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#BBCGujaratOnWheels: बाइक पे होके सवार, पूछेंगे गुजरात के अनकहे सवाल
- Author, शालू यादव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बनासकांठा
लोग अक्सर मुझसे ये पूछते हैं कि तुम औरतों के मुद्दों को इतनी शिद्दत और जुनून से क्यों कवर करती हो. और मेरा जवाब सीधा सा होता है, क्योंकि औरतों के नज़रिये से ये दुनिया बिलकुल अलग दिखती है. फिर वो आम ज़िंदगी के मुद्दे हों या चुनावी.
आम तौर पर पुरुषों पर खुद को साबित करने का बोझ नहीं होता. जबकि औरतों को इस परीक्षा से हर कदम पर गुज़रना होता है.
ये डायरी का पहला पन्ना हमारे एक अनोखे सफ़र का चश्मदीद गवाह है. इस सफ़र में बीबीसी की टीम के साथ है गुजरात की वुमन बाइकर्स ग्रुप.
हम सब इस सफर में गुजरात की वो नब्ज़ महसूस करेंगे जिसमें केवल औरतें हैं. ये पहिए वहां पहुंचेंगे जहां विकास का पहिया अब तक नहीं पहुंचा. और वहां भी जहां विकास की कहानी औरतों ने लिखी है-पर कैसे?
#BBCGujaratOnWheels एक ऐसा सफ़र है जो इस गुजरात चुनाव में वैसे मुद्दों की पड़ताल करेगा जिस पर आम तौर पर चर्चा नहीं होती है. जहां हम जा रहे हैं आखिर ये इलाके अब तक गुजरात के विकास मॉडल की चमक से दूर क्यों हैं.
बीबीसी हिंदी और गुजराती टीम के साथ ये चार बाइकर्स जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में कई बेड़ियों को तोड़ा है- इस चुनावी माहौल में कुछ अहम सवालों को खड़ा करेंगी.
हमारा सफर शुरू हुआ अहमदाबाद से. सबसे पहले हम पहुंच रहे हैं बनासकांठा जहां महिलाओं की आधी आबादी अनपढ़ है.
उसके बाद मेहसाणा- जहां लिंग अनुपात पिछले दो दशकों से चिंता का विषय तो रहा है पर सरकार की नज़र और ध्यान से दूर है.
हमारी टोली फिर पहुंचेगी आणंद- ये देखने के लिए कि जब औरतों को आर्थिक रूप से सबल बनने का मौका मिलता है तो वो सफलता की क्या इबारत लिखती हैं.
दाहोद हमारा आखिरी पड़ाव है. ये एक आदिवासी इलाका है जहां विकास की हर कहानी, हर दावे खोखले नज़र आते हैं.
यहां औरतें खून की कमी, शोषण और बेरोज़गारी की मार झेलती हैं.
चुनाव में 'सेक्स सीडी' जितना मीडिया का और लोगों का ध्यान खींचती हैं उतना लिंग अनुपात क्यों नहीं?
इस पूरे सफर का ब्यौरा- बीबीसी हिंदी और बीबीसी गुजराती, के ज़रिए आप तक पहुंचेगा. हमें फॉलो करिए फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर.
ट्विंकल, लिंसी, मोनिका और श्लोका- इन चार बाइकर्स की कहानी भी इसी सफर से आप तक पहुंचेगी.
7 दिन और 900 किलोमीटर के इस सफर के दौरान मैं इनके बारे में आपसे खूब बातें करूंगी.
आखिर गुजरात की सड़कों पर हवाओं से बुलंदी के साथ बात करते हुए इन वंडर वुमन में मैंने खुद के उस सपने को देखा, जो मैंने शायद आधे रास्ते में छोड़ दिया था.
सपना एक बाइकर बनने का. लेकिन फिर इनके साथ वक़्त बिताना ऐसा है जैसे मेरे उस ख्वाब को फिर से पर मिल गए हों.
'हवाओं सी बन रही हैं लड़कियां- उन्हें बेखौफ़ चलने में मज़ा आता है,
उन्हें मंज़ूर नहीं बेवजह रोका जाना-परिंदों सी बन रही हैं लड़कियां उन्हें उड़ने में मज़ा आता है,
उन्हें मंज़ूर नहीं उनके परों का काटा जाना, फूलों सी बन रही हैं लड़कियां,
उन्हें महकने में मज़ा आता है, उन्हें मंज़ूर नहीं तोड़ करक रौंदा जाना.
पहाड़ों सी बन रही हैं लड़कियां, उन्हें सिर उठा जीने में मज़ा आता है.
उन्हें मंज़ूर नहीं सिर को झुका कर जीना, और सूरज सी बन रही हैं लड़कियां.
उन्हें चमकने में मज़ा आता है उन्हें मंज़ूर नहीं हरदम पर्दों से ढंका जाना.
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