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इक़बाल का 'मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा'
- Author, रख़्शंदा जलील
- पदनाम, साहित्यकार, बीबीसी हिंदी के लिए
उन्नीसवीं सदी के आख़िर में उर्दू साहित्य विक्टोरियाई ( महारानी विक्टोरिया 1819-1901) मूल्यों के रंग में रंगने लगा था, हालाँकि ऐसी कई ताक़तें भी थीं जो इसे अलग-अलग दिशाओं की तरफ़ खींच रही थीं.
इस दौर में लिखने वाले ज़्यादातर लोग 'अलीगढ़ स्कूल' से ताल्लुक़ रखने वाले या अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैय्यद अहमद ख़ान और उनके साथी अल्ताफ़ हुसैन से प्रभावित थे. लेकिन लिखने वालों की एक दूसरी धारा भी थी जो ये मानने लगी थी कि ब्रितानी हित और मुस्लिम हित अलग-अलग हैं.
मिसाल के तौर पर शिबली नौमानी (1857-1914) और सज्जाद हुसैन ने राष्ट्रवादी और ब्रिटेनविरोधी आवाज़ों को धार देना शुरू किया.
बीसवीं सदी के सबसे बड़े कवियों में से एक सर मोहम्मद इक़बाल (1877-1938) को हमें इसी पृष्ठभूमि में पढ़ना चाहिए.
इक़बाल को ज़्यादातर लोग अल्लामा इक़बाल के नाम से जानते हैं. अल्लामा का अर्थ होता है विद्वान.
इक़बाल में हमें सिर्फ़ इसलिए दिलचस्पी नहीं है क्योंकि वो पहले कवि थे जिन्होंने न केवल पहली बार ये जानने-समझने की कोशिश की कि मुसलमानों के दिल-वो-दिमाग़ में क्या चल रहा है, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि अपनी कविताओं से मुस्लिम समाज को जगाने और क्रांति के लिए प्रेरणा भी दी- शायद ही उनसे पहले किसी उर्दू कवि ने ऐसी कोशिश की हो.
लेक्चरर से लेकर दार्शनिक तक
लाहौर के प्रतिष्ठित गवर्नमेंट कॉलेज से 1899 में ग्रेजुएट करने के बाद इक़बाल ने इसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के लेक्चरर के रूप में नौकरी भी की.
इसके बाद उन्होंने ट्रिनिटी कॉलेज कैम्ब्रिज और जर्मनी के हाइडलबर्ग और म्यूनिख़ में दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया.
इसके बाद उन्होंने क़ानून की भी पढ़ाई की.
वहाँ से लौटने के बाद उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज में दो साल और पढ़ाया और उसके बाद सरकार नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया.
फिर वकालत से अपना किसी तरह गुज़ारा करने लगे और सारा ध्यान पढ़ने-लिखने में लगा दिया.
इक़बाल ब्रितानी सरकार के मुखर आलोचक थे, लेकिन 1922 में उन्होंने नाइटहुड की उपाधि स्वीकार कर सभी को हैरान कर दिया.
1927 में वो पंजाब असेंबली के लिए चुन लिए गए. 1928-29 में अलीगढ़, हैदराबाद और मद्रास विश्वविद्यालयों में उन्होंने छह लेक्चर दिए थे जिससे उनके धार्मिक विचार का पता चलता है.
बाद में इसको एक किताब की शक्ल में छापा गया जिसका नाम था 'रीकंस्ट्रक्शन ऑफ़ रिलिजियस थॉट इन इस्लाम' था.
1931 में उन्होंने लंदन में गोलमेज़ सम्मेलन में भारतीय मुस्लिम प्रतिनिधि के सदस्य के रूप में हिस्सा लिया. इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व आग़ा ख़ां ने किया था.
उनके समकालीन कवि अकबर इलाहाबादी (1846-1921) भी पश्चिम सभ्यता के कड़े विरोधी थे लेकिन पश्चिमी सभ्यता और ख़ासकर अंग्रेज़ों से उनका विरोध सांस्कृति, सामाजिक मूल्यों और राजनीतिक कारणों से था, लेकिन इक़बाल ने धर्म और दर्शन के आधार पर पश्चिमी ज्ञान और अंग्रेज़ी भौतिकवाद पर सवाल खड़े किए.
शुरुआती दौर में इक़बाल और अकबर दोनों जीवन के लिए कला (आर्ट फ़ॉर लाइफ़ सेक) के समर्थक थे. दोनों ही पूरी तरह से राजनीतिक कवि थे और मुस्लिम समाज के भीतर चल रहे द्वंद्व से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे.
ब्रितानी हुकूमत में ज़्यादातर मुसलमान बहुत ही मामूली नौकरी में थे और अंग्रेज़ सरकार से मुसलमानों को मिल रही मान्यता या प्रशंसा दिखावे से ज़्यादा कुछ नहीं थी.
इन सबके कारण कवि इक़बाल को यक़ीन हो चला था कि इस्लामिक समाज में पुनर्जागरण की ज़रुरत है और वो इससे कम पर कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं थे.
दिल को छू लेने वाली अपनी शायरी से उन्होंने भारतीय मुसलमानों को उनके गौरवशाली इतिहास की याद दिलाई और इस गौरवशाली इतिहास से सीखने और उसके रास्ते पर चलने की नसीहत दी.
इक़बाल में बदलाव
अपनी शुरुआती कविताओं में इक़बाल अखंड और स्वतंत्र भारत की बात किया करते थे, जहाँ हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रह सकेंगे, लेकिन भाईचारे और बहुलवाद का ये विश्वास जल्द ही एकेश्वरवाद और व्यक्तिवाद में बदलने लगा.
इक़बाल का ये सफ़र इस तरह देखा जा सकता है.
1904 में तराना-ए-हिंद ('हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा') लिखने वाले इक़बाल ने 1910 में तराना-ए-मिल्ली('मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहाँ हमारा') लिख दिया.
दो दशक बाद 1930 में इलाहाबाद में मुस्लिम लीग की बैठक की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने मुसलमानों के लिए अलग देश का विचार उछाल दिया. लेकिन इक़बाल की इस्लामिक राष्ट्रवाद की विचारधारा में इंसानों के ज़रिए बनाए गए सरहदों के लिए कोई जगह नहीं थी.
अपनी एक कविता गिलामें इक़बाल भारत से शिकायत करते हैं.
यूरोप की ग़ुलामी पे रज़ामंद हुआ तू
मुझको तो गिला तुझसे है, यूरोप से नहीं है
पूर्व और पश्चिम में सामंजस्य बिठाने में नाकाम इक़बाल तब सर्वश्रेष्ठ नज़र आते हैं, जब वो अन्याय और असमानता के ख़िलाफ़ बोलते हैं.
मिसाल के तौर पर 'पंजाब के दहक़ां से' में वो सामंतवाद से संघर्ष कर रहे किसानों को संबोधित करते हैं. अपनी एक और मशहूर नज़्म 'फ़रमान-ए-ख़ुदा: फ़रिश्तों से' में वो लिखते हैं,
जिस खेत से दहक़ां को मयस्सर नहीं रोज़ी
(जिस खेत से किसान को ही दो वक़्त की रोटी नहीं मिल सके)
उस खेत के हर खोसा-ए-गंदुम को जला दो
(उस खेत में उगने वाली फ़सल को जला देना चाहिए)
न्यू टेस्टामेंट ऑफ़ उर्दू पोएट्री
इक़बाल की शुरुआती कविताओं में जो राष्ट्रवाद दिखता है वो धीरे-धीरे बदलने लगता है.
जर्मन दार्शनिक नीत्शे, फ़्रांस के दार्शनिक बर्गसन और जर्मनी के मार्क्स के प्रभाव में इक़बाल की शायरी में एक नया बदलाव आया.
इक़बाल की शायरी पर क़रीब ने नज़र रखने वाले आल अहमद सुरूर ने इक़बाल की इस नई शायरी को 'न्यू टेस्टामेंट ऑफ़ उर्दू पोएट्री' क़रार दिया है.
बाल-ए-जिबरील (1935) से ज़र्ब-ए-कलीम (1936) और अरमांग़ां-ए- हिजाज़ (1938) तक इक़बाल ने अपनी कविताओं के संकलन में मानव क्षमताओं की असीम संभावनाओं पर ज़ोर दिया है.
इन कविताओं की अहमियत इसलिए भी बहुत ज़्यादा है क्योंकि यही वो वक़्त था जब भारत में प्रगतिशील लेखक अपने क़लम से क्रांति कर रहे थे. उस समय इक़बाल और प्रगतिशील लेखक दोनों ही क्रांति और बदलाव की बात कर रहे थे, दोनों ने भारतीय लोगों को सामंतवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए प्रेरित किया.
लेकिन ऐसा करने के लिए इक़बाल ने 'आध्यात्मिक समाजवाद' का सहारा लिया जबकि प्रगतिशील लेखकों ने इसके लिए सोवियत संघ मॉडल के सामाजिक यथार्थवाद को अपनाया.
इक़बाल के गीतों और शेरों का अर्थ अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग था.
इक़बाल की शायरी भारतीय मुसलमानों के लिए बुराइयों से लड़ने और कथित तौर पर दीन से भटके हुए लोगों को सही रास्ता दिखाने का एक ज़रिया थीं, लेकिन ब्रितानियों को इससे कोई परेशानी नहीं थी.
इक़बाल भी अपनी शायरी में बग़ावत की बात करते हैं लेकिन इससे ब्रितानी साम्राज्य को कोई ख़तरा नहीं था और उन्होंने कभी इक़बाल की शायरी पर कोई पाबंदी नहीं लगाई.
लेकिन सिब्ते हसन (1916-1986) जैसे इंक़लाबी शायर से अंग्रेज़ ख़तरा महसूस करते थे और शायद यही वजह है कि उन्होंने सिब्ते हसन की कविताओं के संकलन, 'आज़ादी की नज़्में' पर पाबंदी लगा दी.
विक्टर किरनान ने इक़बाल पर अपने लेख 'द प्रौफ़ेट ऑफ़ चेंज' में लिखा है, "इक़बाल ने बेहद जटिल माहौल के भ्रम और विरोधाभासों को अपनी शायरी से प्रतिबिंबित किया है."
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