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दो बच्चे, दो अलग दिवाली!
- Author, कमलेश और गुरप्रीत
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिवाली पर पटाखों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में 31 अक्तूबर तक पटाखों की बिक्री पर रोक लगाई है. हालांकि, पटाखे ख़रीदने और जलाने पर फिलहाल कोई पाबंदी नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का कुछ लोग विरोध कर रहे हैं तो कुछ इसे प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए ज़रूरी बता रहे हैं.
लेकिन बच्चे, जिनमें पटाखे जलाने का बहुत क्रेज़ होता है, वो इस मसले पर क्या सोचते हैं, ये जानने के लिए हमने दो अलग-अलग बच्चों से बात की.
इनमें से एक बच्चा सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का पूरी तरह समर्थन करता है. उसने न सिर्फ़ ख़ुद पटाखे न जलाने का संकल्प लिया है बल्कि वो दूसरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित कर रहा है.
'दिवाली रोशनी का त्यौहार है, प्रदूषण फैलाने का नहीं'
मैं आदित्य हूं. 11 साल का हूं. दिल्ली के हौज़ ख़ास इलाक़े के पास रहता हूं. इस दिवाली मैं पटाखे नहीं जलाऊंगा.
पटाखों से वायु और ध्वनि प्रदूषण होता है. स्किन की समस्या भी हो जाती है.
कितना नुकसान होता है पटाखों से. किसी को पटाखे नहीं छोड़ने चाहिए.
मैं सबको पटाखों के नुकसान बताता रहता हूं. स्कूल से आने के बाद मैं और मेरे दोस्त सबको समझाते हैं.
हमने मोहल्ले में कई पोस्टर चिपका दिए हैं. इन पोस्टरों पर पटाखों के नुकसान लिखे हैं.
'हम उन पैसों से कुछ अच्छा ख़रीद सकते हैं'
एक-दो बार किसी ने हमारे पोस्टर फाड़ दिए. लेकिन हमने फिर से वहीं नए पोस्टर चिपका दिए.
पटाखे ख़रीदने में कितने पैसे खर्च हो जाते हैं. हम उन पैसों से कुछ और अच्छा ख़रीद सकते हैं.
पटाखे बनाने वाली जगहों के बारे में मैंने सुना है कि वहां बाल मजदूर काम करते हैं. उनकी सेहत पर इसका बुरा असर पड़ता है.
अगर हम पटाखे ख़रीदना और जलाना बंद कर देंगे तो उन बच्चों को भी बचा पाएंगे.
एक-दो बच्चों को छोड़कर सबने हमारी बात मान ली है. कुछ बड़े अब भी पटाखे छोड़ते हैं. वो हमारी बात सुनते ही नहीं. लेकिन हम उन्हें मना लेंगे.
पटाखों के बिना कैसे मनाएंगे दिवाली?
दिवाली में मज़े करने के और कई तरीके हैं. हम अपने दोस्तों के साथ सुंदर रंगों और फूलों से रंगोली बनाते हैं. फिर एक दूसरे की रंगोली देखते हैं. हमें इसी में मज़ा आता है.
दिवाली पर नए कपड़े पहनेंगे और मिठाई खाएंगे और प्रदूषण मुक्त दिवाली मनाएंगे.
एक दूसरा बच्चा है जो इस दिवाली पटाखे जलाना चाहता है. वो चाहता है कि पटाखे मिलने बंद न हों, भले ही बड़े और खतरनाक पटाखे न मिलें पर छोटे ज़रूर मिल जाएं. पढ़िए इस बच्चे का क्या कहना है.
पटाखों के बिना कैसी दिवाली
मैं अतुल सिंह गुसाईं, दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में रहता हूं. मेरी उम्र 11 साल है और मैं छठी कक्षा में पढ़ता हूं.
मैं इस दिवाली पर पटाखे जलाना चाहता हूं. मुझे पटाखे जलाना अच्छा लगता है. दिवाली पर मैं दीये भी जलाऊंगा और मिठाई भी खाऊंगा.
अभी मेरे चाचा भी मेरे और छोटे भाई के लिए पटाखे लाए थे. हमने वो भी जलाए. अब दिवाली पर भी जलाएंगे.
हां, सरकार ने बड़े पटाखों की बिक्री पर रोक लगाई थी क्योंकि उनसे ज़्यादा धुंआ निकलता है और प्रदूषण फैलता है.
इसलिए मेरे पापा बड़े पटाखे नहीं लाते. हम मुर्गा छाप, फुलझड़ी और चकरी जलाकर ही दीवाली मनाते हैं.
पर अगर बाज़ार में पूरी तरह पटाखे नहीं मिलेंगे तो दिवाली पर अच्छा नहीं लगेगा, मज़ा नहीं आएगा. फिर दीयों से दिवाली मनाएंगे.
टीचर भी पटाखे न जलाने के लिए कहती हैं. वो बताती हैं कि इससे प्रदूषण होता है. एक बार मेरे भाई के हाथ में ही पटाखा फूट गया था. इसलिए मैं पटाखा फूटने से पहले ही उसे फेंक देता हूं.
पर जब दिवाली पर सभी लोग पटाखे जलाते हैं तो मेरा भी मन करता है. इसलिए पटाखे अगर बंद करने हैं तो ख़तरनाक पटाखों को कर दें, छोटे पटाखे तो मिलने चाहिए.
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