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'सीधी सी बात है, हमारी दिवाली काली हो गई'
- Author, फैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'सीधी सी बात है काली दिवाली हो गई,' जामा मस्जिद के ठीक पीछे वाली गली में पटाख़ों की बंद दुकानों के सामने एक चौकी पर विराजमान हैं भारी शरीर और सांवले रंग वाले अजय कुमार.
अजय कुमार उन 250 लोगों में से एक हैं जिन्हें 12 सिंतबर को पुराने बैन के ख़त्म होने के बाद पटाख़े बेचने का अस्थायी लाइसेंस मिला था और वो इस साल पहले के सालों की तरह सात-आठ लाख रुपए का धंधा करना चाहते थे, जिससे दीवाली शानदार हो सके लेकिन वो हो न सका.
अपनी बात समझाते हुए अजय कुमार कहते हैं, ''अगर मेरी जेब में पैसे नहीं होंगे तो बच्चों को कैसे तोहफ़े दिलवाउंगा... कैसे पूजा करूंगा, मिठाई ख़रीदूंगा. मैंने पहले ही क़र्ज ले रखा है, मुझे टेंपररी लाइसेंस शुक्रवार को मिला, रविवार को माल ख़रीदा और सोमवार को ऑर्डर आ गया कि पटाख़ों की बिक्री पर रोक लग गई.''
क्या होगा असर?
पटाख़ों पर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल नवंबर में बैन लगाया था जो इसी साल 12 सितंबर को ख़त्म हुआ. दिवाली को देखते हुए प्रशासन ने पुराने सालों की तरह अस्थायी लाइसेंस देने का काम भी शुरु कर दिया था, क़रीब 250 लोगों को वो दिया भी गया लेकिन फिर सुप्रीम कोर्ट का नया हुक्म आ गया - राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पटाख़ों की बिक्री पर पूरी रोक.
पुरानी दिल्ली के पटाख़ों के बड़े व्यापारी अजीत कहते हैं कि नये लाइसेंस मिलने के बाद ज़ाहिर है व्यापारियों ने माल लिया और अब वो फंस गये हैं, माल वो बेच नहीं सकते हैं.
वो कहते हैं कि पिछले साल के हुक्म के खिलाफ़ पटाख़ा व्यापारी अदालत गये थे जिसने उनकी बात सुनी और समझी लेकिन फिर से किसी ने अपील दाख़िल कर दी और कोर्ट ने बैन लगा दिया.
अब राजधानी और पास के लगभग सभी शहरों में पटाख़ों की दुकानें या तो दुकानदारों ने ख़ुद से बंद कर दी हैं या पुलिस और प्रशासन ने उन्हें ऐसा करने को कहा है.
राजधानी में क़रीब 1,000 ऐसे व्यापारी हैं जो पटाख़ों का कारोबार करते हैं और वो कह रहे हैं कि उन्हें कम से कम 700 करोड़ रूपयों का नुक़सान बर्दाश्त करना होगा.
कारोबारी काफ़ी परेशान
वो कहते हैं कि दीवाली का सीज़न वो वक़्त होता है जब साल में उनकी सबसे अधिक कमाई होती है और पिछले साल धंधा फीका था जिसकी भरपाई वो इस बार करना चाहते थे.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दीवाली के वक्त पटाखे छोड़े जाने से भारी मात्रा में प्रदूषण फैलता है लेकिन व्यापारी तर्क सुनने को तैयार नहीं और हर तरह की बातें कह रहे हैं.
अरुण कुमार गोयल कहते हैं, ''एसी से भी प्रदूषण होता है, वो क्या कहते हैं ओज़ोन, कोई कहता है ओज़ोन लेयर में छेद, वो हंसते हुए कहते हैं हां छेद वो भी क्या पटाख़े ने कर दी है!''
कमल मलहोत्रा कहते है ये क्या फ़ैसला है कि ख़ुद ही उसे हटाते हैं और फिर बैन भी लगा देते हैं!
वहां मौजूद कुछ लोग ये भी सवाल उठाते हैं कि प्रदुषण का सवाल बक़रीद के वक्त क्यों नहीं आया जब जानवरों का ख़ून नालियों में बह रहा होता है और हिंदू त्योहारों के साथ ही ऐसा भेदभाव क्यों. लेकिन इसपर पास खड़े दूसरे लोग ऐतराज़ जताते हैं और कहते हैं कि पटाख़ों के काम में मुसलमान और दूसरे समुदाय के लोग भी शामिल हैं इसलिए इस बात का कोई तुक नहीं.
कितने लोग होंगे बेकार?
अजय कुमार दावा करते हैं कि पटाख़े के व्यापार में कम से कम 20 लाख लोग लगे हैं. क्योंकि ये मामला सिर्फ़ बेचने वालों तक ही सीमित नहीं है बल्कि मज़दूर है, जो इसके ट्रांसपोर्ट के काम में लगे हैं यहां तक कि जो बिकने के बाद कार्टन ख़रीदकर ले जाते हैं वो तक.
वहीं एक गत्ते वाले मिल जाता है जो कहता है कि उसे पांच रूपये किलो की बचत इन गत्तों को बेचने से होती थी जो इस साल मारी गई.
कुछ लोग एक स्वर में कहते हैं, 'एक सवाल करना चाहते हैं, कहीं ये मैगी वाला मामला तो नहीं जब मैगी पर बैन लगा और रामदेव का मैगी ब्रांड बाज़ार में आ गया. कहीं अंबानी और अडानी तो अब पटाख़े के धंधे में तो नहीं घुस रहे....
ये पूछे जाने पर कि क्या व्यापारी देश को सबसे ऊंची अदालत को फिर से अपनी बात समझाने की कोशिश करेंगे, वहां मौजूद एक शख़्स मनोज गु्प्ता शेर में कुछ यूं जवाब देते हैं:
''घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है, पहले ये तय हो इस घर को बचायें कैसे!''
और साथ ही कहते हैं, मार दिया सुप्रीम कोर्ट ने.
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