वो नवाब, जिन्हें मौत में भी किसी ने याद नहीं किया!

- Author, सुहैल हलीम
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत की राजधानी दिल्ली में एक महल ऐसा भी है, जिसके दरवाज़े सबके लिए खुले हैं.
शहर के बीचों-बीच घने जंगल में स्थित मालचा महल दिखने में कोई बहुत असाधारण तो नहीं है, लेकिन चौदहवीं शताब्दी की इस शिकारगाह से एक अनोखी कहानी ज़रूर जुड़ी है.

बेगम विलायत महल 1970 के दशक में लोगों के सामने आईं. उनका दावा था कि वो अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह की परपोती थीं और वो भारत सरकार से उन तमाम जायदाद के बदले मुआवजे की मांग कर रहीं थीं, जिसे भारत सरकार ने उनके दादा-परदादा से ज़ब्त कर लिया था.

जब विलायत महल की मांगों पर कोई सुनवाई नहीं हुई तो एक दिन अचानक उन्होंने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के वीआईपी लाउंज को अपना घर बना लिया. 10 साल तक उन्हें वहाँ से हटाने की नाकाम कोशिशें होती रहीं. आख़िरकार सरकार ने उन्हें मालचा महल दे दिया.

उस वक़्त तक ये जगह सिर्फ़ एक शिकारगाह थी, जिसमें भारतीय पुरातत्व विभाग की भी ख़ास दिलचस्पी नहीं थी. जब विलायत महल ने लखनऊ में एक घर और दिल्ली में फ्लैट की पेशकश ठुकरा दी, तब सरकार ने उन्हें मालचा महल रहने के लिए देने का प्रस्ताव दिया.
विलायत महल ने सरकार के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और बेटे प्रिंस अली रजा और बेटी सकीना महल के साथ मालचा महल में आ गईं. वो अपने साथ आठ कुत्तों को भी लेकर आईं थीं.

बस ये नाम का महल था, न तो इसमें बिजली थी, न पानी और न ही खिड़की-दरवाज़े. सिर्फ़ चारों तरफ़ थी मेहराबें और जंगली जानवरों को रोकने के लिए लोहे की कुछ जालियां लगी थी.
सरकार ने इस महल की मरम्मत कराने का वादा तो किया था, लेकिन वो पूरा कभी नहीं हुआ. यहां नवाब वाजिद अली शाह के वारिसों ने अपना ठिकाना बनाया और दुनिया से कटकर अपनी ज़िंदगी गुजारने लगे.
बेगम विलायत महल और प्रिंस अली रजा के जीते जी यहां किसी को क़दम रखने की इजाज़त नहीं थी. उनके खूंखार कुत्ते बिन बुलाए मेहमानों को शाही परिवार से दूर ही रखते थे. वो आम लोगों के मिलना पसंद नहीं करते थे. न तो कोई वहाँ आता था और न ही वो कहीं जाते थे.
मालचा महल में आने के तकरीबन 10 साल बाद बेगम विलायत महल ने ख़ुदकुशी कर ली थी. कुछ साल पहले बेगम सकीना महल भी गुजर गईं. लेकिन उससे पहले, उन्होंने अपने शाही ख़ानदान पर एक किताब लिखी थी, जिसकी प्रतियां अभी भी मालचा महल में बिखरी पड़ी हैं.

जब ये खानदान मालचा महल में रहने लगा तो उनके साथ कुछ नौकर भी थे. लेकिन आमदनी का कोई ज़रिया नहीं था, तो न नौकर बाकी रहे और न ही कुत्ते.
प्रिंस अली रजा कई साल से बेहद ग़रीबी में अकेले रहते थे. अगर कभी किसी से मिलना भी होता था तो वो भी केवल विदेशी पत्रकारों से.
उनकी ज़िंदगी भी एक रहस्य थी. गुजर-बसर कैसे होती थी, लोग इसके बारे में अलग-अलग तरह की बातें करते हैं. लेकिन इतना ज़रूर है कि आख़िरी दिनों में उनके पास बेचने के लिए भी कुछ बाकी नहीं था.
इसी साल सितंबर में प्रिंस अली रजा का भी निधन हो गया और किसी को ख़बर तक नहीं लगी. पुलिस ने दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड की मदद से उनका अंतिम संस्कार करवाया.
प्रिंस की मौत की ख़बर पिछले हफ्ते सार्वजनिक हुई.

मालचा महल के दरवाज़े अब सबके लिए खुले हैं. अंदर दाखिल होते ही चारों तरफ एक गुजरे हुए दौर की यादें बिखरी पड़ी हैं. सामने ही एक तख्त पर एक पुराना टूटा हुआ टाइपराइटर पड़ा है, चारों तरफ़ कुछ फ़ाइलें बिखरी पड़ी हैं, जिनके कागज वक्त के साथ पीले पड़ गए हैं.
उनमें से ज़्यादातर फ़ाइलों में भारत सरकार के साथ बेगम विलायत महल का पत्राचार है.
सरकार से मुआवजा हासिल करने की उन्होंने आखिर तक कोशिश जारी रखी.

एक अलमारी में कुछ किताबें हैं जो ज़्यादातर लखनऊ और मुग़ल दौर के बारे में है. नेशनल ज्योग्राफ़िक मैगज़ीन शायद प्रिंस को बहुत पसंद थी, क्योंकि उसकी प्रतियां हर जगह पड़ी हैं. पुरानी चेकबुक हैं, जो शायद लंबे समय से इस्तेमाल नहीं हुई थीं.
पुरानी तस्वीरें भी हैं, जिनसे अच्छे वक़्त की झलक मिलती है. एक कमरे में एक फ्रिज रखा है, शायद उस दौर का जब भारत में विदेशों से फ्रिज आना शुरू ही हुआ था.

फ्रिंज के अंदर उस साइज़ का बल्ब लगा था, जो आम तौर पर अब कमरों में दिखता है. लेकिन अफ़सोस, यहाँ कभी बिजली आई ही नहीं.
सामने ही एक बरामदे में डाइनिंग टेबल है, जिस पर अब भी कुछ प्लेटें रखी हैं. एक और मेज पर क्रॉकरी सजी है. कहना मुश्किल है इस मेज पर आखिर बार कब खाना खाया गया होगा.
महल के एक हिस्से में एक खुली रसोई भी है और आसपास बर्तन बिखरे पड़े हैं.

पास में ही एक जंग लगी तलवार भी पड़ी है, जिसने इस शाही खानदान की तरह शायद कभी अच्छा वक्त भी देखा होगा.
बेगम सकीना महल ने एक मर्तबा एक पत्रकार से कहा था कि आम होना सिर्फ़ एक जुर्म ही नहीं, एक पाप है. ये ही इस खानदान की त्रासदी थी. वो जीवन में अपने इतिहास को भुला नहीं सके और मौत में उन्हें किसी ने याद नहीं किया.
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