1965: एक दिन जीते और दूसरे दिन बने युद्धबंदी

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

4 सिख रेजिमेंट ने बर्की की लड़ाई में शानदार काम किया था, लेकिन उनकी परीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई थी.

11 सितंबर 1965 की सुबह 9.30 बजे उनके कमांडिग ऑफ़िसर लेफ़्टिनेंट कर्नल अनंत सिंह को 7 इंफ़ैंट्री डिविज़न के मुख्यालय बुलाया गया और पश्चिमी कमान के कमांडर लेफ़्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह ने उन्हें एक ख़ास ज़िम्मेदारी सौंपी.

हरबक्श सिंह सिख रेजिमेंट के कर्नल भी थे. उन्होंने अनंत सिंह से कहा कि उन्हें सैनिक ट्रकों से वलतोहा पर उतार दिया जाएगा और फिर वहाँ से उन्हें पैदल 19 किलोमीटर चलकर पाकिस्तानी क्षेत्र में घुसकर खेमकरन-कसूर सड़क पर एक रोड ब्लॉक बनाना होगा.

ये काम 12 सितंबर की सुबह 5.30 बजे तक हो जाना चाहिए. उसी समय खेमकरण में पहले से लड़ रही 4 माउंटेन डिविज़न के सैनिक 9 हॉर्स के टैंकों के साथ आगे बढ़कर सुबह आठ बजे तक उनसे जा मिलेंगे.

सारागढ़ी की लड़ाई

12 सितंबर का दिन 4 सिख रेजिमेंट का 'बैटल ऑनर' दिन था.

68 साल पहले 12 सितंबर, 1897 को इसी दिन नार्थ वेस्ट फ़्रंटियर में 4 सिख रेजिमेंट के 22 जवानों ने हज़ारों अफ़रीदी और औरकज़ई कबायलियों का सामना करते हुए आख़िरी दम तक उनका सामना किया था और अपने हथियार नहीं डाले थे.

ये लड़ाई सुबह 9 बजे शुरू हुई और शाम 4 बजे तक चलती रही. उन सभी 22 सैनिकों को 'आईयूएम' जो उस समय ब्रिटेन का सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार था, दिया गया था जो आजकल के परमवीर चक्र के बराबर है.

इस लड़ाई को सारागढ़ी की लड़ाई कहा जाता है और इसकी गिनती वीरतापूर्वक लड़ी गई विश्व की सर्वकालिक 8 लड़ाइयों में की जाती है. हरबक्श सिंह चाहते थे कि 4 सिख रेजीमेंट के जवान अपने 'बैटल ऑनर डे' को खेमकरण में इस अभियान को पूरा करते हुए मनाएं.

बर्की से हटा कर खेमकरण भेजा गया

हालांकि अनंत सिंह की बटालियन को एक दिन पहले ख़त्म हुई बर्की की लड़ाई में ख़ासा नुकसान हुआ था और उनके सैनिक लगातार सात दिनों तक बिना किसी आराम के लड़ने के बाद बेहद थके हुए थे. लेकिन वो अपने जनरल को न नहीं कह पाए और उन्होंने ये चुनौती स्वीकार कर ली.

11 सितंबर की शाम 5 बजते-बजते भारी गोलाबारी के बीच उन्हें बर्की से हटाया गया. खालरा तक उन्होंने मार्च किया और फिर उन्हें ट्रकों पर लादकर वल्तोहा पहुंचा दिया गया.

उस लड़ाई में भाग लेने वाले ब्रिगेडियर कंवलजीत सिंह याद करते हैं, ''हम बेइंतहा थके हुए थे. हमने कई दिनों से अपने कपड़े तक नहीं बदले थे. तालाब से गंदा पानी पीने के कारण पेट ख़राब थे. लेकिन हमने तब भी इस आदेश को तहेदिल से स्वीकार किया. लेफ्टिनेंट विर्क ने कई दिनों के बाद हम थकान से चूर सैनिकों के लिए गर्म खाना बनवाया और सबने छककर खाया.''

रेलवे लाइन के साथ साथ मार्च

लेफ़्टिनेंट कर्नल अनंत सिंह ने अपनी बटालियन को संबोधित करते हुए कहा, ''ईश्वर को हमारी और परीक्षा लेनी है. वो चाहता है कि हम सारागढ़ी के बलिदान को एक और जीत के साथ मनाएं. आप सारागढ़ी के बहादुरों को याद करिए और एक बार फिर बटालियन का नाम ऊँचा करिए.''

4 सिख रेजीमेंट के 300 जवानों ने 12 सितंबर की रात एक बजे वलतोहा से मार्च करना शुरू किया. वो रेलवे लाइन के साथ-साथ चल रहे थे और दो सैनिक जो उस इलाके को जानते थे, उन्हें रास्ता दिखा रहे थे.

वो एहतियातन अपने कंधों पर रिकायलेस गन भी लेकर चल रहे थे कि कहीं उनका पाकिस्तानी टैंकों से सामना न हो जाए. लेकिन भारी रिकायलेस गन उनके मार्च को धीमा कर रही थी.

उन्हें जानकारी मिली थी कि उस इलाके में पाकिस्तानी टैंक नहीं है, इसलिए अनंत सिंह ने तय किया कि वो भारी रिकायलेस गनों को वहीं ज़मीन पर छोड़ दें, ताकि और तेज़ी से चल सकें.

रास्ते में सिग्नल यूनिट ने भी उनका साथ छोड़ दिया और बाहरी दुनिया से संपर्क करने का ये साधन भी जाता रहा.

कंवलजीत सिंह याद करते हैं, ''हमसे सुबह पांच बजे तक उस जगह पर पहुंचने के लिए कहा गया था. इसलिए इसके बाद हम लगभग दौड़ते हुए आगे बढ़े. बीच में हमारा एक पाकिस्तानी टुकड़ी से सामना भी हुआ. हमने उन्हें भगा दिया और आगे बढ़ना जारी रखा.''

पाकिस्तानी सैनिकों ने घेरा

सुबह चार बजे तक 2 सिख रेजीमेंट के जवान खेमकरण गाँव के नजदीक एक किलोमीटर तक पहुंच गए थे. वहाँ वो ये देखकर अचरज में पड़ गए कि चारों तरफ़ बहुत बड़ी संख्या में पाकिस्तानी टैंक थे.

सुबह हुई तो पता चला कि जिस खेत में वो छुपे हुए है, उसमें पाकिस्तानी टैंक भी खड़े हुए हैं. पाकिस्तानी उन्हें देखते ही अपने टैंकों में सवार हुए और गोलियाँ चलाते हुए उन्हें घेर लिया.

वो संख्या में उनसे कही अधिक थे. अनंत सिंह और कंवलजीत सिंह समेत 121 भारतीय सैनिकों को बंदी बना लिया गया. 20 सैनिक मारे गए.

ब्रिगेडयर कंवलजीत सिंह याद करते हैं, ''मैं अनंत सिंह के बगल में चल रहा था. उन्होंने पाकिस्तानी टैंकों को देखकर सैनिकों से कहा कि एक साथ मत चलो. चारों तरफ़ फैल जाओ, नहीं तो बहुत लोग हताहत होंगे. हमने उसी समय फैलना शुरू कर दिया और हम ढाई-तीन किलोमीटर के इलाके में फैल गए. थोड़े आगे बढ़े होंगे कि 40-50 गज़ की दूरी पर खड़े पाकिस्तानी टैंक से आवाज़ आई- हाथ खड़े कर लो और आगे बढ़ते चले आओ. उन्होंने हमसे रुकने को कहा और अकेले खुद आगे बढ़ते चले गए. हमारे पास एक एंटी टैंक राइफ़ल थी. हमने उससे पाकिस्तानी टैंकों पर फ़ायर करने की कोशिश की लेकिन फ़ायर ही नहीं हुआ.''

हाथ ऊपर किए

कंवलजीत सिंह आगे कहते हैं, ''मैं जब अपने हथियार फेंक रहा था तो सोचा पहले पानी पी लूँ, तभी पाकिस्तानियों का एक बर्स्ट मेरे ऊपर आया. मेरे कंधे पर गोली लगी. ख़ून निकलना शुरू हो गया. मैंने उसी हालत में अपने हाथ ऊपर किए. उन्होंने हमारी आंखों पर पट्टी बाँध दी और हमारे हाथ ट्रकों की रेलिंग से बाँध दिए. फिर वो हमें कसूर की तरफ़ ले गए.''

उस ऑपरेशन में शामिल कर्नल चहल याद करते हैं, ''मैं पीछे से भागने की कोशिश कर रहा था. मैंने देखा कि एक टैंक मेरे 50 गज़ के फ़ासले पर खड़ा है. जब उस पर सवार सैनिक ने मुझे देख लिया तो उसने मुझ पर स्टेन गन से फ़ायर किया. उसने चिल्लाकर कहा- हथियार डालो वरना मार दूँगा. मेरे पास सरेंडर करने के अलावा कोई चारा नहीं था.''

'द स्टूपिड इंसिडेंट'

रक्षा मंत्री चव्हाण को इस घटना के बारे में अगले दिन पता चला. उन्होंने अपनी डायरी में इसे 'द स्टूपिड इंसिडेंट' यानी एक बेवकूफ़ी भरी घटना बताया.

हरबक्श सिंह ने अपनी आत्मकथा 'इन द लाइन आफ़ ड्यूटी' में लिखा, ''हमें उस समय इसका अहसास नहीं हुआ कि 4 सिख रेजिमेंट के जवान बर्की पर कब्ज़े के दौरान दो दिन से एक सेकेंड के लिए भी नहीं सोए थे और इस ऑपरेशन के दौरान उनके कई लोग हताहत हो गए थे. उनके कमांडिंग ऑफ़िसर अनंत सिंह जिन्हें मैंने ये ज़िम्मेदारी दी थी, एक अच्छे सैनिक थे. लेकिन उन्होंने एक बार भी मुझसे नहीं कहा कि उनके सैनिक बुरी तरह से थके हुए हैं.''

ब्रिगेडियर कंवलजीत सिंह कहते हैं, ''जब हम भारत वापस भेज दिए गए तो जनरल हरबक्श सिंह फ़ाज़िल्का में आए थे. उन्होंने मुझसे इस ऑपरेशन के बारे में कई सवाल पूछे. उन्होंने अपनी तरफ़ से बहुत अच्छा सोचा लेकिन ये एक बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी. ऐसा नहीं होना चाहिए था.''

वे कहते हैं, ''आप अपनी बटालियन को इस तरह मूव नहीं करते हैं. जिसने इतना महत्वपूर्ण काम अंजाम दिया हो, रोटी नहीं खाई हो और जिसके 39 आदमी मर गए हैं और 125 लोग ज़ख़्मी हो गए हों. उस पलटन को एकदम से बिल्कुल नए इलाके में भेजना, जिसकी कोई जानकारी उनको नहीं थी, एक जुआ था. अगर ये कामयाब हो जाता तो बल्ले-बल्ले और अगर नहीं होता तो ये आपके सामने है.''

इस घटना को उस समय मीडिया से छिपाकर रखा गया.

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