You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
'वो हिम्मतवाली नेता जिनका नाम था इंदिरा गांधी'
- Author, आर के धवन
- पदनाम, इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे
31 अक्तूबर 1984 को भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सड़कों पर लोगों का जो गुस्सा और आक्रोश फूटा, नवंबर महीना उसका चश्मदीद गवाह है.
अक्टूबर 1984, इंदिरा गांधी अपने राजनीतिक करियर के बेहद बुरे दौर से गुजर रही थीं. सिख और हिंदुओं के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव चरम पर पहुंच चुका था. सिखों के बेहद पवित्र माने जाने वाले स्थल स्वर्ण मंदिर में चरमपंथियों के घुस जाने के कारण इंदिरा गांधी को वहां सेना भेजनी पड़ी.
सैंकड़ों लोग मारे गए. स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने के कारण समूचे भारत के सिखों में इंदिरा गांधी के प्रति जबरदस्त असंतोष और गुस्सा भड़क उठा. उन्हें जान से मारने की धमिकयां मिलने लगीं.
मगर भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इन धमिकयों के आगे निडर खड़ी रहीं.
बहादुर और धर्मनिरपेक्ष महिला
इंदिरा गांधी को जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं. मगर वे ऐसी निर्भीक महिला थीं कि इसकी उन्होंने कभी परवाह नहीं की.
मैं इंदिरा गांधी के साथ 1962 से लेकर उनकी अंतिम सांस तक रहा. वो बहुमुखी प्रतिभा की धनी थीं. जोश से भरपूर. अपने देश और लोगों के लिए उनके दिल में प्यार था. वे विचारों से पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष थीं.
अपनी धर्मनिरपेक्ष सोच के कारण ही इंदिरा गांधी बहुसंख्यक हिंदुओं और अल्संख्यक मुस्लिमों, सिखों के बीच किए जाने वाले किसी भी भेदभाव का कड़ा विरोध करती थीं. यहां तक कि जान से मारने की धमकी मिलने के बाद भी पार्टी के कहने पर उन्होंने अपने निजी सिख अंगरक्षकों को बदलने से इंकार कर दिया.
स्वर्ण मंदिर घटना के बाद पार्टी ने फैसला लिया कि उनकी सुरक्षा व्यवस्था से सभी सिखों को अलग कर दिया जाए. जब उन्होंने ये सुना तो बहुत नाराज हुईं. उनके आदेश के अनुसार जिन सिख सुरक्षाकर्मियों को हटा दिया गया था उन्हें वापस बुला लिया गया. वे बेहद बहादुर महिला थीं.
अक्टूबर की वो सुबह
31 अक्टूबर की सुबह. इंदिरा गांधी की मौत का दिन. यह दिन भी किसी दूसरे दिन की तरह ही शुरू हुआ था. वे दिल्ली के अपने घर में थीं.
ब्रितानी अभिनेता पीटर उस्तीनोव के साथ लॉन में इंदिरा गांधी के साथ एक इंटरव्यू की तैयारी थी. पीटर इंदिरा गांधी पर एक डाक्यूमेंट्री बना रहे थे.
बेअंत सिंह इंदिरा गांधी के अंगरक्षक थे. जब इंदिरा, पीटर से मिलने के लिए जा रही थी बेअंत ने रास्ते में उन पर हमला कर दिया.
पीटर उस्तीनोव ने बताया था, "हम पचास यार्ड की दूरी पर थे. शुरू में गोलियां चलने की तीन आवाजें आईं. मेरे साथ एक इंडियन कैमरामैन था. गोलियों की आवाज आई तो कैमरामैन ने कहा, लगता है कोई फिर पटाखे छोड़ रहा है. जब मशीनगन की आवाज आई तब समझ में आया, ये पटाखे नहीं थे."
"वह सामने आया और अपने रिवॉल्वर से फायरिंग करने लगा. इससे पहले की हम कुछ समझ पाते वह अपना काम कर चुका था."
इंदिरा नहीं रहीं
इंदिरा जी ज़मीन पर खून में लथपथ पड़ी थीं. चारों ओर अफ़रातफ़री का माहौल था. मैंने एम्बुलेंस खोजा, मगर वहां कोई एंबुलेंस मौजूद नहीं था. तब हमने एक सिक्योरिटी कार मंगाई. इसी बीच गोलियों की आवाजें सुनकर सोनिया गांधी आ चुकी थी. हम आनन-फानन में एम्स के लिए निकल पड़े.
डॉक्टरों ने उनका इलाज शुरू कर दिया. ऐम्स के निदेशक ने बताया कि इंदिरा गांधी की हालत बहुत नाजुक है.
इंदिरा अगले पांच घंटे तक ऑपरेशन टेबल पर रहीं. उन्हें 80 यूनिट से ज्यादा खून चढ़ाया गया. लेकिन डॉक्टरों ने बताया कि उनकी जान संभवतः तभी जा चुकी थीं जब उन्हें पहली गोली लगी.
जैसे ही इंदिरा गांधी के मरने की खबर फैली भारत के राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई.
मैं एम्स, एयरपोर्ट और प्रधानमंत्री आवास के बीच चक्कर काट रहा था. एक तरफ तो इंदिरा के बेटे राजीव गांधी कोलकाता से लौटे रहे थे तो दूसरी ओर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह खबर सुन विदेश यात्रा से वापस आ रहे थे.
राजीव गांधी अगली सुबह इंदिरा गांधी की जगह ले चुके थे. लोग इंदिरा की मौत की खबर से बुरी तरह सन्न थे. उन्हें यकीन नहीं हो रहा था. दुख गुस्से और आक्रोश का रूप लेता जा रहा था. ये बहुत बड़े तूफान की आहट थी.
अगले कुछ ही दिनों में देश भर में सिख विरोधी दंगे भड़कने लगे.
मज़बूत शख्सियत
सिखों के घरों को जलाया जा रहा था. यदि कोई कार में जा रहा हो तो लोग पहले भीतर झांक कर देखते थे कि अंदर कौन बैठा है. कहीं वो सिख तो नहीं. सिखों के लिए बेहद खतरनाक समय था.
3 नवंबर, 1984 को इंदिरा गांधी को अंतिम विदाई दी गई. उनकी हत्या के बाद भड़के दंगों में करीब तीन हज़ार सिख मारे गए.
कुछ लोगों के लिए स्वर्ण मंदिर परिसर में सैनिक कार्रवाई की इजाजत देने और उनकी मौत के बाद भड़की जातीय हिंसा से इंदिरा की प्रतिष्ठा दागदार हो गई.
मगर कुछ लोगों के लिए वे एक मज़बूत शख्सियत थीं. समझौतों से दूर रहने वाली. और अपने देश भारत में मज़बूत आस्था निष्ठा रखने वाली.
"काश, जो हुआ वो नहीं होता. मैं उनके साथ काम करता रहता. वे होतीं तो आज के मुकाबले राजनीतिक व्यवस्था ज़्यादा मज़बूत होती."
मैंने राजीव गांधी के साथ काम करना जारी रखा. मगर राजीव गांधी की भी हत्या 1991 में हो गई.
(आर के धवन से बातचीत पर आधारित)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)