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किसी ने बुलाया नहीं तो श्री श्री रविशंकर क्यों जा रहे हैं अयोध्या?
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अयोध्या में मंदिर मस्जिद विवाद को सुलझाने की आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर की कोशिशों को मीडिया में चाहे जितनी जगह मिल रही हो, लेकिन इस मामले के पक्षकार न तो इसे लेकर बहुत गंभीर हैं और न ही उन्हें इस प्रयास से कुछ हासिल होने की उम्मीद दिख रही है.
श्री श्री रविशंकर ने ये कोशिश पिछले दिनों हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों से मुलाक़ात के साथ शुरू की थी और अब 16 नवंबर को वो अयोध्या पहुंच रहे हैं. अयोध्या पहुंचने से पहले वो मथुरा गए और फिर बुधवार को लखनऊ में मुख्यमंत्री समेत कुछ अन्य लोगों से मुलाक़ात की.
रामजन्मभूमि के अंदर रामलला विराजमान की ओर से पक्षकार त्रिलोकी नाथ पांडेय का कहना है कि अब जबकि पांच दिसंबर से सुप्रीम कोर्ट में मामले की अंतिम सुनवाई शुरू होने जा रही है तो ऐसे में अब कोर्ट के बाहर सुलह की कोशिशों का कोई मतलब नहीं है.
पांडेय सीधे कहते हैं कि श्री श्री रविशंकर की इस कोशिश में उन्हें न तो कोई गंभीरता दिख रही है और नतीजा आने की उम्मीद तो है ही नहीं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "मुझे रविशंकर जी के आने से या बातचीत करने से कोई ऐतराज़ नहीं है, लेकिन अब बातचीत का कोई मतलब नहीं है. दूसरे न तो उनके पास सुलह का कोई रोडमैप है और न ही उन्होंने पक्षकारों से इस तरह के किसी मसौदे को लाने का आग्रह किया है. इसके अलावा जो प्रमुख पक्ष हैं, उनकी श्री श्री से बातचीत में कोई दिलचस्पी भी नहीं है."
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले में जिन तीन पक्षों को विवादित स्थल मिला है उनमें एक पक्ष रामलला विराजमान भी हैं. पांडेय का दावा है कि वही इस स्थल की देख-रेख करते हैं.
'सरकार चर्चा बनाए रखा चाहती है'
एक अन्य पक्ष निर्मोही अखाड़ा है जिसे विवादित स्थल का कुछ भाग दिया गया है और तीसरा पक्ष है सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड और कुछ अन्य मुस्लिम पक्षकार.
निर्मोही अखाड़े के प्रमुख दिनेंद्र दास ने रविशंकर से पहले भी मुलाक़ात की थी और बताया जा रहा है कि उन्होंने ही रविशंकर को अयोध्या बुलाया है.
बीबीसी से बातचीत में दिनेंद्र दास उन्हें बुलाने की बात तो स्वीकार नहीं करते, लेकिन रविशंकर की पहल में उन्हें उम्मीद ज़रूर दिखती है.
वहीं मुस्लिम पक्षकारों की ओर कोर्ट में इस मामले को देख रहे वकील और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के चेयरमैन ज़फ़रयाब जिलानी कहते हैं कि इस पहल में कितनी गंभीरता है ये सबको पता है, इसका न तो कोई नतीजा निकलना है और न ही नतीजे के मक़सद से ये सब हो ही रहा है.
जिलानी कहते हैं कि उनसे मिलने के लिए सभी स्वतंत्र हैं, लेकिन मुस्लिम पक्ष बाबरी मस्जिद से अपना दावा कभी नहीं छोड़ेगा.
जिलानी कहते हैं, "रविशंकर को निर्मोही अखाड़ा ने ये कहकर बुलाया है कि सभी लोग उनकी मध्यस्थता चाहते हैं जबकि ये बिल्कुल ग़लत है. रविशंकर क्यों मध्यस्थता कर रहे हैं, समझ से परे है. मौजूदा केंद्र और राज्य सरकारें इसमें इसलिए दिलचस्पी ले रही हैं, क्योंकि वो इस मसले को चर्चा में बनाए रखना चाहती हैं."
अयोध्या में इस मामले के प्रमुख पक्षकार इक़बाल अंसारी तो श्री श्री रविशंकर की मध्यस्थता पर ही सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं, "अयोध्या में साधु-संत कम हैं क्या जो कोई बाहरी संत यहां के मसले को सुलझाने की पहल करे. हम लोग यहां के साधु संतों से मिलते-जुलते हैं, उनका आदर करते हैं, उनकी ओर से कोई फ़ार्मूला आए तो विचार किया जा सकता है. रविशंकर जी पता नहीं क्यों आ रहे हैं? लगता है उन्हें भी अपनी राजनीति चमकाने और ख़ुद को चर्चा में लाने का ये अच्छा माध्यम मिल गया है."
पढ़ें - 'शांति चाहिए हमें, ले जाओ बाबरी मस्जिद' - अंसारी से 2014 में बीबीसी के शक़ील अख़तर की बातचीत
'मीडिया इवेंट है'
इससे पहले, शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़वी ने भी तमाम पक्षकारों से मिलने और मामले में रविशंकर के साथ पहल करने का दावा किया था.
लेकिन उनकी कोशिशों को तो मुस्लिम संगठनों ने ही न सिर्फ़ सिरे से ख़ारिज कर दिया था बल्कि उनके ऊपर तमाम तरह के आरोप भी लगाए. यही नहीं, शिया वक़्फ़ बोर्ड का भी कहना है कि ये कोशिश रिज़वी की अपनी है, वक़्फ़ बोर्ड की नहीं.
दरअसल अयोध्या विवाद की नियमित सुनवाई पांच दिसंबर से सुप्रीम कोर्ट में होनी है. सवाल उठता है कि उससे ठीक पहले एक ऐसी कोशिश क्यों हो रही है जिसमें दोनों पक्ष पहले से ही कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं और पहल करने वाले व्यक्ति की हिन्दू समुदाय में भी कोई बहुत बड़ी स्वीकार्यता नहीं है.
वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र इसे सीधे तौर पर कहते हैं कि ये मीडिया इवेंट है, इसका कोई परिणाम नहीं निकलना है, "न तो रविशंकर को कोर्ट ने बातचीत के लिए नियुक्त किया है और न ही सरकार ने मध्यस्थ बनाकर भेजा है. जो पक्ष इस मामले में मुद्दई हैं, उन्होंने भी उन्हें नहीं बुलाया है. ऐसे में यदि वो कोई बात करते हैं, कुछ सहमति बनती भी है तो उसकी क़ानूनी मान्यता कितनी होगी, ये भी तय नहीं है. कुल मिलाकर ये सिर्फ़ एक ड्रामा है और लोगों को ये दिखाना है कि सरकार मंदिर को लेकर कितनी गंभीर है."
बहरहाल, श्री श्री रविशंकर 16 नवंबर को अयोध्या में तमाम पक्षों और संगठनों से मुलाक़ात करेंगे. ज़ाहिर है, मुलाक़ात के बाद कोई सुलह-समझौते जैसी स्थिति शायद ही बने लेकिन जानकारों का कहना है कि इसका अंदाज़ा तो मिल ही सकता है कि इस मामले में राजनीतिक गर्माहट अभी भी वैसी है या फिर कुछ परिवर्तन हुआ है.
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