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नज़रिया: 'गुजरात में बीजेपी कहीं नहीं, हैं तो सिर्फ़ मोदी'
जैसे-जैसे गुजरात में विधानसभा चुनाव की तारीख़ नज़दीक आ रही हैं, कांग्रेस-बीजेपी के शब्दबाण और तीखे होते जा रहे हैं. इस बात पर भी बहस तेज़ हो रही है कि गुजरात बीते दो दशकों से वहां का शासन संभाल रही पार्टी को फिर चुनेगा या इस बार बदलाव का रुख करेगा.
गुजरात में एक ओर सत्तारूढ़ बीजेपी से कथित तौर पर नाराज़ दलितों और पाटीदारों की मांगों को लेकर उभरे नए नेताओं को मिल रहा जनसमर्थन देखते ही बनता है, तो दूसरी ओर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी एक नए आक्रामक अवतार में सामने आए हैं.
राहुल को सुनने के लिए भी जन सैलाब उमड़ रहा है और कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि कांग्रेस गुजरात में वापसी कर सकती है.
बीते दिनों राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने गुजरात में अहमदाबाद, मेहसाणा, सौराष्ट्र, राजकोट, सुरेंद्रनगर, सूरत और भरूच में वासावा के आदिवासी बहुल इलाकों समेत कई और जगहों का दौरा करके चुनावी मुद्दों का और जनता के रुझान का जायज़ा लिया.
बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने नीरजा चौधरी से बात की और उनकी आंखों देखी जानना चाही. पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी का आकलन-
बीते साल को नहीं भूले पाटीदार
जब मैं गांव से गुज़री तो मुझे लगा वहां लोगों में बदलाव की इच्छा है. मेहसाणा में पाटीदार गुस्से में हैं. वहां अनामत आंदोलन की बात या आरक्षण नहीं दिए जाने की बात नहीं थी, लेकिन उनका कहना है कि आरक्षण तो हमें ना बीजेपी देगी ना ही कांग्रेस.
उनका कहना है कि वो कांग्रेस के पक्ष में हैं क्योंकि उन्हें कांग्रेस ने कम से कम मारा तो नहीं. पाटीदार समुदाय में बीते साल हुए गोलीकांड का असर और गुस्सा साफ दिखता है.
साल 2015 में पाटीदार नेताओं की एक रैली में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया गया था और गोलियां चलाई गई थीं. इस घटना में 14 लोगों की मौत हो गई थी. पाटीदार इसके लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को ज़िम्मेदार मानते हैं.
पाटीदारों ने जिस शब्दावली का इस्तेमाल किया वो था, "इनको बहुत घमंड हो गया है. इनको लगता है कि गुजरात इन पर गुरूर करता है. ये मनमानी कर रहे हैं. इनको एक झटका देना है ताकि लाइन पर आ जाएं."
जिन ग्रामीण इलाकों से मैं गुज़री वहां हर जगह आक्रोश तो नहीं था, कई जगहों में नाराज़गी ज़रूर थी. मैंने खेड़ा के गांव में भी नाराज़गी देखी. पूरे भारत में सकल घरेलू उत्पाद की बात करें, तो इसमें सबसे ऊपर हैं खेड़ा के गांव जहां के पाटीदार विदेशों में बसे हैं और काफी पैसा देश में भेजते हैं.
युवाओं का हार्दिक पटेल को समर्थन दिख रहा है और सूरत में उनका कैंपेन भी बढ़िया है. सूरत में 12 शहरी सीटों में से चार में कांटे की टक्कर देखने को मिल सकती है.
बीते चुनावों में 72 फीसदी पाटीदारों ने भाजपा के लिए वोट किया था. इस बार क्या होगा कहा नहीं जा सकता.
गांवों में दिख रहा है एंटी इंकबैन्सी का असर
गुजरात में सड़कें काफी बेहतर हैं, यहां गांवों में शौचालय हैं, पक्के घर हैं. देखो तो लगता है कि यहां विकास तो हुआ है और इसमें कोई शक़ नहीं. लेकिन वहां आंगनवाड़ी कर्मचारियों में नाराज़गी दिखी और वो बदलाव चाहते हैं.
ये लोग नाराज़ हैं क्योंकि हर तरह के सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रमों में उनके योगदान की उम्मीद की जाती है, लेकिन उनकी तनख्वाह काफी कम है.
आधार से राशन कार्ड को जोड़ने को लेकर भी कई लोगों की नाराज़गी है. आदिवासी इलाकों में लोगों का कहना है कि पहले परिवार का कोई भी जाकर राशन ले आता था, अब जिसके पास आधार है वो राशन लेने नहीं जा पाया तो परिवार को राशन नहीं मिलेगा.
इस पर अगर फिंगरप्रिंट स्कैनिंग में थोड़ा भी इधर-उधर हो जाए तो राशन तो नहीं ही मिलता, इस गड़बड़ी को ठीक करने के लिए दूर कार्यालय तक जाना पड़ता है.
बीजेपी को यहां काफी साल हो गए हैं और लोग अब इस बात का हिसाब लगाने लगे हैं कि 22 साल में हमारे लिए कुछ नहीं हुआ और महंगाई बढ़ी हैं और मुश्किलें भी.
शहरों में झुकाव किस तरफ?
लेकिन शहरों में कहानी कुछ अलग लग रही है. सूरत में तो लगा कि मामला ही कुछ और है. जीएसटी के कारण कपड़ा व्यापारियों को हुए नुकसान के बारे में काफी कुछ पढ़ा सुना था. लेकिन वहां के बाज़ारों में लोगों का कहना है कि उनका वोट मोदी को जाएगा.
व्यापारियों का कहना है कि जीएसटी के कारण जो बाज़ार कभी लोगों से खचाखच भरा रहता था, अब वो खाली रहने लगा है, बाज़ार में मंदी आई है लेकिन इसे दुरुस्त करने के लिए वो मोदी का ही पक्ष लेंगे क्योंकि उन्होंने इसकी शुरूआत कर दी है.
व्यापारियों में ये भी डर दिखा कि अगर बीजेपी हार गई तो जीएसटी रेट को फिर से कम करने में सरकार ने जो मदद की है, शायद वो फिर दोबारा न मिले और इस कारण वो फिर से बीजेपी की तरफ ही देख रहे हैं.
अहमदाबाद के मध्यमवर्ग में कई बातों की नाराज़गी दिखी, ख़ासकर अभिव्यक्ति की आज़ादी के छीने जाने का डर दिखा लेकिन अमूमन यही नज़र आया कि लोग सत्तारूढ़ पार्टी से ही संतोष करना चाहते हैं.
मोदी नहीं बीजेपी है परेशानी का कारण
पाटीदारों में जो एक बात खुलकर सामने आई, वो ये थी कि सबसे अधिक गुस्से में जो पाटीदार हैं, उनका भी कहना है कि उन्हें मोदी से परेशानी नहीं है बल्कि बीजेपी से परेशानी है.
वो साफ तौर पर कहते हैं कि वो व्यक्ति और पार्टी के बीच में फर्क करते हैं और मोदी को अभी भी अलग नज़रों से देखते हैं.
कांग्रेस की तरफ वो लोग देख रहे हैं जो ये सोचते हैं कि बीजेपी को झटका देना है, "इनको इनकी औकात दिखानी है". राजकोट में कई लोगों का कहना था, "अभी झटका/फटका दिया तो 2019 के लिए लाइन पर आ जाएंगे नहीं तो बहुत दिमाग़ ख़राब हो जाएगा इनका."
ऐसा नहीं है कि लोग उन्हें निकाल कर दूसरी सरकरी लाना चाहते हैं, लोग चाहते हैं वो ठीक हो जाएं और उनका घमंड ना रहे.
बदले-बदले से राहुल का हो रहा है असर
गुजरात में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को देखें तो इस बार उनमें एक बदलाव नज़र आता है, सुलझे हुआ भाषण, आक्रामक तेवर और एक नया ही अवतार नज़र आता है. क्या गुजरात उनमें अपना नया नेता ढूंढ़ पा रही है? इस बार ऐसा लग रहा है कि लोग उन्हें सुनने को तैयार हैं उन्हें नकारा नहीं जा रहा.
गुजरात में जो मूड है उसके कारण लोगों में उम्मीद बंधी है कि बिना एक बार मौका दिए राहुल को नकार देना ठीक नहीं है. लोग अब मानने लगे हैं कि उन्हें सरकार चलाने का एक मौका दिया जाना चाहिए जिसके बाद ही उनकी काबिलियत पर टिप्पणी की जानी चाहिए.
सुरेंद्रनगर में जब कुछ लोगों ने मोदी के बारे में अपशब्दों का इस्तेमाल किया तो राहुल ने उन्हें रोका और कहा, "ना आप ऐसा बोलेंगे ना मैं ऐसा कहूंगा. क्योंकि वो हमारे प्रधानमंत्री हैं." लोगों को उनकी ये बात काफी पसंद आई.
उत्तर प्रदेश निकाय चुनावों का पड़ेगा असर?
स्थानीय स्तर पर देखें तो ऐसा होता नहीं है लेकिन सोशल मीडिया के दौर में लोग हर तरह की खबरों से जुड़े रहते हैं और इसका असर नहीं पड़ेगा, ये कहना मुश्किल होगा.
जो लोग टेलिविज़न पर, सोशल मीडिया पर ये ख़बर पढ़ रहे होंगे, वो लोग केवल यह नहीं पढ़ रहे होंगे. देखें तो मोदी भी उन्हीं लोगों के साथ जुड़ रहे हैं जो सोशल मीडिया से जुड़े हैं और ये लोग मोदी को भी पढ़ रहे हैं और उनकी अपील भी सुन रहे होंगे.
मोदी खुद को एक गुजराती की तरह पेश कर रहे हैं जो वादा करता है कि हम किसी भी कीमत पर सब कुछ बेहतर करने के लिए तैयार हैं. मोदी मैदान में ना हों तो बीजेपी बुरी तरह चुनाव हार सकती है.
ऐसा तो नहीं कहा जा सकता है कि मोदी लहर अभी भी बरकरार है लेकिन शहरी इलाकों में बीजेपी का पलड़ा भारी है.
यह भी स्पष्ट तौर पर कहा ही जा सकता है कि गुजरात में बीजेपी विरोधी लहर बन रही है. कांग्रेस और गुजरात की तिकड़ी (हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी और अल्पेश ठाकोर) एक तरह से बीजेपी विरोधी लहर पर सवार हो गई है.
अब वो इसे कितना भुना पाते है ये निर्भर करता है कि गुजरात का वोटर आखिरी घड़ी में क्या सोचेगा.
कांग्रेस के लिए ये भी बड़ा सवाल है कि एक संगठन के तौर पर वो कमज़ोर हुई है और उसे अपने को फिर से बनाना पड़ेगा. जहां बीजेपी का काडर काफी बड़ा है वहीं कांग्रेस में इसकी कमी है और ये भी उसके लिए मुश्किल का सबब बन सकती है.
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