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सऊदी में इस भारतीय महिला को मिली अंतहीन यातना
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
जैसिंटा मेनदोनका बाएं कान से नहीं सुन सकती हैं. वो बायीं तरफ़ से कुछ चबा भी नहीं सकती हैं. ऐसा सऊदी में प्रताड़ना के कारण हुआ है.
जैसिंटा को सऊदी में एक नियोक्ता को बेचा गया था और उन्हें वहीं पर ये सब सहना पड़ा. तीन बच्चों की 47 साल की यह मां कर्नाटक के तटीय शहर उडुपी से हैं.
कुछ दिन पहले ही वो सऊदी से भारत लौटी हैं. वहां कुछ भारतीयों ने मिलकर सऊदी के उस नियोक्ता को ख़रीद की रक़म वापस की थी तो वो भारत आ पाईं.
सिसकती हुई जैसिंटा ने उडुपी के हॉस्पिटल में बीबीसी हिन्दी से कहा, ''मेरा मालिक मेरे बाल पकड़ मुझे धक्का देता था. वो अक्सर मुझे कमरे में घसीटता था. उसने हमारे दूतावास से कहा कि उसने ख़रीदने के लिए एजेंट को जो रक़म दी है उसे लौटा दे तो वो छोड़ देगा. मैं पांच लाख रुपए कहां से लौटाती?''
भावुक जैसिंटा ने कहा, ''मैंने उनसे कहा कि अगर वो पीटना बंद नहीं करेंगे तो मैं मर जाऊंगी. मेरे तीन बच्चे हैं और वो अनाथ हो जाएंगे. उसने कहा कि तुम निराश मत हो क्योंकि मैं तुम्हें कचरों के साथ फेंक दूंगा.'' 18 जून, 2016 को जैसिन्टा सऊदी अरब पहुंची थीं. उन्होंने सऊदी जाने के लिए मैंगलुरु में एक एजेंट को पैसे दिए थे.''
उन्होंने कहा, ''उस एजेंट ने मुझे मुंबई के एजेंट के हवाले कर दिया. उसने मुझे पहले गोवा भेजा और उसके बाद दिल्ली पहुंची. दिल्ली से मैंने दुबई के लिए उड़ान भरी. दुबई में दो घंटे रहने के बाद फ्लाइट रियाद पहुंची थी. अंततः मैं यान्बू पहूंची और यहीं मुझे काम करना था.''
जैसिंटा अगर वापस अपने वतन लौटीं तो उसमें भारतीय विदेश मंत्रालय और एनआरआईज़ की बड़ी भूमिका रही. उन्हें अब इस बात का एहसास हो रहा है कि वो मानव तस्करी की शिकार हो गई थीं.
उडुपी मानवाधिकार फ़ाउंडेशन के रविंद्र शानबाग ने कहा, ''जब वो सऊदी से वापस लौटीं तब हमें इसके बारे में पता चला कि उन्हें 4.5 लाख में बेचा गया था. पहले हफ़्ते जैसिंटा ने सऊदी में अपने नियोक्ता के घर अच्छी तरह काम किया. नियोक्ता की दूसरी पत्नी ने बताया था कि कैसे काम करना है. जब कुछ दिन हुए तो पता चला कि दूसरी पत्नी के यहां सुबह के 6 बजे काम शुरू करने के बाद फिर पहली पत्नी और उसके बाद तीसरी पत्नी के यहां काम पर जाना होता है. जैसिंटा को रात के दो बजे तक काम करना होता था.''
जैसिंटा को खाने में जूठन दिया जाता था. इससे उन्हें घृणा हो गई थी. जैसिंटा ने कहा, ''मैं ऐसा खाना नहीं खा सकती थी. ऐसे में मैं पानी, बिस्कुट और चाय पर ज़िंदा रही. किसी तरह मैंने 14 महीने का वक़्त काटा. जागते ही मुझे पीटना शुरू कर देते थे.''
जैसिंटा को एजेंट ने हर महीने 25 हज़ार तनख़्वाह दिलाने का वादा किया था. जैसिंटा विधवा हैं और उन्होंने दो बेटियों और एक बेटे को छोड़ सऊदी जाने का फ़ैसला किया था. जैसिंटा को लगा था कि सऊदी की कमाई से वो अपनी संतान की बेहतर परवरिश कर पाएंगी.
एजेंट ने जैसिंटा से कहा था कि जिस परिवार के घर वो काम करने जा रही हैं उसका संबंध क़तर के शाही परिवार से है. उनसे कहा गया था कि एक पत्नी और एक बच्चे की देखभाल करनी है.
शानबाग ने कहा, ''दरअसल ये एजेंट नहीं हैं. ये लोगों से कहते हैं कि क़तर में काम है. ये कहते हैं कि आपको पासपोर्ट और वीज़ा की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. इसके बाद वो आपको मुंबई भेज देते हैं, उसके बाद गोवा और फिर दिल्ली. दिल्ली के बाद ये दुबई भेजते हैं. दुबई में इनकी नीलामी होती है. आसपास के देशों के लोग यहां दो से आठ लाख की रक़म देकर ख़रीद-फरोख़्त करते हैं.''
रविंद्र शानबाग ने कहा, ''मैं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के संपर्क में था. इसके बाद मैंने सऊदी में भारतीय दूतावास से संपर्क किया. हमें बताया गया कि परिवार को पहले ही चार लाख 50 हज़ार की रक़म दे दी गई है. घर पर जैसिंटा के बच्चों ने कहा कि उन्हें कोई पैसा नहीं मिला है. इसका मतलब यह हुआ कि एजेंट ने पैसे खा लिए.''
शानबाग फ़ाउंडेशन 1997 से अब तक मानव तस्करी के शिकार हुए 22 लोगों को सुरक्षित स्वदेश लाने में कामयाब रहा है. केवल मैंगलुरु से 30 से 40 लोग इस रूट से मानव तस्करी के शिकार होते हैं. कन्नूर, केरल में कोझीकोड़ और गोवा में यह संख्या और ज़्यादा है. इन्हें कोंकण रेलवे के ज़रिए भेजा जाता है. ऐसे में प्लेन के ज़रिए जाते वक़्त ये पकड़ में नहीं आते.
शानबाग को इस मुकाम तक पहुंचाने में एनआरआई फ़ोरम के रोहन रॉड्रिग्स से भी काफ़ी मदद मिली. शानबाग ने कहा कि रोहन और अन्य भारतीयों ने तीन लाख रुपए का इंतज़ाम किया और इससे जैसिंटा को यातनादायी ज़िंदगी से बाहर निकलने में मदद मिली.
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