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गौरी लंकेश के बेबाक लेखन से डर गए कट्टरपंथी: कन्हैया कुमार
- Author, कन्हैया कुमार
- पदनाम, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष, जेएनयू
गौरी लंकेश की हत्या हमारे लिए ही नहीं पूरे देश के लिए बहुत बड़ा नुकसान है. अपने अख़बार 'लंकेश पत्रिके' के ज़रिए वो समाज के अंदर की बुराई को ख़त्म करने के लिए काम कर रही थीं.
उनकी चाहत थी कि समाज के अंदर जो बुराई है उससे लड़ा जाए. यह अख़बार विज्ञापन नहीं लेता था. वो सभी मुद्दों पर लिखती थीं.
मेरी उनसे बातचीत तब शुरू हुई जब मैं जेल गया. जेएनयू को लेकर उन्होंने बेंगलुरु के अंदर काफी आंदोलन किया. जब मैं जेल से बाहर आया तो उनकी चिट्ठी आई. हम मिले. उन्होंने मुझे घर बुलाया. मैं गया. अपने बेटे को लोग जैसे प्यार करते हैं वैसे ही वो मुझे प्यार करती थीं.
वो निडर महिला थीं. मैं कहूंगा कि सच बोलने की कीमत उन्होंने अपनी जान देकर चुकाई है. ये हम सब लोगों के लिए सोचने का विषय है कि एक महिला को, एक पत्रकार को घर में घुसकर मार दिया गया. यह बेहद ख़तरनाक है.
निजी तौर पर मेरा एक सपोर्ट बेस चला गया. वो मुझे हर समय मदद के लिए तैयार रहती थीं. हमेशा फोन करके हालचाल लेती थीं. हर तरह की मदद का आश्वासन देती थीं. मुझे कभी नहीं लगा कि वो मेरी असली मां नहीं हैं.
विचारधारा पर लोग कहने को तो बहुत कुछ कहते हैं. लेकिन मैंने जो उनके साथ रहकर महसूस किया, वो ये था कि ख़ुद एक बहुत ही अच्छे फैमिली बैकग्राउंड से आती थीं, लेकिन उनका पूरा ध्यान समाज में विकास की धारा से पीछे छूटे लोगों को आगे बढ़ाने पर था.
दलितों और आदिवासियों का सवाल, भूमाफ़िया जो आदिवासियों की ज़मीन हड़प लेते थे, उनके ख़िलाफ़ वो लिखती थीं.
बेबाक
उन पर माओवादी होने के आरोप भी लगे लेकिन उन्होंने सशस्त्र विद्रोह की धारा में रहने वाले लोगों को मुख्यधारा में लाने का काम किया जो सरेंडर करना चाहते थे.
कोई अगर मुख्यधारा में किसी को लेकर आ रहा है तो उस पर ग़लत आरोप लगाने का क्या मतलब है. उनके साथ रहकर मैंने ये जाना कि जिनकी आवाज़ दबी है, उन्होंने उनकी आवाज़ को उठाया.
देश के अंदर अभी हिंदू राजनीति का जो माहौल है उसकी वो आलोचक रही हैं. बिना जांच के अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगा लेकिन इसमें उन्हीं लोगों की भूमिका है जो पिछड़ों की आवाज़ दबाने का काम करते हैं. ये बात मैं बहुत स्पष्ट तौर पर कह रहा हूं. सरकार चाहे जिसकी हो, सभी नागरिकों के लिए समान रूप से काम करे, वो यही चाहती थीं.
सांप्रदायिकता को लेकर वो बहुत बेबाकी से लिखती थीं. सांप्रदायिक राजनीति और हिंदू-मुस्लिम तुष्टीकरण की भी खूब आलोचना करती थीं. उनके मन में आंबेडकर के विचारों का प्रभाव था, दलितों के साथ जो ज़्यादती होती है उसको लेकर भी वो खूब बेबाकी से लिखती थीं.
नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे ,एमएम कलबुर्गी की हत्या और अब गौरी, इन सारे मामलों को देखेंगे तो आप पाएंगे कि जो लोग लिखने, पढ़ने और बोलने वाले लोग हैं, उन्हें चुप कराने की कोशिश की जा रही है. अगर आप बैकग्राउंड देखेंगे तो सब सामाजिक रूप से काफ़ी सक्रिय रहे हैं.
'बहुत पहले से ख़तरा था'
पानसरे जी की उम्र 80 वर्ष थी. एक बूढ़े के बोलने और लिखने से किसी को क्या ख़तरा हो सकता है लेकिन ये दिखाता है कि जो लोग हिंसात्मक हैं और डर की राजनीति करना चाहते हैं वो ये जताना चाहते हैं कि जो हमारी विचारधारा के ख़िलाफ़ बोलेंगे, लिखेंगे, उन्हें पहले हम डराएंगे और अगर नहीं माने तो हत्या कर देंगे.
गौरी लंकेश को लगातार मौत की धमकियां मिलती रही है. वो जब भी कुछ लिखती थीं, उन्हें धमकियां मिलती रहीं लेकिन वो काम करती रहीं. सरकार और प्रशासन से उनकी बातचीत के संबंध रहे हैं, उससे सबको इस बारे में जानकारी तो रही होगी. आधिकारिक तौर पर पुलिस क्या कहती है ये उनके ऊपर निर्भर करता है.
मैं पिछली बार जब उनसे मिलने गया तो मैंने पूछा था कि आप जिस तरह काम कर रही हैं, जैसा लिखती हैं आपको ख़तरा हो सकता है. तो उन्होंने बताया कि ख़तरा बहुत ज़्यादा है. उन्होंने मुझे दिखाया कि घर में दोहरे दरवाज़े लगवाए गए थे और बाहर सीसीटीवी लगवाया था. लेकिन वो इस बात के लिए तैयार नहीं थीं कि काम नहीं करेंगी, लिखेंगी नहीं. उनका किसी राजनीतिक पार्टी से सीधे तौर पर कोई लेना-देना नहीं था.
कोई भी पिछड़ा इंसान, चाहे वो महिला, दलित हो, ग़रीब हो और इस तरह का साहस दिखाए तो उस पर चुनौतियां बढ़ जाती हैं. निजी तौर पर वो ऐसी थीं कि कभी भी अपनी विचारधारा और काम से समझौता करने के लिए तैयार नहीं रहीं.
जब रोहित वेमुला की घटना हुई, जब जेएनयू की घटना हुई, तब उन्होंने उन बातों को सामने लाने का काम किया जो दबी थीं. सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना पत्रकार का काम है. बिना जांच के कुछ कहना जल्दबाज़ी है लेकिन जैसी चीजें रही हैं और जैसा बैकग्राउंड रहा है उससे ऐसा लगता है कि दक्षिणपंथी राजनीति के ख़िलाफ़ लिखने की वजह से उनके साथ ऐसा हुआ है.
कट्टरता के ख़िलाफ़
अपने आख़िरी ट्वीट में उन्होंने जो लिखा था वह विपक्ष के लिए था. विपक्ष जैसे बंटा है उससे वह दुखी थीं. उनका कहना था कि अगर विपक्ष इस तरह बंटा रहेगा, मज़बूती से विरोध नहीं दर्ज कराएगा तो देश तानाशाही की ओर बढ़ेगा. उन्होंने कर्नाटक में भी सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई. सरकार चाहे किसी की भी रही हो वो सरकार के ख़िलाफ़ आलोचक रुख हमेशा अपनाए रहीं.
उन्होंने सीधे तौर पर दक्षिणपंथी राजनीति के ख़िलाफ़ लिखा. वो इसे लेकर मुखर थीं. उनसे मुझे बहुत प्यार मिला. उनको ये पता था कि मैं एक छात्र हूं. वो कहती थीं कि तुमको कैंपस में लिखने पढ़ने में दिक्कत हो रही होगी तुम मेरे घर आ जाओ, यहां पढ़ो.
वो महिलावादी थीं तो पितृसत्ता के ख़िलाफ़ थीं. वो कट्टरता के ख़िलाफ़ थीं. वो मर्दवादी कट्टरता, हिंदूवादी कट्टरता, इस्लाम की कट्टरता, सब के ख़िलाफ़ थीं. उन्होंने पिछड़ों की आवाज को इसी तरह उठाने का काम किया. आप समझ सकते हैं कि एक महिला जो अकेली हो, जिसके साथ किसी पार्टी का राजनीतिक समर्थन न हो उसके लिए ये सब कितना मुश्किल होता है.
वो हमेशा ग़रीब और पिछड़े तबके से आने वाले छात्रों की मदद करती थीं. उन्हें स्कॉलरशिप दिलाने में मदद कर देती थीं. हमारे यहां एक लड़का था उसे उन्होंने ब्राजील भेजा था. आसपास की चीजों में उनकी भागीदारी दिखाती थी कि वो एक महिलावादी हैं.
मुझे उनकी दो बातें बहुत अपील करती थीं. पहली ये कि वो एक बड़े परिवार से थीं. वो चाहतीं तो एक लग्जरी लाइफ़ जी सकती थीं, लेकिन उन्होंने वो सब छोड़कर जिनके पास लग्जरी नहीं पहुंची, उन्हें इस काबिल बनाने की लड़ाई लड़ी. वो जिस कास्ट से थीं, उससे डीकास्ट और डीक्लास होकर उन्होंने पिछड़ों के लिए काम किया.
दूसरी चीज उनकी निडरता थी. वो हमेशा निडर होकर काम करती रहीं, लिखती रहीं. मुझे ये हमेशा अच्छा लगा. उन्होंने जो सिखाया, जो बताया वो हमेशा के लिए मंत्र है. उनका जाना निजी तौर पर मेरा बहुत बड़ा नुकसान है.
(बीबीसी संवाददाता ब्रजेश मिश्र से बातचीत पर आधारित)
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