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सरकारी डॉक्टरों की ये 'बीमारी' कौन ठीक करेगा
- Author, सर्वप्रिया सांगवान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
किसी भी राज्य के सरकारी अस्पताल चले जाइए, ज़्यादातर अस्पतालों में मरीज़ों की भीड़ दिखती है और दिखाई देती है इलाज के लिए धक्का-मुक्की.
मरीज़ों को लगता है कि डॉक्टर काम नहीं कर रहे और डॉक्टर कहते हैं उन्हें ज़रूरत से ज़्यादा मरीज़ देखने पड़ते हैं.
राजस्थान में 6 नवंबर को 10 हज़ार डॉक्टर अपना इस्तीफ़ा सरकार को सौंपने जा रहे हैं.
दिल्ली के जाने-माने एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) में भी अपनी मांगों को लेकर रेज़िडेंट डॉक्टरों ने हड़ताल की थी.
बीबीसी ने एम्स के रेज़िडेंट डॉक्टरों से जानने की कोशिश की कि आख़िर समस्या कहां है.
ऑपरेशन की ज़रूरत आज, 1 साल बाद की तारीख़
डॉ. राजीव रंजन
एम्स बनने के पीछे वजह ये थी कि जिन मरीज़ों का इलाज दूर-दराज के क्षेत्रों में नहीं हो सकता था, उन्हें एम्स में लाया जाए इलाज के लिए.
सरकार स्वास्थ्य पर कम ख़र्च करती है. इसका असर सब पर पड़ता है. सबसे पहले तो ये दिक्कत सामने आती है कि हमारे पास डॉक्टरों की कमी है. जो अभी 6-7 नए एम्स खुले हैं, उनमें डॉक्टर्स कम हैं, इमरजेंसी सुविधाएं नहीं हैं तो वो सारे मरीज़ यहीं पर आते हैं.
यहाँ 1700-1800 रेज़िडेंट डॉक्टर हैं और 800 फ़ैकल्टी हैं. उनको रोज़ कम से कम 12 हज़ार लोगों की ओपीडी देखनी होती है. हमारे पास ऑपरेशन थिएटर कम हैं. इसकी वजह से आज जो मरीज़ हमारे पास आएगा, उसे हम 1 साल बाद की तारीख़ देते हैं. एक मरीज़ जिसे आज ऑपरेशन की ज़रूरत है, अगर उसे हम एक साल बाद बुलाएँगे तो शायद बचा ना पाएं.
क्यों नहीं करना चाहते गांवों में काम
डॉ. हरजीत भट्टी
डॉक्टरों पर एक आरोप ये भी लगाया जाता है कि वे ग्रामीण इलाकों में काम नहीं करना चाहते. लेकिन इसके पीछे की वजह किसी ने जानने की कोशिश नहीं की. अगर हम गाँव में जाकर काम करने भी लगें, तो वहां ऐसी सुविधाएं ही नहीं कि एक मरीज़ का इलाज कर सकें. सिर्फ़ नाम के लिए एक डॉक्टर वहां बैठा दिया जाता है.
एक ज़िला अस्पताल में काम करने के दौरान मेरे पास एक 'शॉक' का मरीज़ आया. अस्पताल में 'कैनुला'(नस में लगाई जाने वाली ट्यूब जिससे दवा शरीर में जा सके) नहीं था जिसकी तुरंत ज़रूरत होती है.
मान लीजिए मैं मरीज़ के रिश्तेदार को भेजूं कैनुला लाने के लिए और वो बाहर से किसी तरह ले आए, उसके बाद देखे कि उसके मरीज़ की हालत बिगड़ गई है या बचने की हालत में नहीं है तो वो समझेगा कि ये डॉक्टर की ग़लती है. इन्हीं वजहों से डॉक्टरों के साथ हिंसा की आशंका बढ़ जाती है.
ऐसी जगह जहाँ संसाधनों की कमी की वजह से मैं इलाज नहीं कर पाऊंगा, तो अपनी स्किल भी भूल जाऊंगा क्योंकि फिर मेरे पास एक ही काम रह जाएगा - मरीज़ के कार्ड पर लिखना कि बड़े अस्पताल जाइए.
गोरखपुर में कितने सारे बच्चों की मौत हो रही है. मैंने एक न्यूज़ रिपोर्ट में पढ़ा था कि वहां आस-पास के 10 ज़िलों में कोई भी आईसीयू नहीं चल रहा था. इसलिए सारे मरीज़ गोरखपुर मेडिकल कॉलेज आ रहे थे. एक ही जगह पर जब इतने सारे लोग आने लगेंगे, जहाँ कम डॉक्टर हैं, कम संसाधन हैं तो वहां डॉक्टर मजबूर है और मरीज़ को लगता है कि डॉक्टर काम नहीं करना चाहता.
'कैसे करेंगे स्पेशलिस्ट की कमी को पूरा'
इस देश में 80% स्पेशलिस्ट डॉक्टर कम हैं. एक लाख एमबीबीएस किए हुए डॉक्टर आगे की पढाई करना चाहते हैं, लेकिन कोर्स ही मौजूद नहीं हैं. सीटें कम हैं. तो पूरे देश में स्पेशलिस्ट की कमी को आप कैसे पूरा कर पाएंगे.
एम्स जो रिसर्च और क्वालिटी डॉक्टरों को बनाने के लिए बना था, वो आज सिर्फ़ मरीज़ों का इलाज कर रहा है. प्राइमरी हेल्थ सेंटर, सेकेंडरी हेल्थ सेंटर बने तो हुए हैं, लेकिन वहां पर संसाधन ना होने की वजह से मरीज़ों को एम्स भेजा जा रहा है. यानी जो इलाज उनके घर के पास हो जाना चाहिए था, वो हज़ार किलोमीटर दूर उन्हें करवाने आना पड़ रहा है.
सरकार को स्वास्थ्य सुविधाओं और मेडिकल एजुकेशन में अपना निवेश बढ़ाना पड़ेगा. प्राइवेट अस्पतालों या कॉरपोरेट पर निर्भर नहीं किया जा सकता.
इमारतों का काम लटका रहता है
डॉ. जसवंत जांगड़ा
कुछ इमारतें बन रही हैं, लेकिन कंस्ट्रक्शन बीच में लटका हुआ है. उनकी डेडलाइन भी काफ़ी वक़्त पहले ख़त्म हो चुकी है. ऑपरेशन थिएटर बनना था, जच्चा-बच्चा केंद्र बनना था और कई इमारतें बननी थीं, लेकिन वक्त से पूरी नहीं होतीं. भीड़ इतनी रहती है कि डॉक्टरों को वहां से निकलने तक का रास्ता मुश्किल से मिलता है. ख़ुद मरीज़ इतने हताश हो जाते हैं कि अपनी बीमारी तक ठीक से नहीं बता पाते.
डॉक्टरों के रहने के लिए जगह नहीं है, हॉस्टल नहीं है. बाहर कहीं किराए पर घर लेकर रहना पड़ता है. एक रेज़िडेंट डॉक्टर जब रात को 12-1 बजे फ़्री होता है तो उसको काफ़ी दिक्कत होती है घर जाने में और फिर सुबह जल्दी उठ कर भी आना पड़ता है.
सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के सामने एक और समस्या है- लीगल केस की वजह से उनका ज़्यादातर वक्त कोर्ट में बीतता है. ऐक्सीडेंट के मामलों में प्राइवेट डॉक्टर लीगल केस की वजह से बचना चाहते हैं और सरकारी अस्पतालों में केस रेफ़र कर देते हैं.
डॉक्टर खुद बीमार, कैसे करेंगे इलाज
डॉ. अनिल शेखावत, मनोचिकित्सक
लंबे वक्त तक लगातार काम करने की वजह से रेज़िडेंट डॉक्टरों में डिप्रेशन बढ़ रहा है. सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के हिसाब से आप हफ़्ते में 48 घंटे ही काम कर सकते हैं, लेकिन औसतन एक रेजि़डेंट डॉक्टर दो दिन में 48 घंटे काम कर रहा है. इसके अलावा उस पर अकादमिक कामों का बोझ भी है. उसे पढ़ना भी है. अस्पताल के दूसरे काम भी करने पड़ते हैं. रहने की जगह तक मुहैया नहीं कराई जा रही है.
इतनी सारी दिक्कतों के साथ उसकी निजी ज़िंदगी पर असर पड़ना भी लाज़मी है. स्ट्रेस की वजह से रोगों से लड़ने की ताकत कम हो रही है. इसलिए वे मरीज़ों से बीमारियां पकड़ रहे हैं जिसे क्रॉस इंफ़ेक्शन कहा जाता है.
एक डॉक्टर के लिए मानसिक तौर पर ठीक रहना ज़्यादा ज़रूरी है क्योंकि तभी वो अपने मरीज़ों को ठीक से समझ पाएगा, उनका इलाज कर पाएगा. इसलिए एम्स के रेज़ि़डेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने अपने लिए मनोचिकित्सकों की मांग भी रखी है.
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