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गोरखपुर दंगा: योगी को अभियुक्त बनाने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई टली
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
इलाहाबाद हाई कोर्ट में सोमवार को इस बात पर सुनवाई होनी थी कि 10 साल पहले गोरखपुर में हुए दंगे के मामले में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और कुछ अन्य बीजेपी नेताओं को अभियुक्त बनाया जाए या नहीं.
लेकिन राज्य के महाधिवक्ता या अपर महाधिवक्ता के हाजिर न होने के कारण अब सुनवाई 23 अक्टूबर को होगी.
इस मामले में राज्य सरकार ने पहले आदित्यनाथ योगी को अभियुक्त बनाने से ये कहकर मना कर दिया था कि उनके ख़िलाफ़ कोई साक्ष्य नहीं हैं.
हालांकि याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बिना किसी जांच और कार्रवाई के ही सरकार ने क्लोज़र रिपोर्ट फ़ाइल कर दी.
गोरखपुर में साल 2007 में हुए दंगों के मामले में योगी और कुछ अन्य नेताओं पर हाई कोर्ट ने मुक़दमा चलाने के बारे में राज्य सरकार से दोबारा पूछताछ की थी और जवाब देने के लिए दो हफ़्ते का समय दिया था. कोर्ट ने सुनवाई के लिए नौ अक्टूबर की तारीख़ तय की है.
इससे पहले राज्य सरकार ने मामले में ये कहते हुए क्लोज़र रिपोर्ट लगा दी थी कि सीबीसीआईडी की जांच में इसमें इन नेताओं के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिले.
सुनवाई
याचिकाकर्ताओं के वकील एसएफ़ए नक़वी कहते हैं, "सुनवाई तो इसी बात की होनी है कि योगी और अन्य बीजेपी नेताओं को दंगा भड़काने के मामले में अभियुक्त बनाया जाए या नहीं.''
उन्होंने कहा, ''इस मामले में राज्य सरकार ने क्लोज़र रिपोर्ट लगा दी थी, लेकिन हमारी इस आपत्ति के बाद कि सरकार के मुलाजिम अपने ही मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की मांग कैसे करेंगे? कोर्ट ने अब सरकार से दोबारा जवाब तलब किया है."
साल 2007 की 27 जनवरी को गोरखपुर में सांप्रदायिक दंगा हुआ था. आरोप है कि इस दंगे में दो लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे.
इस मामले में दर्ज एफ़आईआर में आरोप है कि तत्कालीन बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ, गोरखपुर के विधायक राधा मोहन दास अग्रवाल और गोरखपुर की तत्कालीन मेयर अंजू चौधरी ने रेलवे स्टेशन के पास भड़काऊ भाषण दिया था और उसी के बाद दंगा भड़का था.
कोर्ट का हस्तक्षेप
इस मामले में हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद योगी आदित्यनाथ समेत बीजेपी के कई नेताओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई थी. इन लोगों पर एफ़आईआर दर्ज कराने के लिए गोरखपुर के एक पत्रकार परवेज़ परवाज़ और सामाजिक कार्यकर्ता असद हयात ने याचिका दाख़िल की थी.
परवेज़ परवाज़ बताते हैं, "मैंने अपनी आँखों से देखा था कि रेलवे स्टेशन के पास मंच पर ये लोग भाषण दे रहे थे और एक के बदले 10 मुसलमानों को मारने जैसी बातें कह रहे थे. तमाम साक्ष्य मौजूद होने के बावजूद सरकार को कुछ भी नहीं मिला, ये समझ से परे है. इसीलिए शायद कोर्ट ने भी इनसे सब कुछ जल्द पेश करने को कहा है."
एफ़आईआर दर्ज होने के बाद सरकार ने मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इसे किसी अन्य एजेंसी को सौंपे जाने की मांग की थी.
इस दौराम अंजू चौधरी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने काफ़ी दिनों तक स्टे कर रखा था, लेकिन 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने स्टे वापस ले लिया.
इस दौरान राज्य में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सरकारें रहीं, लेकिन मामले की पैरवी में दोनों सरकारों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.
वहीं इस साल मार्च में बीजेपी सरकार बनने के बाद राज्य के मुख्य सचिव ने हाई कोर्ट से ये कहते हुए केस को बंद करने की मांग की कि जांच एजेंसी को कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिल सके.
हालांकि उस वक्त यह सवाल उठा था कि गृह विभाग के अफसर अपने ही मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी कैसे दे सकते हैं. इसी का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने सरकार से दोबारा अपना पक्ष रखने का समय दिया है.
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