You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
अयोध्या: संतों को 100 मीटर के राम नहीं, मंदिर चाहिए
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, अयोध्या से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या में सरयू तट पर भगवान राम की सौ मीटर ऊंची प्रतिमा स्थापित करने की तैयारी कर रही है लेकिन अयोध्या के संत इसके विरोध में आ गए हैं.
संतों का कहना है कि प्रतिमा की ऊंचाई का सरकार रिकॉर्ड तो बना सकती है लेकिन न तो ये शास्त्र सम्मत होगा और न ही इससे प्रतिमा का सम्मान हो सकेगा.
राम जन्म भूमि न्यास के महंत आचार्य सत्येंद्र दास ने बीबीसी को बताया कि भगवान राम की प्रतिमा खुले में स्थापित नहीं की जा सकती, उसके लिए ज़रूरी है कि मंदिर बनाया जाए.
वो कहते हैं, "प्रतिमा बिना प्राण प्रतिष्ठा के स्थापित करने का कोई औचित्य नहीं है. भगवान राम की प्रतिमा या तो मंदिर के भीतर स्थापित हो या फिर प्रतिमा के ऊपर छतरी भी बनाई जाए. दूसरे, इतनी ऊंची प्रतिमा को रोज़ स्नान कराना और विधिवत पूजा करना भी आसान नहीं है. ऐसी स्थिति में भगवान राम की उस प्रतिमा का ही नहीं बल्कि उनका भी अनादर होगा."
'प्रतिमा की स्थापना, सरकार की राजनीति'
महंत सत्येंद्र दास सवाल उठाते हैं कि सरकार को कोशिश ये करनी चाहिए कि वो भगवान राम की जन्मभूमि में मंदिर-मस्जिद विवाद को सुलझाकर मंदिर भी बनाए और फिर उनकी प्रतिमा भी स्थापित करे.
वो कहते हैं, "सरकार का कहना है कि इसके माध्यम से वो बताना चाहती है कि दूर से ही लोग जान जाएं कि ये अयोध्या है और भगवान राम की जन्मभूमि है. आख़िर किसे नहीं पता है कि अयोध्या और भगवान राम का क्या संबंध है?"
महंत सत्येंद्र दास सीधे तौर पर कहते हैं कि सरकार प्रतिमा की स्थापना का शिगूफ़ा छोड़कर सिर्फ़ राजनीति कर रही है क्योंकि उसे पता है कि इससे वो लोगों का ध्यान आकर्षित कर पाएगी कि ये सरकार भगवान राम को लेकर कितनी संजीदा है.
वो कहते हैं कि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है, सरकार राम मंदिर मामले से लोगों का ध्यान हटाने के लिए ऐसा करने की कोशिश कर रही है.
महंत सत्येंद्र दास जैसी राय अयोध्या के दूसरे साधु-संतों की भी है. दिगंबर अखाड़े के महंत आचार्य सुरेश दास भी प्रतिमा की स्थापना को शास्त्र सम्मत नहीं मानते. उनका कहना है, "अन्य देवताओं की प्रतिमा तो खुले में स्थापित हो सकती है लेकिन भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, उनकी प्रतिमा मंदिर के भीतर ही स्थापित होनी चाहिए."
'साधु-संतों से सलाह क्यों नहीं ली?'
महंत सत्येंद्र दास कहते हैं कि इसके पीछे सरकार की सोच अच्छी है लेकिन इस बारे में उसे साधु-संतों की राय भी लेनी चाहिए. महंत सत्येंद्र दास का भी कहना है कि इस मामले में सरकार ने साधु-संतों से सलाह करने की कोई ज़रूरत नहीं समझी.
अयोध्या में ही रहने वाले एक अन्य संत और निर्वाणी अखाड़ा के महंत आचार्य धर्मदास भी भगवान राम की खुले में प्रतिमा की स्थापना के विरोध में हैं. उनका कहना है कि प्रतिमा की स्थापना की बात करके सरकार राम मंदिर के निर्माण के अपने वादे से लोगों का ध्यान हटाना चाहती है.
राज्य सरकार ने सरयू तट पर भगवान राम की एक विशाल प्रतिमा की स्थापना पर विचार कर रही है.
हालांकि इसके लिए अभी उसे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की मंज़ूरी लेनी होगी, लेकिन बताया जा रहा है कि इस मंज़ूरी के मिलने के बाद सरकार प्रतिमा निर्माण के काम को आगे बढ़ा सकती है.
सरकार की इस कोशिश की कुछ लोगों ने ये कहकर आलोचना की थी कि ये सरकारी धन से किसी ख़ास धर्म को बढ़ावा देना है, जिसकी अनुमति हमारा संविधान नहीं देता है.