया और शफ़ीन की निजी जिंदगी से जुड़ा है जिसमें उन्होंने आपसी सहमति से अंतरजातीय विवाह किया था.
यह शादी शायद महानगरों में होने वाली अन्य शादियों की तरह ही होती, लेकिन वास्तविकता यह है कि हिंदू कट्टरपंथी, एक हिंदू लड़की के साथ मुस्लिम लड़के के अंतरजातीय विवाह को 'लव जिहाद' के रूप में पेश कर रहे हैं.
मुसलमानों के अपने एक मात्र उद्देश्य धर्म परिवर्तन के लिए हिंदू महिलाओं को लुभाने की सावधानी से तैयार की गई कथित राजनीतिक चाल को 'लव जिहाद' का नाम दिया गया है.
इसके नाम पर हो रहे बवाल ने हाल के दिनों में भारतीय युवाओं के जीवन में मुश्किलें पैदा की हैं.
महिला के अधिकार को नकारा गया
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. भारतीय संविधान अपने सभी वयस्क नागरिकों को अपने पसंद के धर्म को मानने का अधिकार प्रदान करता है. यहां धर्म परिवर्तन के साथ या इसके बिना भी अंतरजातीय विवाह को मान्यता दी गई है.
एक-दूसरे की सहमति से दो वयस्कों के अनुबंधित विवाह को एक पक्ष या दोनों की सहमति से ही समाप्त किया जा सकता है, किसी तीसरे पक्ष की आपत्ति पर नहीं. इसके बावजूद इस मूलभूत अधिकार को मौजूदा विवाद में नकार दिया गया.
इस विवाद की उपज केरल राज्य में हुई जहां 2016 के विधानसभा चुनाव में दक्षिणपंथी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी ज़मीन मजबूत बनाने में लगी थी.
इस राज्य में मुस्लिमों की अच्छी आबादी है. यह उन कुछ राज्यों में से है जहां मुसलमानों की एक राजनीतिक पहचान अब भी बरकरार है. हालांकि बड़ी संख्या में होने के बावजूद कई राज्यों में वो अपनी ज़मीन खो रहे हैं.
राज्य से मुस्लिम युवाओं की कट्टरता से जुड़ी ख़बरें आती रही हैं. इन ख़बरों ने हदिया और शफ़ीन की शादी पर विवाद खड़ा करने में बड़ा किरदार निभाया.
क्या है पूरा मामला?
24 साल की हदिया का जन्म हिंदू परिवार में हुआ और जनवरी 2016 में उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया और अपना नाम अखिला से बदल कर हदिया रख लिया. तब से उनके पिता यह साबित करने के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं कि हदिया का धर्मपरिवर्तन उनकी अपनी इच्छा से नहीं बल्कि "बहला-फुसला" कर किया गया है.
केरल हाई कोर्ट में पिता की हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) यानी सशरीर उपस्थित होने का आदेश देने की याचिका पर हदिया उपस्थित हुईं और उन्होंने अदालत को बताया कि उन्होंने अपनी मर्जी से शादी की है. इसके बावजूद, मई 2017 में केरल हाईकोर्ट ने उनकी शादी को शर्मनाक करार देते हुए रद्द कर दिया. कोर्ट ने हदिया को "कमज़ोर और प्रभावित किए जाने योग्य " बताते हुए और उनके स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार को दरकिनार करते हुए उसके माता-पिता के हवाले कर दिया.
शफ़ीन ने केरल हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जिसने एक वयस्क की निजी जिंदगी में अदालती दखल और उसके अधिकार क्षेत्र पर एक बहस छेड़ दी. हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने शादी रद्द करने के प्राथमिक मुद्दे पर सुनवाई की बजाय इसकी जांच एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) को सौंप दी जिसने एक और विवाद को जन्म दिया.
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने यहां हाईकोर्ट की उस बात पर ध्यान दिया कि कट्टरपंथियों ने हिंदू लड़की का जबरन धर्म परिवर्तन कराया.
कोर्ट ने उनके वकील की हदिया से पूछताछ की याचिका को ख़ारिज कर दिया और हदिया अपने माता-पिता के घर में कैद रहीं. आखिरकार जब 27 नवंबर 2017 को मामले की सुनवाई हुई तो हदिया को उपस्थित होने के लिए कहा गया. हालांकि दो घंटे की सुनवाई के बाद कोर्ट ने उनके अधिकारों को स्वीकार कर लिया.
जब हदिया ने कहा कि उनके पिता की जगह उनके पति को क़ानूनी अभिभावक के तौर पर नियुक्त किया जाना चाहिए जिसकी निगरानी से केरल हाईकोर्ट ने हदिया को उसके पिता को सौंप दिया था, तो इस पर इस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीशों में से एक न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, "नहीं, पति अपनी पत्नी के अभिभावक नहीं हो सकते."
उन्होंने तब हदिया के मामले की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल को उन्हें यह समझाने के लिए कहा कि पत्नी कोई ग़ुलाम नहीं होती, उसकी समाज में अपनी ख़ुद की एक हैसियत होती है.
महिला अधिकारों पर कोर्ट का यह रुख क्यों?
हालांकि, उस दिन कोर्ट में यह दिखा कि सर्वोच्च न्यायालय भी अपने माता-पिता के ख़िलाफ़ अपनी इच्छा से शादी करने वाली महिलाओं की आज़ादी और स्वायत्तता को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नहीं है.
पति-पत्नी के अधिकार का बचाव करने वाले वकील का दावा है कि यह एक प्रकार की जीत थी क्योंकि उस दिन वो हदिया की आज़ादी बहाल करना चाहते थे और पिछले कई महीनों से अपने माता-पिता की कैद से उन्हें आज़ाद करना चाहते थे.
एक औरत ग़ुलाम नहीं है कोर्ट का यह साधारण तर्क देना मामले को टालमटोल करने जैसा लगता है.
सभी की नज़र में यह स्पष्ट रूप से लिंगभेद जैसा था. हालांकि सर्वोच्च न्यायालय एक वयस्क महिला के अधिकारों की स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को कम करने में अपनी भूमिका को देखने में विफल रहा.
कोर्ट हदिया को उसका अधिकार देने की दुविधा में पड़ा था, जो अपने अधिकार को लेकर खुद को अदालत में पेश करने केरल से पहुंची थीं.
महिला अधिकार की अनदेखी क्यों?
यह आश्चर्यजनक है कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को लैंगिक मतभेद के रूप में और विवाह से जुड़े महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की अनदेखी को देखने में विफल रहा. उस दिन हदिया कोर्ट में "कमज़ोर और प्रभावित किए जाने योग्य" नहीं बल्कि पिछले कई महीनों से परिवार, मीडिया और न्यायपालिका से जूझती मज़बूत हदिया के रूप में नज़र आईं. उन्होंने साफ़ लहज़े में कहा कि वो आज़ादी चाहती हैं, वो अपने धर्म में बनी रहना चाहती हैं और पढ़ाई पूरी करना चाहती हैं.
कुछ महीने पहले, तीन तलाक़ के विवाद के दौरान मीडिया इस तथ्य पर दुखी हो रहा था कि एक मुस्लिम महिला को उसके अधिकार से वंचित रखा जाता है और वो कथित तौर पर पुरुषप्रधान मुस्लिमों की सताई हैं.
इस मामले में एक हिंदू महिला पीड़ित है जिसका आसानी से ब्रेनवाश किया जा सकता है. हिंदू महिलाओं का मुस्लिम पुरुष से शादी करना "लव जिहाद" बताना यह दर्शाता है कि हिंदू महिलाएं बुद्धिमान विकल्प नहीं चुनतीं.
इसके अलावा, चूंकि महिलाएं उनके लिए क्या अच्छा है - यह तय करने में सक्षम नहीं है, इसलिए उनके पिता को उनके फ़ैसले करने चाहिए और बिना पिता की सहमति के शादी मान्य नहीं होनी चाहिए.
चुनाव के दौरान कई राज्यों में आरएसएस और अन्य दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों ने 'लव जिहाद' के हौआ को बखूबी इस्तेमाल किया. इस विवाद में परेशान करने वाली बात यह है कि हमारे न्यायालय भी दक्षिणपंथी हिंदुओं की इस शब्दावली का समर्थन करते नज़र आते हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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