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SC में अयोध्या मामला, जानिए पाँच ज़रूरी बातें
बुधवार को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने को 25 बरस पूरे हो जाएंगे. लेकिन इससे ठीक एक दिन पहले देश की सबसे बड़ी अदालत में ये बेहद ज़रूरी मामला पहुंच रहा है.
पाँच दिसंबर से सुप्रीम कोर्ट में जिस मामले की सुनवाई शुरू हो रही है उसमें किस बात का फ़ैसला होना है?
बाबरी मस्जिद विध्वंस के 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं, अब सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या से जुड़े एक अहम मुकदमे की सुनवाई दैनिक स्तर पर शुरू हो रही है, जानिए ज़रूरी बातें.
1. यह मुकदमा इस बारे में है कि जहाँ आरएसएस और उससे जुड़े संगठन राम मंदिर बनाना चाहते हैं उस ज़मीन पर मालिकाना हक़ किसका है.
इसे टाइटल सूट कहा जाता है, इस मुक़दमे की शुरूआत 1949 में हुई थी जब 16वीं सदी में बनाई गई बाबरी मस्जिद में मूर्तियाँ रखी गईं थीं जिसके बाद विवाद खड़ा हो गया था और स्थानीय प्रशासन ने परिसर को सील कर दिया था.
2. इस मामले में तीन पक्ष हैं, रामजन्मभूमि मंदिर न्यास, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ़ बोर्ड. अयोध्या के रामकोट इलाक़े की 2.77 एकड़ ज़मीन को लेकर विवाद है जिसमें वो हिस्सा भी शामिल है जहाँ छह दिसंबर तक बाबरी मस्जिद थी.
केंद्र सरकार ने मस्जिद में रखी गई मूर्तियों को हटाने पर विचार शुरू किया था कि गोपाल सिंह विशारद ने एक याचिका दायर की जिस पर स्थानीय अदालत ने मूर्तियों को हटाने पर रोक लगा दी.
इसके बाद 1955 में महंत रामचंद्र परमहंस ने, 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने और 1961 में सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने याचिका दायर की. आगे चलकर ऐसे सभी मुकदमों को एक मुकदमा बना दिया गया.
3. सितंबर 2010 में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने इस मामले में फ़ैसला सुनाते हुए 2.77 एकड़ ज़मीन तीनों पक्षों--मंदिर न्यास, वक्फ़ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े--के बीच बाँट दी, लेकिन ये फ़ैसला पक्षों को मंज़ूर नहीं हुआ, हिंदू महासभा और सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने इस फ़ैसले को चुनौती दी.
मामला सुप्रीम कोर्ट में आया. अब सुप्रीम कोर्ट ने दैनिक स्तर पर इसकी सुनवाई करने का फ़ैसला किया है.
4. इस मामले का बाबरी मस्जिद विध्वंस से कोई सीधा संबंध नहीं है, वो एक अलग मामला है. बाबरी मस्जिद विध्वंस की जाँच करने वाले जस्टिस लिब्रहान आयोग ने तफ़्तीश के बाद 2009 में अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें बताया गया कि मस्जिद को एक गहरी साज़िश के तहत गिराया गया था.
इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती सहित कई लोगों के ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश का मुकदमा दर्ज किया गया.
5. साज़िश वाला मुकदमा अपनी गति से चल रहा है, जबकि ज़मीन के मालिकाना हक़ का मामला अब रोज़-ब-रोज़ सुना जाएगा.
जस्टिस लिब्रहान ने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में कहा था कि आपराधिक साज़िश के मामले का फ़ैसला पहले होना चाहिए क्योंकि मालिकाना हक़ का फ़ैसला पहले होने पर आपराधिक मामला प्रभावित होगा, लेकिन फ़िलहाल ऐसा लग रहा है कि ज़मीन के मालिकाना हक़ के मामले का फ़ैसला पहले हो जाएगा.
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