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'ताजमहल- हल्दीघाटी का इतिहास फिर से लिखें लेकिन ....'
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
ताजमहल और हल्दीघाटी ने जहां इतिहास के पुर्नलेखन के विवाद पर फिर से चर्चा छेड़ दी है वहीं ये बात भी फ़िर से उठ रही है कि इतिहास के स्कूली पाठ्यक्रम को अधिक समावेशी बनाया जाए.
जाने-माने अर्थशास्त्री और दक्षिण भारत से तालुक्क़ रखनेवाले मोहन गुरुस्वामी कहते हैं, "वर्तमान में जारी बहस में जीत मुरली मनोहर जोशी वैराइटी के इतिहास की हो या रोमिला थापर की, ये इतिहास भी गंगा के मैदानी इलाक़े तक ही सीमित रहेगा. मेरी सबसे बड़ी शिकायत यही रही है कि इसमें भारत के दूसरे हिस्सों के इतिहास या घटनाओं को या तो कोई जगह ही नहीं मिली है या फिर मामूली सा ज़िक्र कर थोड़े में समेट दिया गया है."
असम के इतिहास का कहीं ज़िक्र नहीं
उदाहरण देते हुए मोहन गुरुस्वामी कहते हैं, "दक्षिण का इतिहास उत्तरी भारत से काफ़ी अलग और निश्चित ही अधिक गौरवशाली रहा है लेकिन उसे कुछ ही पन्नों में समेट दिया जाता है. ओडिशा और बंगाल में बारे में शायद बहुत थोड़ा बताया जाता है. और, असम उसके इतिहास का तो कहीं ज़िक्र ही नहीं होता."
गुरुस्वामी वर्तमान में स्कूलों में पढ़ाये जाने वाले इतिहास को "हारे हुए लोगों का इतिहास कहते हैं," जिसमें ग्रीक, हून, अरब, मंगोल, तुर्क से संबंधित बात की गई है लेकिन असम के सरायघाट का ज़िक्र नहीं हैं.
सरायघाट के जंग के साथ वो तालिकोटा की तरफ़ भी इशारा करते हुए कहते हैं कि उसकी बात वैसे नहीं होती जैसे पानीपत की होती है जबकि वो दक्षिण भारत के इतिहास में एक साम्राज्य की समाप्ति की वजह बना.
साल 1565 में उत्तरी कर्णाटक में हुए तालिकोटा युद्द में विजयनगर साम्राज्य की हार दक्कन के सुल्तान की फ़ौज के हाथों हुई जो दक्षिण भारत के इतिहास में एक बड़ा मोड़ लाया था.
असम और ब्रितानी
वहीं असम के सरायघाट में लाछित बोरफुकन की सेना ने मुग़ल फौज को क़रारी शिकस्त दी थी. लेकिन इन निर्णायक लड़ाइयों का ज़िक्र इतिहास की स्कूली किताबों में उस तरह से नहीं होता जैसे पानीपत का होता है और वो भी बार-बार.
जाने-माने उड़िया लेखक केदार मिश्रा मानते हैं कि "गंगा के मैदानी इलाक़ों के अलावा दूसरे क्षेत्रों के इतिहास के साथ भी वैसा ही सलूक किया गया है जैसा कि क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदी के मामले में हुआ है."
भुवनेश्वर में अपनी लेखनी का काम कर रहे केदार मिश्रा कहते हैं, "इतिहास की किताबों का गंगा के मैदानी इलाक़ों तक सीमित रहने का एक मुख्य कारण तो ये रहा है कि सत्ता जिन लोगों के हाथों में केंद्रित रही है वो मुख्यत: इसी इलाक़े से रहे हैं."
इसे एक तरह से बहुसंख्यकों के वर्चस्व को दूसरों पर थोपे जाने की प्रक्रिया के तौर पर देखा जाना चाहिए और वो आपको सिर्फ़ इतिहास तक सीमित नहीं, बल्कि भाषा जैसा कि मैंने पहले कहा, या संस्कृति और कला में भी साफ़ देखने को मिलता है.
बहस नई नहीं है
हालांकि केदार मिश्रा मानते हैं कि ऐसा नहीं है कि ये बात इतिहासकारों के ध्यान में नहीं आई है, बल्कि इसपर तो काफ़ी बहस भी हुई है और उसका असर भी हुआ है कि धीरे-धीरे दक्षिण, उत्तर पूर्वी भारत और ओडिशा जैसे क्षेत्रों को भी पहले के बनिस्बत पाठ्य पुस्तकों में जगह मिली है.
उनका कहना है, "लेकिन ये सच है कि अगर अनुपात में देखें तो गंगा के मैदानी इलाक़ों की बनिस्बत इनका हिस्सा कम बल्कि बहुत ही कम है.'
इतिहासकार मृदुला मुखर्जी जो ख़ुद भी एनसीआरटी की पुस्तकों की लेखनी से जुड़ी रही है मानती हैं कि "इस मामले पर कम से कम पिछले तीस-चालीस सालों से बहस होती रही है और बहुत हद तक कोशिश की गई है कि किताबों के दायरों को बढ़ाया जाये ताकि उसमें उन इलाक़ों या घटनाओं को जगह मिल सके जो अबतक हाशिए पर रहे हैं."
लेकिन वो ये भी कहती हैं कि बहुत सारी घटनाओं या क्षेत्रों को अबतक कम जगह मिलने या बिल्कुल जगह न मिल पाने की वजह इनपर शोध की कमी भी रही है.
रिसर्च स्कॉलर्स को बढ़ावा दिया जाए
वो मानती हैं कि ज़रूरत है कि इन क्षेत्रों पर रिसर्च करने वाले स्कॉलर्स को बढ़ावा दिया जाए.
इतिहासकार राना सफ़वी इस बात से सहमत हैं कि इतिहास को अधिक समावेशी बनाया जाना चाहिए लेकिन वो सवाल करती हैं कि एक स्कूली छात्र की किताब या कोर्स को कितना व्यापक करें?
केदार मिश्रा कहते हैं कि ये बहस सही है कि पाठ्यक्रमों को कितना समावेशी बनाया जाना चाहिए लेकिन उसमें इस बात से बचना ज़रूरी है कि ये बहस इतिहास के दायरे में सीमित रहे और इसे राजनीतिक रंग न दिया जाए.
राना सफ़वी इससे सहमत हैं कि अभी इतिहास पर जो पूरी बहस छिड़ी है वो राजनीतिक है और इतिहास से उसका लेना-देना कम है.
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