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क्यों दोबारा बोलने लगे हैं अरविंद केजरीवाल?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी चुप्पी पर ख़ुद चुप्पी तोड़ी है.
अरविंद केजरीवाल ने कहा, "वो शांत हैं क्योंकि जनता बोल रही है." इसके पहले बुधवार को दिल्ली विधानसभा में बोलते हुए उन्होंने कहा था, "दिल्ली का मुख्यमंत्री हूं, कोई आतंकवादी नहीं हूं."
चौबीस घंटे के अंदर उनके दो बयान ऐसे आए जिसने अरविंद केजरीवाल को दोबारा मीडिया में चर्चा का विषय बना दिया है. अब तक उनके तीन महीने की चुप्पी पर सवाल पूछे जा रहे थे, लेकिन अब उनके चुप्पी तोड़ने पर बातें हो रही है.
कब से चुप हैं केजरीवाल?
पंजाब विधानसभा चुनाव में हार के बाद बड़े आक्रमक हो कर अरविंद केजरीवाल ने चुनाव में इस्तेमाल होने वाली इवीएम मशीन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला था. लेकिन उसके तुरंत बाद दिल्ली नगर निगम चुनाव में हार ने उनको थोड़ा शांत होने पर मजबूर कर दिया था.
रही सही कसर उन्हीं की पार्टी के बाग़ी नेता कपिल मिश्रा ने पूरी कर दी थी. कपिल मिश्रा ने अरविंद केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाए, जिसका जवाब देने के बजाए केजरीवाल ने चुप्पी साध ली.
क्या ये उनकी रणनीति है?
तो क्या ये केजरीवाल की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है. या तूफ़ान से पहले की शांति है.
वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी कहते हैं, "केजरीवाल की तरफ से अल्प विराम था. वो चुप नहीं हुए थे. वो सही मौके की तलाश में थे. आज जब जीएसटी, नोटबंदी के बाद जनता खुद परेशान हो गई है, ख़ुद सरकार की पार्टी के नेता ही प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ बोल रहे हों, ऐसे में अब केजरीवाल को लगा कि मौका सही है, इसलिए अल्प विराम को हटा दिया है."
मौका भी है और मुद्दा भी
बीते एक हफ़्ते से बीजेपी के अंदर ही अर्थव्यवस्था में मंदी आई है या नहीं इसको लेकर विवाद चल रहा है. पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने सवाल उठाए तो पार्टी की तरफ से जवाब उनके बेटे और मोदी सरकार में मंत्री जयंत सिन्हा ने दिया.
ख़ुद अरुण जेटली सफाई देने मैदान में उतरे. जिस पर अरुण शौरी ने भी जवाब दिया. इसी में केजरीवाल को लगा की मौका भी है और मुद्दा भी. इसलिए टाइमिंग देख कर उन्होंने चुप्पी तोड़ने का फ़ैसला किया.
पिछले तीन महीने पर ट्वीटर पर भी केजरीवाल शांत ही रह रहें है. पार्टी के दूसरे नेताओं को रिट्वीट करने के अलावा उन्होंने न तो नरेन्द्र मोदी पर कोई बड़ा वार किया है, और न ही दिल्ली के एलजी के साथ कोई बड़ी जंग मोल ली.
बस एक बार सुर्खियों में आए जब चेन्नई जा कर कमल हासन से मुलाक़ात की. लेकिन उसके बाद भी कोई ऐसा बयान नहीं दिया जिससे चर्चा में बने रहते.
कपिल मिश्रा भी पड़े शांत
इधर कपिल मिश्रा भी बीते दिनों शांत हुए हैं. अरविंद केजरिवाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के बाद पहले मिश्रा हर दूसरे दिन प्रेस कान्फ्रेंस कर रहे थे. कभी सीबीआई तो कभी एंटी करप्पशन विभाग में सबूत देने का दावा करते थे. लेकिन कुछ दिनों से वो भी शांत पड़ गए हैं.
बीबीसी ने इसलिए कपिल मिश्रा से भी बात की. कपिल मिश्रा आज भी दावा कर रहे है कि वो अपने आरोपों को अंजाम तक जरूर पहुंचाएंगे. लेकिन साथ ही वो अब भी केजरिवाल को चुप ही बता रहे हैं.
उनके मुताबिक जिस दिन वो कपिल मिश्रा के भ्रष्टाचार का जवाब देंगे उस दिन वो मांनेगें की केजरीवाल ने चुप्पी तोड़ दी है. बीबीसी से बात करते हुए कपिल मिश्रा ने ये भी कहा कि, "केजरीवाल ने चुप्पी तोड़ी ज़रूर है, लेकिन अंदाज अब उनका मालिकों वाला है, और जनता को वो आज सेवक समझने लगे है."
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे के मुताबिक,"शांत रहने के आलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प ही नहीं था. पंजाब चुनाव में हार के बाद कांग्रेस ने उन्हें एकजुट विपक्ष का हिस्सा भी नहीं बनने दिया था. राष्ट्रपति चुनाव की बैठक में उनको निमंत्रण भी नहीं दिया था. ऊपर से उनकी पार्टी के ही नेता उनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल कर बैठ गए थे. तो मरता क्या न करता."
बदल गए केजरीवाल
केजरीवाल के लिए ये आगे की तैयारी भी है. भले ही गुजरात और हिमाचल के आने वाले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पाटी तैयारी में न दिख रही हो, लेकिन इस शांत महौल में पाटी राजस्थान विधानसभा चुनाव में उतरने के वहां काफ़ी मेहनत कर रही है.
केजरीवाल ने पिछले दिनों अपने काम करने का तरीका भी बदला है. इसलिए अब वो बिना विभाग के मुख्यमंत्री भी नहीं रहे है. इतना ही नहीं अब वो उस विपक्ष के नेता के साथ भी मंच को साझा करते दिख रहे है, जिन्हे कभी अपना धुर विरोधी बताया करते थे.
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