बुलेट ट्रेन के साथ जापान धक्का लगाने वाले 'पुशर' भी देगा!

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जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने भारत में पहले बुलेट ट्रेन नेटवर्क के निर्माण कार्य का शिलान्यास किया है.
ये ट्रेन अहमदाबाद से मुंबई के बीच दौड़ेगी. इसकी ज़्यादातर फ़ंडिंग जापान के मिलने वाले $17 अरब (क़रीब 1088 अरब रुपये) के कर्ज़ से होगी.
उम्मीद जताई जा रही है कि इससे 500 किलोमीटर की यात्रा करने में अभी लगने वाला 8 घंटे का समय घटकर तीन घंटे का रह जाएगा.
भीड़ कैसे संभलेगी?

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लेकिन मेट्रो हो या लोकल या फिर राज्यों को आपस में जोड़ने वाली रेलगाड़ी, सभी के प्लेटफॉर्म पर आए दिन भीड़ बढ़ रही है.
दिल्ली मेट्रो और मुंबई लोकल में सफ़र करने वाले ख़ास तौर से जानते होंगे कि पीक टाइम में इन दोनों में सवार होना अपने आप में कोई जंग जीतने जैसा है.
इसे देखते हुए लगता है कि हमें जापान से बुलेट के साथ-साथ वहां की एक और सौगात चाहिए होगी.
जापान के ओशिया काम आएंगे

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और ये सौगात है - ओशिया. जापानी में ओसु का मतलब है धक्का देना और या के मायने हैं लाइन. यानी ओशिया का मतलब हुआ धक्का देकर लाइन में लगाना.
साधारण अंग्रेज़ी में उन्हें The Train Pusher कहा जाता है. इन लोगों की ज़िम्मेदारी होती है कि सभी मुसाफ़िर ट्रेन में सवार हो जाएं और कोई भी दरवाज़ों के बीच में ना फंसे.
जापान में 'पुशर' को सबसे पहले शिनजुकु स्टेशन पर लगाया गया था और इन्हें तब 'पैसेंजर अरेंजमेंट स्टाफ़' कहा गया.
पार्ट टाइम या फ़ुल टाइम

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इनमें ज़्यादातर छात्र शामिल थे जो पार्ट टाइम काम करते थे. और अब मेन लाइन पर पीक टाइम में स्टेशन स्टाफ़ या पार्ट टाइम वर्कर ये ज़िम्मा संभालते हैं.
amusingplanet.com के मुताबिक जापान की राजधानी टोक्यो में दौड़ने वाली ट्रेन की फ्रीक्वेंसी पीक आवर में दो-तीन मिनट हो जाती है, लेकिन इसके बावजूद भीड़ काबू में नहीं आती.
सबवे के डब्बों में दोगुने मुसाफ़िर चढ़ाने के लिए स्टेशन में यूनिफ़ॉर्म स्टाफ रहता है जिन्हें ओशिया या पुशर कहते हैं.
कहां से शुरू हुई परंपरा?

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इनका लक्ष्य होता है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को कैरिज में चढ़ा दिया जाए. साथ ही वो इस बात का ख़्याल भी रखते हैं कि ट्रेन में सवार होने वाले लोगों को कोई चोट ना पहुंचे.
जब भीड़ ट्रेन में सवार होने की कोशिश कर रही होती है और पुशर उनकी मदद में जुटे रहते हैं तब तक ड्राइवर इंतज़ार करता है. पुशर का इशारा मिलने के बाद गाड़ी चलनी शुरू होती है.
हालांकि अब पुशर को जापान से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इस परंपरा की शुरुआत अमरीका में हुई थी और सबसे पहले न्यूयॉर्क सिटी में भीड़ को एडजस्ट करने की कवायद शुरू हुई.
मेट्रो और लोकल की भीड़

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भीड़ का सबसे ज़्यादा भार दिल्ली मेट्रो और मुंबई लोकल के कंधों पर दिखता है. ऐसे में इन दोनों शहरों में पुशर ज़रूर काम आ सकते हैं.
दिल्ली मेट्रो हर रोज़ करीब 3000 ट्रिप लगाती है और साल 2016-17 में उसमें हर रोज़ औसतन 27.6 लाख मुसाफ़िरों ने सफ़र किया. यानी साल भर में कुल 100 करोड़ लोगों ने इसका फ़ायदा लिया.
लाखों- करोड़ों का भार

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इसी तरह मुंबई लोकल में साल 2016-17 में हर रोज़ औसतन 75.93 लाख लोगों ने यात्रा की जबकि सालाना राइडरशिप 2.64 अरब रही.
जापान बुलेट ट्रेन चलाने में मदद दे रहा है, ऐसे में भीड़ से निपटने में भी हमें मदद की ज़रूरत है. और पुशर मुहैया कराने या ये गुर सिखाने में उसकी सहायता काम आ सकती है.
जापान में धक्का देकर ट्रेन में चढ़ाने वाले पुशर का वीडियो देखने के लिए क्लिक करें.
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