राहुल कांग्रेस अध्यक्ष बने तो कितने बदलेंगे गुजरात के सियासी समीकरण?

    • Author, दिनेश उप्रेती
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जल्द पदोन्नति हो सकती है और मीडिया में कांग्रेस सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि गुजरात विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्हें अध्यक्ष बनाया जा सकता है.

सोमवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक है और इसकी अध्यक्षता सोनिया गांधी को करनी है. इसी बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव पर अंतिम मुहर लग सकती है.

राहुल को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की अटकलें लंबे समय से लगती रही हैं और कई नेता उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने की वकालत कर चुके हैं. पिछले साल नवंबर में कार्यसमिति ने सर्वसम्मति से राहुल से पार्टी की कमान संभालने का आग्रह किया था, लेकिन तब राहुल ने कहा था कि वह चुनकर अध्यक्ष बनना चाहते हैं.

राहुल गांधी ने साल 2004 में सक्रिय राजनीतिक में कदम रखा था और चार साल पहले यानी 2013 में उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था. सोनिया गांधी पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही हैं और उनकी ग़ैरमौजूदगी में राहुल ही कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे हैं. गुजरात चुनावों में वो जमकर प्रचार कर रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गढ़ में उन्हें ज़ोरदार चुनौती दे रहे हैं.

क्या बदलेगा?

ऐसे में जबकि राहुल गांधी ही कांग्रेस की फ्रंट सीट पर हैं तो सिर्फ़ उनका पद बदल जाने से कांग्रेस और देश की सियासत में क्या बदल जाएगा.

विश्लेषकों की इस बारे में अलग-अलग राय है. राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई जहां नेतृत्व में संभावित फेरबदल की इस टाइमिंग को दिलचस्प मानते हैं, वहीं पत्रकार अजय उमट का कहना है कि ये कांग्रेस का रणनीतिक दांव हो सकता है.

किदवई कहते हैं, "नेतृत्व में फेरबदल की टाइमिंग दिलचस्प लग रही है. एक तरफ़ गुजरात का चुनाव चल रहा है और कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर है. कांग्रेस गुजरात के सहारे देश की राजनीति में बदलाव की उम्मीद लगाए हुए है, ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन का फ़ैसला दिलचस्प लग रहा है."

किदवई आगे कहते हैं, "जहाँ तक राहुल के प्रमोशन की बात है तो उनका अध्यक्ष बनना मायने तो रखेगा ही. मां-बेटे का रिश्ता व्यक्तिगत रिश्ता है, अगर लोग दोनों को अपना नेता मानें तो मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं. कांग्रेस को 'एक नेता, एक दल' बहुत पहले कर लेना चाहिए था. ऐसा नहीं करने का उसे खामियाजा भुगतना पड़ा है. नेतृ्त्व स्पष्ट होने के बाद कांग्रेस एक मिशन के रूप में काम कर पाएगी."

वहीं, पत्रकार अजय उमट कहते हैं कि ये एक रणनीतिक दांव अधिक लगता है. उनका कहना है कि अगर ख़ुदा-न-खास्ता गुजरात के नतीजे कांग्रेस की उम्मीदों से उलट आ गए तो कांग्रेस के लिए उन्हें अध्यक्ष बनाना मुश्किल होगा. और अगर कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया तो इसका पूरा श्रेय राहुल गांधी को ही जाएगा.

गुजरात चुनावों पर असर

पर राहुल के सोनिया की कुर्सी ले लेने से गुजरात के सियासी घमासान पर क्या असर पड़ेगा?

किदवई कहते हैं, "राहुल की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी का गुजरात चुनावों पर सकारात्मक असर होगा. पहला तो ये है कि सोनिया इस बार चुनाव प्रचार से बाहर हैं और जिस तरह पहले मोदी और बीजेपी सोनिया के विदेशी मूल के बहाने कांग्रेस को घेरती थी, वो इस बार नहीं है. अब मैदान में राहुल गांधी हैं और इस तरह के सवाल इस बार बाहर हैं."

दूसरा ये है कि आर्थिक नीतियों के बारे में भी राहुल की सोच अलग है. जहाँ सोनिया गांधी आर्थिक नीतियों के बारे में मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम पर एतबार करती थी, वहीं राहुल गांधी ने नोटबंदी हो या जीएसटी या फिर ग्रोथ से जुड़ी बातें, सब पर बेबाक राय दी है. वो जानते हैं कि कारोबारी राज्य गुजरात में आर्थिक मामले कितने अहम हैं, यही वजह है कि जब भी मौका मिलता है वो आर्थिक नीतियों पर मोदी को घेरने से नहीं चूकते.

किदवई के मुताबिक, सोनिया गांधी 1998 से कांग्रेस अध्यक्ष हैं और कांग्रेस के इतिहास में सबसे लंबा कार्यकाल उनका ही है. सोनिया गांधी ने संगठनात्मक रूप से बहुत बदलाव नहीं किए और उनके कार्यकाल में 'सब चलता है' की कार्यसंस्कृति कांग्रेस में विकसित हो गई थी. फेरबदल से युवाओं में स्पष्ट संदेश जाएगा कि अब कमान राहुल के हाथों में है. युवाओं और महिलाओं के बीच निश्चित तौर पर उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी. हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर जैसे युवाओं को अपने साथ मिलाने से उन्होंने युवाओं में ये संदेश तो दिया ही है कि वो उनकी बातें सुनने को तैयार हैं.

'बहुत असर नहीं'

हालाँकि पत्रकार अजय उमट का मानना है कि गुजरात के चुनावों में इस फेरबदल का बहुत अधिक असर नहीं पड़ेगा.

अजय कहते हैं, ''गुजरात में वैसे भी राहुल गांधी ही लड़ रहे हैं. गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी पार्टी हाई कमान से नाराज़ हैं और फ़िलहाल कोपभवन में हैं. उन्होंने कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवारों की सिफ़ारिश की थी, लेकिन केंद्रीय चुनाव समिति ने इन पर कोई ध्यान नहीं दिया. राहुल की चुनावी जनसभाओं को काफी समर्थन मिल रहा है. अभी तक सोशल मीडिया पर उनका मज़ाक उड़ा रहे लोग भी अब उन्हें गंभीर नेता के रूप में लेने लगे हैं. अगर कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राहुल कांग्रेस लड़े तो जो भी सफलता पार्टी को मिलेगी वो राहुल के खाते में जाएगी.

उनका कहना है कि अभी राज्य में जो हालात हैं, उनमें कई स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को लगता है कि राहुल के फ़ैसलों को पलटवाया जा सकता है. यानी उन्हें बाईपास कर सोनिया गांधी के पास जाकर काम कराया जा सकता है. राहुल को कमान मिलने से ये कार्यसंस्कृति ज़रूर बदल जाएगी.

कांग्रेस में क्या बदलेगा?

किदवई का मानना है कि राहुल के अध्यक्ष बन जाने से कांग्रेस की छवि में एक भारी बदलाव आएगा और वो होगा उसकी 'धर्मनिरपेक्षता' का.

उनका मानना है कि सोनिया के कार्यकाल में कांग्रेस पर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ऐसा लेबल लग गया था कि वो बहुसंख्यकों की अनदेखी कर रही हैं और सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के बारे में सोचती हैं, इससे कांग्रेस को सियासी तौर पर काफी नुक़सान हुआ. राहुल ने इस शैली को काफ़ी हद तक बदला है.

किदवई को लगता है कि शायद यही वजह है कि राहुल गांधी गुजरात चुनावों में मंदिरों में जा रहे हैं और हिंदू होने के नाते वो इस धर्म में आस्था जता रहे हैं. यहाँ ध्यान रखने वाली बात ये है कि राहुल का मंदिर जाना बीजेपी नेताओं से अलग है. राहुल ये संदेश दे भी रहे हैं कि जिस आस्था के साथ वो मंदिर जा रहे हैं, उसी आस्था से वो गुरुद्वारे या मस्जिद में भी जाते हैं.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी गुजरात की अपनी चुनावी रैलियों में जय सरदार के साथ-साथ जय भवानी के भी नारे लगा रहे हैं और तक़रीबन दर्जन भर मंदिरों के दर्शन भी कर चुके हैं.

इसके अलावा ये किसी से छिपा नहीं है कि राहुल के भाषणों की धार काफ़ी तेज़ हुई है और अगर वो पार्टी के सर्वेसर्वा हुए तो पूरे अधिकार से अपने विरोधियों को जवाब दे पाएंगे.

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