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ग्राउंड रिपोर्ट: गुजरात के डांग में डैम से लोगों को घर, ज़मीन खोने का ख़ौफ़
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, डांग, गुजरात
जबसे गुजरात के डांग में बांध बनाने की चर्चा शुरू हुई है, डूब क्षेत्र में रह रहे लोग ज़मीन जायदाद के डूबने के डर से घबराए हुए हैं.
आदिवासी-बहुल डांग में ज़्यादातर लोग खेती पर निर्भर हैं.
यहां चर्चा आम है कि बांध बनाने का काम कभी भी शुरू हो सकता है.
डांग के दाबदर गांव की रायजभाई भोये बाकी गांववालों की तरह डरी हुई हैं.
दाबदर में घर के बाहर छोटे बच्चों, बड़े-बूढ़ों से घिरी भोये ने गुजराती में बताया, "अगर बांध बनेगा तो मैं अपने परिवार, अपने बच्चों के साथ कहां जाऊंगी?"
गंगलूभाई रड़काभाई पासारिया सामने वाले घर में रहते हैं.
... तो हमारे बच्चे भूखे मर जाएंगे
वो कहते हैं, "अगर हमारी ज़मीन चली गई तो हमारे बच्चे भूखे मर जाएंगे, हमारी पूरी ज़मीन डूब जाएगी. अगर सरकार डैम बनाती है तो हमें लड़ना होगा. डैम बन रहा है ये अखबार में आ रहा है."
केंद्र सरकार की इन्वायरमेंट क्लियरेंस वेबसाइट के अनुसार डांग में तीन बांध - चिक्कर डैम, दाबदर डैम, केलवन डैम - बनाने की योजना है.
पार-तापी-नर्मदा लिंक नाम के इस प्रोजेक्ट से जुड़ी जानकारी सरकारी वेबसाइटों पर मौजूद हैं और लोग उसे शेयर कर रहे हैं.
डांग को बांध से कोई फ़ायदा नहीं
पार और तापी स्थानीय नदियां हैं.
स्थानीय लोगों के मुताबिक योजना का मक़सद समुद्र में मिल जाने वाली स्थानीय नदियों के पानी को गुजरात के दूसरे इलाकों में पहुंचाना है, लेकिन उनका दावा है कि डांग को बांध से कोई फ़ायदा नहीं होगा.
अगर बांध बना तो आंकड़ों के मुताबिक डांग के 30 से ज़्यादा गांवों के करीब 1600 परिवारों, उनकी खेती की ज़मीन, जंगल पर इसका असर पड़ेगा.
प्रशासन को योजना के कार्यान्वयन की जानकारी नहीं
चुनाव नज़दीक हैं और गुजरात के जल संसाधन राज्य मंत्री नानूभाई वनानी और डांग में भाजपा कार्यकर्ता लोगों में डर की बात को गलत बता रहे हैं.
बांध का काम कब शुरू होगा, लोगों को कितना और कब मुआवज़ा मिलेगा, इस पर नानूभाई वनानी ने बीबीसी से कहा, "काम प्रोसेस में है. अभी प्रोजेक्ट रिपोर्ट पर काम चल रहा है."
डांग ज़िला अधिकारी बी कुमार भरोसा दिला रहे हैं कि प्रशासन को योजना के कार्यान्वयन की कोई जानकारी नहीं.
वो कहते हैं, "गुजरात सरकार ने लिखित में ज़िला प्रशासन को कुछ नहीं बताया है."
महिलाओं में बच्चों को लेकर घबराहट
हम डूब वाले क्षेत्र में आने वाले दूसरे गांवों में भी गए. वहां भी चर्चा इसी को लेकर थी.
इसे लेकर प्रदर्शन भी कर चुके हैं.
अंजूभाई गावित पास के बेसकात्री गांव में खेती और पशुपालन करती हैं.
वो कहती हैं, "जब से डैम की बात शुरू हुई है, लोगों में घबराहट पैदा हो गई है. कोई सुखी होकर खा नहीं सकता, सो नहीं सकता."
"महिलाएं घबरा गई हैं कि बच्चों को हम कैसे पढ़ाएंगे, कैसे उनका विवाह करेंगे. अगर हमें यहां से जाना पड़ेगा तो हमारा क्या हाल होगा. जायदाद, बाप-दादा की मिल्कियत, हम ये कहां लेकर जाएंगे. इतनी घबराहट है."
"अगर डैम बनता है तो गांव की सारी ज़मीन डूब जाएगी."
अंजूभाई गावित कहती हैं कि उनके पास 10 बीघा ज़मीन है जिस पर वो गन्ने की खेती करती हैं.
सर्वे करने वालों को महिलाओं ने खदेड़ा
कई लोग यहां सात साल पहले सर्वे करने आए लोगों की बात करते हैं जिन्हें महिलाओं ने खदेड़ दिया था.
अंजूभाई कहती हैं, "उसके बाद सर्वे करने वाले लोग तो नहीं आए लेकिन पेपर में बहुत आता है. डर के मारे अपना मकान नहीं बना रहे हैं. बुज़ुर्गों को भय है कि हमारी अगली पीढ़ी क्या करेगी. विस्थापित हुए लोगों को हर हफ़्ते 750 रुपये देने की बात चल रही है. इसमें हमारा गुज़ारा कैसे होगा. हम बच्चे को कैसे पढ़ाएंगे- लिखाएंगे. पैसे के बिना तो कुछ नहीं होता."
स्थानीय पत्रकार चिराग पंचाल के मुताबिक चुनाव के खत्म होने तक सरकार इस मुद्दे पर बयानबाज़ी से बचेगी.
वो कहते हैं, "कच्छ या भुज (जहां लोगों को दोबारा बसाने की बात कही जा रही है) में यहां जैसा माहौल नहीं है. सरकारी तौर पर अभी किसी ने कुछ नहीं बताया है."
डांग के पत्रकार शिवराम के मुताबिक डैम बनाने की ज़रूरत ही नहीं है.
"बाहर जाकर फिर हमें मजदूरी करनी पड़ेगी. इस बांध से लोगों को कोई फायदा नहीं होगा."