ब्लॉग: जब दाऊद इब्राहीम ने कहा - तुझे आठ दिन का टाइम देता हूँ

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- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
मैंने फ़ोन उठाया तो दूसरी तरफ़ से बेहद ठंडी आवाज़ आई, "होल्ड रखो, बड़ा भाई बात करेगा". फ़ोन करने वाले का नाम छोटा शकील था.
मेरे सामने आउटलुक पत्रिका के वरिष्ठ पत्रकार अजित पिल्लै साँस रोके खड़े थे. मैंने चारों ओर नज़र घुमाई तो वहाँ मौजूद दफ़्तर के सभी लोग एकटक मेरी ओर देख रहे थे. सबको मालूम था कि ऐसी बातचीत रोज़ाना नहीं होती. सबको मालूम था कि फ़ोन करने वाले के हाथ वाक़ई बहुत लंबे हैं और अगर मामला थोड़ा भी बिगड़ा तो 'दिल्ली में पत्रकार की हत्या' जैसी सुर्ख़ियाँ बन सकती हैं.
कुछ ही पलों बाद फ़ोन पर किसी दूसरे शख़्स की आवाज़ सुनाई पड़ी और बिना किसी भूमिका के या बिना मेरा नाम पूछे उसने कहना शुरू किया, "ये क्या छाप रहे हो तुम लोग. मुझे ड्रग्स के धंधे में बता रहे हो. तुम्हे मालूम है हमारे मज़हब में इसकी मनाही है. मेरा दुनिया भर में रियल एस्टेट का बिज़नेस है और तुम कह रहे हो कि मैं ड्रग्स का धंधा करता हूँ."
ये आवाज़ दाऊद इब्राहीम की थी. दाऊद इब्राहीम - बॉम्बे अंडरवर्ल्ड का बेताज बादशाह, भारत का दुश्मन नंबर एक. मुंबई शहर में 1993 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों का 'मास्टरमाइंड'.

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उसी हफ़्ते 'आउटलुक' पत्रिका में अजित पिल्लै और चारुलता जोशी ने दाऊद इब्राहीम के सफ़ेद सियाह बिज़नेस पर कवर स्टोरी छापी थी जिसमें सरकारी सूत्रों ने बताया था कि नशीली दवाओं के धंधे में उनका 2000 करोड़ रुपया लगा हुआ है. दाऊद की नाराज़गी की यही वजह थी.
"दाऊद भाई", मैंने अपनी आवाज़ में ऐसी लापरवाही लाने की कोशिश की जैसे दाऊद इब्राहीम से मेरी दाँत काटी रोटी वाली दोस्ती हो और हम रोज़ाना फ़ोन पर एक दूसरे को चुटकुले सुनाकर ठहाके लगाते हों.
पत्रकारिता के पेशे में रिपोर्टर कई तरह के सनसनीख़ेज़ तजुर्बों से गुज़रता है - शुरुआती दौर में कोई बड़ा पुलिस अफ़सर फ़ोन कर दे तो रिपोर्टर का ओहदा अपनी ही नज़रों में काफ़ी ऊँचा हो जाता है. फिर छोटे-मोटे नेताओं के फ़ोन आने शुरू होते हैं. और ये सिलसिला बड़े अफ़सरों और मंत्रियों तक पहुँचता है. उसी अनुपात में लोगों की नज़र में ऊँचा हो न हो पत्रकार की अपनी नज़र में उसका ओहदा बढ़ता चला जाता है.
ऐसे में जिस डॉन को पूरे देश की पुलिस ढूँढ रही हो, इंटरपोल उसके लिए रेड कॉर्नर नोटिस जारी कर चुका हो और हर दूसरे हफ़्ते ख़बर छपती हो कि वह डॉन दरअसल पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आइएसआइ की सुरक्षा में कराची के किसी सेफ़ हाउस में रह रहा है - वो अपने किसी चेले के ज़रिए नहीं बल्कि ख़ुद फ़ोन पर आकर रिपोर्टर से सफ़ाई माँग रहा हो तो हालात की नज़ाकत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
जिस दाऊद इब्राहीम से इंटरव्यू करने के लिए बड़े बड़े नामी संपादक और फ़न्ने ख़ाँ रिपोर्टर अपना सब कुछ दाँव पर लगा दें, वो अगर ख़ुद आपसे बात कर रहा हो तो आवाज़ में लापरवाही का पुट आना लाज़मी है. ख़ास तौर पर तब जबकि आपको आसन्न ख़तरे की गंभीरता का लेशमात्र एहसास ही न हो.
इसी लापरवाही के असर में मैंने अपनी बात कहने की कोशिश की, "दाऊद भाई, हमने तो आपसे कई बार राबता करने की कोशिश की थी. अगर रिपोर्ट की कोई बात आपको पसंद न आई हो तो आप हमें लिख के भिजवा दीजिए. हम आपकी पूरी बात छाप देंगे."
"मैं तुझे आठ दिन का टाइम देता हूँ", दाऊद इब्राहीम ने मेरी बात को जैसे एक तीखे ब्लेड से काटते हुए सधे हुए शब्दों में कहा और मेरी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी झुरझुरी सी दौड़ गई. "अगर आठ दिन के अंदर-अंदर आउटलुक में मेरा स्टेटमेंट नहीं छापा तो फिर सोच लेना".

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दाऊद इब्राहीम के लिए ये बहुत रुटीन और शायद बोरिंग-सी बातचीत हो क्योंकि उन्होंने और उनके लोगों ने अपने करियर के दौरान कई बड़े उद्योगपतियों, फ़िल्म प्रोड्यूसरों और अफ़सरों से इस तरह की बात कई बार की होगी. पर मेरे चेहरे से जैसे सारा ख़ून निचुड़ गया. अजित पिल्लै और आसपास खड़े दूसरे लोगों को मेरा चेहरा देखकर ही शायद एहसास हो गया कि भाई ने अपना कोई रंग दिखा ही दिया है.
मैंने जैसे-तैसे फिर से अपनी बात कहने की कोशिश की, "भाई, अगर आप अभी एक घंटे के भीतर पूरी ख़बर के बारे में अपनी राय एक बयान की शक्ल में हम तक भेज दें तो उसे हम ज़रूर मैगज़ीन में छापेंगे."
दाऊद इब्राहीम ने इस बात का जवाब देना भी शायद ज़रूरी नहीं समझा. एक बार फिर से फ़ोन पर उनके सिपाहसालार यानी छोटा शकील की आवाज़ आई - "एक घंटे के भीतर मैं फ़ैक्स कर रहा हूँ. उसे अपने एडीटर को दिखा देना." और फ़ोन डिसकनेक्ट कर दिया गया और मैं टेलीफ़ोन को हाथ में थामे वहीं खड़ा रह गया.
ये पूरी बातचीत आउटलुक के संपादक विनोद मेहता के कमरे के बाहर हो रही थी. हमने तय किया कि दाऊद की धमकी को हलके में टालना ठीक नहीं है और बातचीत की पूरी जानकारी उन्हें देना ज़रूरी है. जो लोग विनोद मेहता को जानते हैं उन्हें मालूम होगा कि दस सेकेण्ड से ज़्यादा किसी बात पर उनका ध्यान खींचना लगभग असंभव होता था. चाहे फिर वो दाऊद इब्राहीम ही क्यों न हो.
"गेट हिम ऑफ़ माइ बैक" - विनोद मेहता ने टालने वाले अंदाज़ में कहा और किसी और काम में व्यस्त हो गए. यानी उन्होंने कह दिया कि दाऊद का बयान आए तो उसे छापो और मुक्ति पाओ.

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वो 1997 का साल था और मोबाइल फ़ोन और स्मार्टफ़ोन अभी फ़ैशनेबल नहीं हुए थे. पूरा दफ़्तर फ़ैक्स मशीन के आसपास इकट्ठा हो गया. एक घंटे से पहले ही फ़ैक्स मशीन हरकत में आई और उसमें से काग़ज़ निकलने लगा. दाऊद इब्राहीम ने आउटलुक में छपी कवर स्टोरी को ग़लत बताते हुए कम से कम तीन पेज का बयान भेजा था.
विनोद मेहता को वो बयान दिखाया गया तो उन्होंने हेडलाइन दी - दाऊद रिएक्ट्स टू आउटलुक स्टोरी! और पूरे बयान को सवाल-जवाब की शक्ल में अगले ही अंक में छाप दिया गया.
अगले ही दिन छोटा शकील का फ़ोन आया - "बड़ा भाई ख़ुश है. अब कोई फ़िकर मत करना. घबराने का नहीं... मैं फ़ोन पर तुम्हें गोली नहीं मारूँगा."
छोटे शकील का मेरे लिए ये आख़िरी फ़ोन नहीं था, पर उस पर फिर कभी चर्चा..
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