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मोदी-शाह ने हिमाचल में क्यों धूमल को किया प्रोजेक्ट?
- Author, हेमंत कुमार
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भाजपा आलाकमान ने हिमाचल के लिए जिस गाड़ी के डिब्बों को दिल्ली से जोड़ कर वर्चुअल इंजन के सहारे चुनाव लड़ने रवाना कर दिया था, उसमें असली वाला इंजन जोड़ना पड़ा है.
ऐसा मैसेज था कि इंजन चुनाव परिणाम आने के बाद जोड़ा जाएगा. भाजपा केंद्रीय नेतृत्व को मानना पड़ा कि जो फॉर्मूला अन्य राज्यों के लिए चलाया गया था, वो हिमाचल में नहीं चलेगा.
बात नहीं बनी
मतदान से महज नौ दिन पहले प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करना साफ़ दर्शाता है कि भाजपा यहां जो अलग रिवायत शुरू करने की सोच रही थी, वो बात बनी नहीं.
दरअसल हिमाचल में कभी भी लीडरशिप घोषित किए बिना चुनाव नहीं हुए हैं. अब भाजपा का यह ताज़ा क़दम कई बातें एकदम साफ़ कर रहा है.
पहली बात तो यह कि भाजपा आलाकमान ने कम से कम हिमाचल के परिप्रेक्ष्य में तो यह मान ही लिया है कि लोकल लीडरशिप और नेशनल लीडरशिप दोनों अलग-अलग प्रभाव रखती हैं.
विधानसभा चुनावों में संगठन को स्थानीय नेतृत्व जिस तरह से एकजुट करता है, वैसा राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं कर पाता. खास तौर पर उन राज्यों में जहां, स्थानीय नेतृत्व ठीक-ठाक हो.
डंडा हिमाचल में नहीं चला
आलाकमान का डंडा यूपी या हरियाणा जैसे राज्यों में तो चल सकता था लेकिन हिमाचल जैसे राज्य में नहीं. यह बात समझ आने में वक्त कुछ ज्यादा लग गया.
सर्द होते पहाड़ के मौसम की मानिंद ठंडा सा प्रचार भी सभी को दिख ही रहा था. उस पर कांग्रेस नेता हर सभा में भाजपा को बिना दूल्हे की बारात कहते थे.
भाजपा के नेता भी जवाब देते-देते परेशान हो रहे थे कि पार्टी ने क्यों मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया.
यह सवाल हरियाणा या उत्तर प्रदेश में भाजपा को हिमाचल की तरह से परेशान नहीं कर रहे थे क्योंकि यहां नेताओं की कोई कमी नहीं है.
हिमाचल के भाजपा नेता आलाकमान के समक्ष बराबर गुहार लगा रहे थे कि किसी को भी आगे करो लेकिन नेतृत्व घोषित होना चाहिए.
ऐसी मुहिम चुनाव की घोषणा से पहले ही चली हुई थी लेकिन बात नहीं बनी. तारीख घोषित हो जाने के बाद भी इस पर आलाकमान की चुप्पी लगातार बनी रही.
लीडरशिप कितनी अहम
यहां के नेताओं के पास तो कोई जवाब था ही नहीं, दिल्ली से आए नेता भी इसे पार्टी की रणनीति का हिस्सा कह रहे थे. अब पिछले दो-तीन दिन के भीतर घटनाक्रम तेजी से बदला.
कहते हैं मोदी-शाह की जोड़ी के समक्ष कुछ करीबी राष्ट्रीय नेताओं ने भी बात रखी कि हिमाचल में लीडरशिप कितनी जरूरी है. उसका असर भी हुआ.
खुद दो दिन से अमित शाह भी यहीं है. हालांकि सोमवार को ही हल्की सी चर्चा शुरू हो गई थी कि दो नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेतृत्व को लेकर अपनी रैली में कुछ स्पष्ट कर सकते हैं.
लेकिन कम समय को देखते हुए शाह ने मंगलवार को ही घोषणा कर दी. यह भी कहा जा रहा है कि यदि लीडरशिप घोषित न करते तो मुकाबला मोदी बनाम वीरभद्र सिंह जैसा ही होता.
इससे भी आलाकमान बचना चाहती थी. उधर, गुजरात से आती हवाओं के बीच भी आलाकमान हिमाचल में ज्यादा नहीं उलझना चाह रही थीं.
वीरभद्र बनाम धूमल
बहरहाल लीडर घोषित न करने के कारण हिमाचल में जो मुकाबला मोदी-बनाम वीरभद्र दिख रहा था अब यकायक ही उसमें बदलाव आ गया है.
सीधे तौर पर एक बार फिर वही पुराना मुकाबला होने जा रहा है यानी वीरभद्र बनाम धूमल.
वर्ष 1998 से इन्हीं दो नेताओं के बीच शह और मात का खेल चल रहा है. लगातार पांचवा मौका है जब यही नेता आमने सामने होंगे.
इससे पहले हुए चार मुकाबलों में दो बार धूमल जीते हैं तो दो बार वीरभद्र सिंह.
अब भाजपा किस तरह से माहौल को गर्म करती हैं और कांग्रेस नए परिदृश्य में क्या रणनीति बनाएगी, यह दो-तीन दिन में साफ़ हो जाएगा.
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