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बजा दूंगा, ले लूंगा... कितना सही है इन शब्दों को बोलना?
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हाल ही में अभिनेता अक्षय कुमार और कॉमेडियन मल्लिका दुआ के बीच कुछ शब्दों को लेकर विवाद हुआ. इस विवाद से कई सवाल उठ सकते हैं जिनमें एक सवाल ये भी हो हो सकता है कि द्विअर्थी शब्दों और वाक्यों का इस्तेमाल कहां तक सही है.
'उसकी बजा दी', 'उसकी तो बज गई', 'तेरी ले लूंगा', 'मेरी तो लग गई', 'वो माल लगती है', 'उसकी तो मार दी' जैसे कई हिंदी और अंग्रेज़ी के वाक्य और शब्द ऐसे हैं, जो हममें से कई लोग अक्सर बोलते हैं या किसी और को बोलते हुए सुनते हैं.
कुछ लोग इसे मज़ाक कहते हैं या बात करने का एक तरीका मानते हैं. इसी तरह कई लोग इन्हें सेक्सिस्ट और अपमानजनक मानते हैं.
अक्षय कुमार के मामले में ही वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ ने उनकी कही बात को आपत्तिजनक कहा था.
ये शब्द कैसे हुए प्रचलित
साइकॉलजिस्ट डीएस नर्बाण ने बीबीसी को बताया कि ये शब्द समाज में नए नहीं हैं. बस अंतर इतना है कि ये अलग-अलग जगहों पर प्रचलित हुए हैं.
वे कहते हैं कि लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने के साथ ही ये शब्द भी यहां से वहां पहुंच रहे हैं.
समाज में आ रहे बदलाव पर नज़र रखने वाले यूनेस्को से संबद्ध डॉक्टर योगेश अटल कहते हैं कि इन शब्दों का उपयोग किसी को गाली देने या उसे नीचा दिखाने के लिए होता है.
उन्होंने बीबीसी को बताया, ''ये शब्द अनायास निकल पड़ते हैं या गुस्से में कहे जाते हैं. एक ही शब्द के कई अर्थ होते हैं. कुछ लोग उसे, उस अर्थ में उपयोग नहीं करते बल्कि उसके ऊपरी मतलब में चले जाते हैं.''
'शोहदों-लफंगों के शब्द'
हिंदी के जानेमाने लेखक काशी नाथ सिंह कहते हैं कि ऐसी भाषा को प्राय: पसंद नहीं किया जाता. इन्हें अधिकतर शोहदे या लफंगे लड़कियों को परेशान करने के लिए कहते हैं.
लेखक काशी नाथ सिंह ने बीबीसी को बताया, ''जो अन्य लोग ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, वो गंभीरता से इसके अर्थों पर नहीं सोचते. वैसे कोई भी सभ्य व्यक्ति ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं करता होगा.''
फिल्में कितनी ज़िम्मेदार
आमतौर पर फिल्मों, टीवी सीरियल और कॉमेडी शोज़ में भी द्विअर्थी शब्द और वाक्य बोले जाते हैं.
इस संबंध में काशी नाथ सिंह कहते हैं, ''ऐसे शब्दों का इस्तेमाल फिल्मों में मिलता है. एक समय पर मराठी अभिनेता और फिल्म प्रोड्यूसर दादा कोंडके अपनी फिल्मों में ऐसे द्विअर्थी डायलॉग का इस्तेमाल करते थे. लेकिन तब दूसरी फिल्मों में ऐसा नहीं होता था. अब इस तरह के डायलॉग वाली कई फिल्में आने लगी हैं.''
फिल्मों की भूमिका पर साइकॉलजिस्ट डीएस नर्बाण कहते हैं, ''सिनेमा में बच्चे देखते हैं कि एक हीरो या हीरोइन किसी डायलॉग को सबके सामने बोल रहे हैं. उस डायलॉग को उसके माता-पिता भी सुन रहे हैं. ऐसे में बच्चे के दिमाग में ये संदेश जाता है कि ऐसी बातें सार्वजनिक रूप से की जा सकती हैं. इन्हें सुनकर किसी को बुरा नहीं लगता.''
निजी और सार्वजनिक भाषा का अंतर
दोहरे अर्थ वाली भाषा के इस्तेमाल पर रेड एफ़एम के लोकप्रिय आरजे रौनक थोड़ी अलग राय रखते हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''इस भाषा का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है क्योंकि जनता भी उसी भाषा में बात करती है. पर इन्हें सुनकर लोगों को अक्सर ग़लत नहीं लगता. लेकिन निजी तौर पर और सार्वजनिक मंच पर कहने वाली बातों में अंतर जरूर होना चाहिए.''
प्रतिस्पर्धा का दबाव
कॉमेडियन संदीप शर्मा द्विअर्थी शब्दों और वाक्यों के इस्तेमाल का एक अलग पहलू बताते हैं.
वे कहते हैं, ''कॉमेडी के क्षेत्र में प्रतियोगिता बहुत बढ़ गर्ई है. जहां कॉमेडियन बहुत हो गए हैं वहां शोज़ भी बढ़ गए हैं. ऐसे में इसी तरह के दोहरे अर्थ वाले जोक्स की मांग की जाती है. इसलिए कॉमेडी शोज़ में ऐसे जोक्स इस्तेमाल हो रहे हैं.''
क्या है मानसिकता?
साइकॉलजिस्ट डॉ. नर्बाण इन शब्दों और वाक्यों के इस्तेमाल का एक बहुत बड़ा कारण ये बताते हैं कि लोगों को इन्हें बोलकर मजबूत और दूसरे से ऊंचा महसूस होता है. वो इन्हें बोल्ड मानते हैं.
लेखक काशी नाथ सिंह कहते हैं कि इस तरह के वाक्य मुहावरे की तरह हो गए हैं. लोगों को कोई नियम बनाकर रोका नहीं जा सकता. लोग कई बार इनके दूसरे अर्थ पर नहीं सोच पाते हैं.
काशी नाथ सिंह इसे लोगों के बचाव का तरीका भी कहते हैं. वे कहते हैं, ''कई बार लोग असल बात कहने का साहस न होने पर ऐसी बातों का इस्तेमाल करते हैं ताकि बाद में उसे मज़ाक कहकर बचा जा सके.''
समाज पर है कोई प्रभाव?
इन शब्दों के सही या ग़लत होने पर डॉ. नर्बाण कहते हैं कि ग़लत शब्द ग़लत ही होते हैं. हो सकता है कि कुछ जगह ये स्वीकार कर लिए गए हों या ज़्यादा इस्तेमाल होते हों, लेकिन ये जहां भी इस्तेमाल हो रहे हैं वहां भी ग़लत ही हैं.
इन शब्दों के प्रभाव के बारे में वे कहते हैं, ''इनका असर निजी और पेशेवर ज़िंदगी दोनों पर पड़ता है. जैसे किसी अनजान के सामने या कहीं नौकरी पाने के लिए आप बहुत सभ्य भाषा का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन, धीरे-धीरे जब आप अपने असल व्यवहार पर आते हैं तो सामने वाला हैरान हो जाता है और आपको चुनने पर अफ़सोस भी कर सकता है. इसलिए ऐसे शब्दों से बचना ही चाहिए ताकि वो आपकी ज़बान पर न चढ़ जाएं.''