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क्या मोदी बहादुर शाह ज़फ़र की असली मज़ार पर गए?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी म्यांमार के दो दिवसीय दौरे पर हैं. इस दौरान वह अंतिम मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फ़र की मज़ार पर भी गए.
बहादुर शाह ज़फ़र की क़ब्र को लेकर विवाद है. इसी से जुड़ा एक यह शेर काफ़ी लोकप्रिय हुआ था- कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए, दो गज़ ज़मीन भी ना मिली कू-ए-यार में.
भारत के मशहूर मुग़लकालीन इतिहासकार हरबंस मुखिया ने बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार से कहा कि यह शेर बहादुर शाह ज़फ़र का नहीं था. उन्होंने कहा कि उनकी क़ब्र को लेकर भी काफ़ी विवाद है क्योंकि जिस जगह पर उन्हें दफ़्न किया गया था उसे अंग्रेज़ों ने समतल करवा दिया था.
हरबंस मुखिया ने म्यांमार में बहादुर शाह ज़फ़र की मज़ार को लेकर कहा, ''म्यांमार में जिस मज़ार पर प्रधानमंत्री गए थे उसे लेकर भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि वह असली है. अंग्रेज़ों ने बहादुर शाह ज़फ़र को दफ़्न कर ज़मीन को बराबर कर दिया था ताकि कोई पहचान नहीं रहे कि उनकी क़ब्र कहां है.''
उन्होंने कहा, ''इसलिए यक़ीनी तौर पर यह नहीं कहा जा सकता है कि उनकी मज़ार वहीं पर है. यह सच है कि उन्हें रंगून में ही दफ़्न किया गया था. वह वहां क़ैदी बनकर पांच-छह साल रहे थे और वहीं उनकी मौत हो गई थी. उनकी क़ब्र कौन है इसे लेकर यक़ीनी तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता.''
हरबंस मुखिया ने कहा, ''बहादुर शाह ज़फ़र चाहते थे कि उन्हें दिल्ली के महरौली में दफ़्न किया जाए लेकिन उनकी आख़िरी इच्छा पूरी नहीं हो पाई थी. बहादुर शाह ज़फ़र का पसंदीदा इलाक़ा महरौली ही था. महरौली में उन्होंने फूल वालों की सैर शुरू की थी. महरौली में सूफियों की भी मज़ारें हैं. महरौली को एक तरह से सूफ़ी इलाक़ा माना जाता है.''
मुग़ल शासकों को लेकर देश की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के तेवर हमेशा से तल्ख रहे हैं ऐसे में पीएम मोदी का उनकी मज़ार पर जाने के क्या मायने हो सकते हैं? इस पर हरबंस मुखिया का कहना है कि इसका कोई मायने नहीं है. उन्होंने कहा, ''हर चीज़ में राजनीति होती है. भारतीय जनता पार्टी की सोच तो वही है. वो हिन्दुत्व और आरएसएस के हिसाब से सोचते हैं.''
उन्होंने कहा, ''मोदी प्रधानमंत्री हैं तो सोचा होगा कि चलो ये भी कर ही लेते हैं. तस्वीरें खींचवा लेते हैं और संदेश भी चला जाएगा कि मैं उतना बुरा नहीं हूं जितना आप सोचते हैं. ऐसी राजनीति तो चलती रहती है. अटल बिहारी वाजपेयी जी इफ़्तार दिया करते थे. ये सब तो चलता रहता है और इसे हर कोई कर रहा है.''
अब तक देश के वामपंथी और उदार बुद्धिजीवी इस बात को मानते थे कि बहादुर शाह ज़फ़र देश की साझी संस्कृति के प्रतीक हैं तो क्या मोदी भी इस बात को मानते हैं? इस पर हरबंश मुखिया ने कहा कि मोदी को जब जो स्वीकार करने की सुविधा होती है उसे स्वीकार कर लेते हैं और जिसे इनकार करना होता है उसे इनकार कर देते हैं. मोदी जी कोई अपनी धाराणा तो है नहीं.''
बहादुर शाह ज़फ़र को नवंबर 1862 में रंगून में दफ़्न किया गया था.
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