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महाराष्ट्रः कीटनाशक और किसानों की जान का जोख़िम
- Author, जयदीप हार्दिकर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, यवतमाल, महाराष्ट्र से
23 साल के प्रवीन सोयम बिल्कुल ठीक थे, लेकिन अचानक उनके सीने में दर्द उठा और उल्टियां आने लगीं. इसके बाद वो पूरी तरह बेहोश हो गए.
27 सितम्बर को एक सरकारी अस्पताल में उनकी मौत हो गई.
जिस डॉक्टर ने उनका इलाज किया, उसे संदेह है कि प्रवीन की मौत कीटनाशक के ज़हर से हुई है.
महाराष्ट्र में इस तरह की कई अन्य घटनाएं हुई हैं. डॉक्टरों का मानना है कि प्रवीन की मौत कीटनाशकों के उस घातक मिश्रण से ही हुई है, जिसका छिड़काव उन्होंने दो दिन पहले अपने कपास के खेत में किया था.
अधिकारियों और मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार, पिछले जुलाई से महाराष्ट्र में संदिग्ध कीटनाशक ज़हर के कारण अबतक 50 किसानों की मौत हो चुकी है.
मरने वाले किसानों की बढ़ती संख्या को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं.
यवतमाल सबसे अधिक प्रभावित
सबसे अधिक 19 मौतें यवतमाल ज़िले में दर्ज की गई हैं. इस इलाक़े में मुख्य रूप से कपास उगाया जाता है और ये किसान आत्महत्याओं के लिए अक्सर सुर्खियों में रहा है.
अधिकारियों के अनुसार, इसी दरम्यान 800 और किसानों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था.
मुख्य रूप से कपास, सोयाबीन और मसूर उगाने वाले किसानों ने बताया कि उन्होंने तेज़ कीटनाशकों के घोल और पॉवडर के मिश्रण का खेतों में छिड़काव किया था.
ये किसान कपास की जेनेटिकली मॉडिफ़ाइड यानी जीएम फसलें उगाते हैं, जिन्हें कृमि रोग से सुरक्षित माना जाता है, जो सिर्फ़ कपास की फसल को ही नुकसान पहुंचाते हैं.
लेकिन किसानों का कहना है कि इस साल फसलों को फिर भी इन कीड़ों से रोग हुआ, जिसकी वजह से उन्हें कीटनाशक का इस्तेमाल बढ़ाना पड़ा.
21 साल के निकेश कथाने ने बताया कि लगातार सात दिनों तक फसलों पर कीटनाशक का छिड़काव करने के बाद वो चक्कर खाकर गिर पड़े थे.
'कुछ नहीं देख पा रहा था'
एक स्थानीय अस्पताल के आईसीयू में इलाज करा रहे निकेश ने बताया, "मेरे सिर में भारी दर्द पैदा हो गया था और मैं कुछ भी नहीं देख पा रहा था."
वो फिलहाल ख़तरे से बाहर हैं, लेकिन क़सम खाते हैं कि वो कभी दोबारा कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करेंगे.
असल में, जितने भी किसानों ने बात की, उन्होंने बताया कि वे बीमार पड़ने के डर से कीटनाशक का छिड़काव करना बंद कर चुके हैं.
स्थानीय सरकारी अस्पताल के डीन डॉक्टर अशोक राठौर ने कहा, "ये बहुत असामान्य लक्षण हैं."
वो आमतौर पर जान-बूझकर कीटनाशक पीने वाले किसानों का इलाज भी करते हैं.
ज़हर का इलाज कराना कठिन
चिकित्सकों का कहना है कि दुर्घटना की वजह से फैलने वाले ज़हर का इलाज करना कठिन है क्योंकि पेट की सफ़ाई करने से ज़हर के असर को पूरी तरह हटाया नहीं जा सकता. सांस के साथ शरीर में दाखिल होने वाले कीटनाशक श्वसन तंत्र को भी नुकसान पहुंचाते हैं.
इलाक़े के डॉक्टरों का कहना है कि उन्होंने पहली बार जुलाई के अंतिम सप्ताह में संदिग्ध कीटनाशक ज़हर के मामलों को पहचाना था.
उल्टी, सुस्ती, सांस और देखने की दिक्कत और बेचैनी जैसे उसी तरह के लक्षणों वाले 41 किसानों को भर्ती किया गया था.
अगस्त में ये संख्या 111 तक पहुंच गई और सितम्बर में ये संख्या दोगुनी से भी ज्यादा 300 हो गई.
अस्पताल के अधिकारियों के अनुसार, इलाज करा रहे कम से कम 10 किसानों की हालत बहुत गंभीर है, जबकि 25 अन्य किसानों को आंख की रोशनी में दिक्कत पैदा हो गई है.
सितम्बर में कृषि वैज्ञानिकों ने ज़िले के अधिकारियों से इस मामले में ज़मीनी अध्ययन करने को कहा था ताकि मौतों और बीमार होने की घटनाओं के कारण का पता लगाया जा सके.
रिपोर्ट में किसानों को ही दोषी ठहराया गया कि वो फसल पर कीटनाशकों का छिड़काव करते समय सुरक्षा का ख़्याल नहीं रखते हैं.
इसमें कहा गया कि किसानों ने निर्धारित सुरक्षा किट, चश्मा और दस्ताने का इस्तेमाल नहीं किया था.
सोयम के पिता भाउराव ने स्वीकार किया कि उनके बेटे ने कीटनाशक छिड़काव के पहले सुरक्षा उपायों को नहीं अपनाया था.
लेकिन उन्होंने कहा कि उनके बेटे ने पहले भी बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के कीटनाशकों का छिड़काव किया था. तो इस बार ऐसा क्या हुआ?
क्या किसानों ने नकली कीटनाशकों का इस्तेमाल किया? क्या वे एक ऐसे नए मिश्रण का इस्तेमाल कर रहे थे, जिसके बारे में उनको ज़्यादा जानकारी नहीं थी? क्या इसको लेकर कोई चेतावनी दी गई थी?
सोयम के भाई नामदेव घर पर मौजूद कीटनाशक के पैकेट दिखाते हुए कहते हैं, "शायद उसकी जगह मैं होता." और दीवार पर लगी अपने भाई की तस्वीर की ओर देखने लगते हैं.
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