अरुणाचल प्रदेश में हेलीकॉप्टर उड़ाना कितना खतरनाक?

    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए

भारतीय वायु सेना के एमआई-17 हेलीकॉप्टर के शुक्रवार को अरुणाचल प्रदेश के तवांग में दुर्घटनाग्रस्त होने से इसमें सवार पांच लोगों की मौत हो गई.

पहाड़ों से घिरे अरुणाचल प्रदेश में इससे पहले भी इस तरह के कई हेलीकॉप्टर हादसे हो चुके हैं. ऐसे में सवाल ये कि क्या अरुणाचल प्रदेश में हेलिकॉप्टर उड़ाना खतरनाक है?

भारतीय वायु सेना के ग्रुप कैप्टन (रिटायर) केएनजी नायर इससे इंकार करते हैं. नायर कहते हैं, ''अरुणाचल प्रदेश में हेलीकॉप्टर उड़ाने में कोई समस्या नहीं हैं. अरुणाचल प्रदेश तो बहुत सुरक्षित है. वहां कोई खतरा नहीं है. अरुणाचल में हेलीकॉप्टर हादसे होते रहते है, ऐसा कहना महज एक संयोग की बात है.

  • इसके लिए इस क्षेत्र को दुनिया का दूसरा बरमूडा ट्रांयगल कहना ठीक नहीं होगा. मैंने भारतीय वायु सेना में रहते हुए साढ़े छह साल वहां हेलीकॉप्टर उड़ाया है.
  • मैंने वहां एमआई 17, बेल 421 जैसे बड़े जहाज उड़ाए हैं. ऐसे पहाड़ी इलाकों में फ्लाई करते समय सबसे जरूरी बात होती है कि आपका हेलीकॉप्टर कभी भी बादलों में न जाए. ''

मुंबई में थाम्बे एविएशन नाम से अपनी खुद की कंपनी चला रहे नायर को अरुणाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर के कई पहाड़ी राज्यों में हेलीकॉप्टर उड़ाने का लंबा अनुभव रहा है.

जब मुख्यमंत्री की हुई थी हेलीकॉप्टर हादसे में मौत

अरुणाचल प्रदेश में इससे पहले भी कई हेलीकॉप्टर हादसे हो चुके हैं. साल 2011 में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दोर्जी खांडू की मौत एक हेलीकॉप्टर हादसे में हुई थी.

अब स्थिति ऐसी बन गई है कि लोग इस क्षेत्र में हेलीकॉप्टर से सफर करने को बहुत बड़ा खतरा मानने लगे हैं. हालांकि चीन की सीमा से सटे इस राज्य में कई ऐसे इलाके हैं, जहां पहुंचने के लिए हेलीकॉप्टर ही एकमात्र विकल्प होता है.

बादलों से होता है खतरा

अरुणाचल प्रदेश में हेलीकॉप्टर हादसों के संदर्भ में मुंबई से फोन पर बात करते हुए नायर ने बीबीसी से कहा, ''इन हादसों को लेकर आप किसी पर सीधे लापरवाही का आरोप नहीं लगा सकते.

  • मुझे नहीं मालूम कि शक्रवार को भारतीय वायु सेना का एमआई-17 हेलीकॉप्टर कैसे दुर्घटनाग्रस्त हुआ. लेकिन ऐसे पहाड़ी इलाकों मे फ्लाई करने से पहले मौसम का बहुत ध्यान रखना पड़ता है.
  • हमारा एक स्टैण्डर्ड ऑपरेशन प्रोसिजर होता है. इसके तहत खराब मौसम में हमें क्या करना है और क्या नहीं, इस पूरी योजना के साथ उड़ान भरते हैं. मैं भारतीय वायु सेना में रहते हुए इस इलाके में काफी फ्लाई कर चुका हूं.
  • इसके अलावा रिटायर होने के बाद पूर्वोत्तर राज्यों में साढ़े पांच साल तक प्राइवेट कंपनी का हेलीकॉप्टर उड़ाया है. उड़ान भरने का पहला नियम होता है कि पहाड़ी इलाके में जब आप हेलीकॉप्टर उड़ा रहें हों तो उसे कभी भी बादलों में न जाने दें.
  • अगर हेलीकॉप्टर बादलों में घुस जाएगा तो पायलट को यह पता नहीं लग पाएगा कि आगे क्या है. पूर्व मुख्यमंत्री खांडू जिस हेलीकॉप्टर में थे वह बादलों में चला गया था और बाद में पहाड़ी से जा टकराया.''

नायर आगे कहते है, ''पायलट कहीं के लिए भी उड़ान भरे लेकिन उनके पास इन पहाड़ी इलाकों में एक वैकल्पिक मार्ग की जानकारी ज़रूर होनी चाहिए.

  • इसके अलावा पहाड़ियों पर फ्लाई कर रहे हैं तो ज़मीन के साथ विजुअल कांटेक्ट रखना पड़ेगा. इससे पायलट को पता रहता है कि कहां वैली है और कहां गांव और तारें हैं.
  • सबकुछ दिखाई देना चाहिए. इन सारी बातों को मेप में मार्क करके ही उड़ान भरी जाती है ताकि मुश्किल समय में सही फैसला लिया जा सके.''

पायलटों की लापरवाही से हादसे?

अगर इन सारी बातों से पायलट अवगत होता है तो फिर हादसे क्या लापरवाही के कारण होते हैं?

इस सवाल के जवाब में नायर कहते हैं, 'शुक्रवार के हादसे के बारे में मुझे कुछ भी मालूम नहीं है. इसलिए मैं इस घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे सकता.

  • लेकिन यह कह सकता हूं कि भारतीय वायु सेना के हेलीकाप्टरों में तकनीकी तौर पर समस्या नहीं है. करीब सारे नए जहाज हैं जो कि तकनीकी रूप से काफी सुरक्षित भी हैं.
  • बात जहां तक पायलट की लापरवाही की है तो आपको बता दूं कि भारतीय वायु सेना में कोई भी पायलट सीधे कैप्टन नहीं बन जाता. एयर फोर्स का पायलट काफी योग्य होता है.
  • एयर फोर्स में प्रशिक्षण को लेकर काफी सावधानियां बरती जाती हैं, ताकि पायलटों के कौशल में निखार लाया जा सके.
  • पायलट को पहले फ्लाइट कमांडर के साथ फ्लाई करना पड़ता हैं. इस तरह कैप्टन बनने में उसे तीन से चार साल का वक्त लग जाता है. हादसे की कई और वजह भी होती हैं. क्योंकि कई बार उंची पहाड़ियों पर हवा के रुख को समझ पाना बेहद मुश्किल होता है.
  • जैसे ही हवा का पैटर्न बदलता है उस समय जहाज की गति अचानक बढ़ जाती है. कई बार कम हो जाती है और कई बार जहाज नीचे की और गिरने लगता है. पायलट कई बार अंदाजा नहीं लगा सकते कि ऐसी जगहों पर हवा की दिशा कैसी होती है.''

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