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नज़रिया: ‘विदेश में कांग्रेस के काम को स्वीकारना भाजपा की मजबूरी’
संयुक्त राष्ट्र महासभा में शनिवार को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान को निशाने पर लेते हुए कहा कि भारत ने आईआईएम, आईआईटी, इंजीनियर और डॉक्टर पैदा किए जबकि पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तैयबा और आंतकी पैदा किए.
उनके इस भाषण के बाद सोशल मीडिया पर हलचल तेज़ हो गई और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी ट्वीट कर सुषमा को शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि उन्होंने आख़िर कांग्रेस की ओर से आईआईटी और आईआईएम स्थापित करने को मान लिया है.
क्या वाकई में आईआईटी और आईआईएम कांग्रेस की देन हैं, इसका श्रेय कोई और नहीं ले सकता? ऐसा क्यों है कि बीजेपी देश में कांग्रेस पर 60 साल तक कोई विकास न करने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश में आईआईटी-आईआईएम होने का हवाला देती है.
इन सब सवालों पर बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे इम्तियाज़ अहमद से बात की.
अब आगे पढ़िए इम्तियाज़ अहमद का नज़रिया.
इसमें कोई शक नहीं है कि इस मुल्क की तरक्की की बुनियाद पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रखी. उन्होंने एक तरफ़ आईआईएम, आईआईटी जैसे उच्च संस्थान बनाए तो दूसरी तरफ़ रूस की मदद से स्टील प्लांट भी बनाए.
नेहरू का यह मानना था कि देश उच्च शिक्षा और स्टील के बिना तरक्की नहीं कर सकता है.
किसी उपलब्धि को स्वीकारना या नकारना कांग्रेस और बीजेपी का मसला ही नहीं है और जिस आईआईएम-आईआईटी का श्रेय लेने की बात की जा रही है वह नेहरू की विश्व दृष्टि का नतीजा है. इस पर न ही बीजेपी और न ही कांग्रेस दावा कर सकती है.
'आईआईटी-आईआईएम को स्वीकारना मजबूरी'
एनडीए सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा मौका मिला तो उन्होंने ऐसी ख़ुश करने वाली बात कर दी. भारत में जब बीजेपी ऐसी बात करेगी तो कांग्रेस वाकई कहेगी कि उनके किए गए काम को स्वीकारा जा रहा है.
साथ ही वो यह भी कहेगी कि इन संस्थानों को कमज़ोर भी बीजेपी ने किया है. जेएनयू में जिस तरह के सियासी दांव-पेच चले उसका उदाहरण हमारे सामने है.
बीजेपी के पास कोई आइकन नहीं है. कांग्रेस के पास महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और उसके बाद इंदिरा गांधी जैसे आइकन हैं. बीजेपी इस विरासत को ख़त्म कर देना चाहती है.
बीजेपी अपनी विचारधारा को बढ़ाना चाहती है और उसकी तमन्ना इसे संस्थानों पर लागू करने की भी है. आईआईटी, आईआईएम को स्वीकारना बीजेपी की विवशता है क्योंकि विश्व पर अपनी विचारधारा को नहीं दिखाया जा सकता है.
बीजेपी की यह कमज़ोरी है कि उसे मजबूरन विश्व पटल पर इन सब चीज़ों को स्वीकार करना पड़ता है और यहां कांग्रेस के कामों को नकारना पड़ता है.
विश्व पटल पर नेहरू की छवि रही है. नासिर टीटो और कई अंतरराष्ट्रीय नेताओं से उनके संबंध थे. लोग नेहरू की छवि को जानते हैं कि उनका कद क्या था, इसलिए स्वीकारना पड़ता है. भारत में बीजेपी इसलिए इन कामों को स्वीकार नहीं करती क्योंकि उनकी हैसियत नहीं बढ़ पाएगी.
'सतही तुलनाएं हैं'
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन चीज़ों को स्वीकारने का मकसद कांग्रेस को खुश करना नहीं बल्कि पाकिस्तान को निशाने पर लेना था.
ऐसी सारी तुलनाएं सतही हैं क्योंकि उसमें कोई बुनियाद नहीं है. हमारे और पाकिस्तान का इतिहास बहुत अलग है. यह सही है कि हमारे यहां तरक्की हुई, तालीम फैली. ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में तरक्की नहीं हुई. वहां भी तालीम फैली और जहां तक आतंकवाद का सवाल है वो दोनों देशों में फैला.
गोरक्षकों और गोमांस की वजह से लोगों को मार देने वाले कौन-से आतंकवादियों से कम हैं. इसलिए इस तरह की सारी तुलनाएं मेरी नज़र में ग़लत हैं.
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