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नज़रिया: 'अफ़सोस है कि इस्लाम महिला विरोधी जान पड़ता है'
- Author, सैय्यदा हमीद
- पदनाम, संस्थापिका, मुस्लिम विमेंस फ़ोरम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से एक नया अध्याय शुरू हुआ है. सुप्रीम कोर्ट की एक पांच सदस्यीय बेंच ने मुसलमान औरतों की तक़दीर पर अपनी मुहर लगा दी.
ये बेंच भी कुछ अनोखी बेंच थी. चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर सिख, जस्टिस नज़ीर मुस्लिम, जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन पारसी, जस्टिस कुरियन जोसेफ ईसाई और जस्टिस यू.यू. ललित हिंदू.
इससे भी ज़्यादा अनोखी बात ये है कि इस मुद्दे पर जो महिलाओं की ज़िंदगी से ताल्लुक़ रखता है, कोई महिला जज नहीं थीं. ये बातें ख़ुद इस बात का संकेत हैं कि आज भी न्यायपालिका की परंपरा उतनी ही पुरुष प्रधान है जितनी कि 70 साल पहले थी.
मैंने सन् 2000 में बेआवाज़ों की आवाज़ नाम की रिपोर्ट लिखी थी. जब मैं राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य थी. देशभर के 18 राज्यों का भ्रमण करके मुस्लिम महिलाओं की आवाज़ सुनकर ये रिपोर्ट 17 साल पहले तैयार की थी.
इस रिपोर्ट में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति का खुलासा किया गया था. महिला आयोग ने ये पाया था कि अन्य महिलाओं की तरह मुस्लिम महिला की भी समस्या अशिक्षा और बेरोज़गारी है.
उसके साथ उसके अपने निजी कानून उसकी ज़िंदगी की मुश्किलों को और बढ़ा देते हैं. तीन तलाक़ बहुविवाह/चार शादियां उस पर नंगी तलवार की तरह लटकती रहती हैं. इसलिए हमारा सुझाव था कि मुस्लिम समुदाय और उसके रहनुमा का कर्तव्य है कि वे निजी कानूनों में निजी सुधार लेकर आएं.
ठंडे बस्ते में रिपोर्ट
इस संदर्भ में हमने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के चेयरमैन मौलाना अली मियां नदवी से बातचीत की थी.
वह एक बड़े इस्लामिक विद्वान थे, जिनकी समाज और देश में बड़ी इज्ज़त थी. उन्होंने हमारी बातों को समझा और उन्हीं की प्रेरणा से उनके देहान्त के बाद उनके उत्तराधिकारी काज़ी मोजाहिदुल इस्लाम कासमी ने बोर्ड को मुसलमान औरतों के ग्रुप के साथ रूबरू कराया.
तीन साल के बाद जब मेरा कार्यकाल समाप्त हुआ तो 2013 में मैंने फिर उन तमाम जगहों का दौरा किया, ये देखने के लिए कि स्थिति में कुछ बदलाव आया है या नहीं.
इसके आधार पर मेरी रिपोर्ट जो यूएन विमेन के सहयोग से तैयार की गई थी, ''मेरी आवाज़ ज़रूर सुनी जाएगी'' प्रकाशित की गई थी.
मुस्लिम वीमेन फोरम (MWF) ने पाया कि तीन सालों में कोई ख़ास तब्दीली नहीं हुई. तब हमने मुस्लिम समाज को ये चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने अपने घर को अपने आप नहीं संवारा तो उनके निजी कानून में सरकार का दख़ल ज़रूरी हो जाएगा और 14 साल बाद यही हुआ.
पहले तो महिला आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया और उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और दूसरे मुस्लिम वीमेन फोरम की रिपोर्ट की चेतावनी को भी अनसुना कर दिया गया.
22 अगस्त 2017 को मुसलमानों के निजी कानून में कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फ़ैसला तीन तलाक़ पर सुनाया और हमेशा के लिए इस प्रथा को रद्द कर दिया. और अब सरकार पर ये ज़िम्मेदारी डाल दी कि संसद में कानून बनाकर इस प्रथा को समाप्त कर दे.
इस बाज़ी में मुस्लिम महिलाएं जीत गईं और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड हार गया.
अल्लामा इक़बाल ने एक नज़्म लिखी थी जिसका शीर्षक था ''पसचेबायद कर्द'' यह फारसी भाषा में था. इसका मतलब ये है कि अब हमें क्या करना चाहिए.
क्या से क्या
10 सितंबर को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस पर विचार विमर्श के लिए मीटिंग बुलाई है. देशभर के मुस्लिम विद्वान, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता इस मसले पर सोच-विचार कर रहे हैं.
मेरी एक प्रस्तावना है कि अब वक़्त आ गया है कि हम इस्लाम को इसकी मूल भावना के साथ जोड़कर रखें. जहां तक तीन तलाक़ का सवाल है कुरान में इसकी अनुमति हरगिज़ नहीं है.
अगर मैं कुरान से सुरह का निचोड़ बयां करूं तो उसमें कहा गया है कि तलाक़ सिर्फ एक साधन है, ऐसी शादियों से निकलने का जो औरत और मर्द दोनों के लिए जहन्नुम हो जाए और फिर भी कुरान इसे हर क़दम पर सोच विचार सुलह, सफाई का दिखाता है औऱ तीन महीने का समय पुनर्विचार के लिए देता है.
जब इतना एहतियात का हुक़्म है तो एक समय में तीन तलाक कहने और करने का अमल बिल्कुल मज़हब के ख़िलाफ़ है. इसी तरह से बहुविवाह और हलाला जैसी कुरीतियां कभी इस्लाम की विचारधारा में शामिल नहीं की जा सकतीं.
ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि इस्लाम जो सब धर्मों से अधिक औरतों के हक़ में है वो आज औरतों का विरोधी जान पड़ता है.
ये वो इस्लाम है जो आज से 1450 साल पहले औरतों को जायदाद का हक़ दिया. ये वो ज़माना था जब इस्लाम धर्म वज़ूद में आया, ये वो ज़माना था जब लड़की पैदा होते ही कब्र में दबा दी जाती थी. कहां बेटी को ज़िंदा दफ़नाना और कहां जायदाद का हक़ देना.
ये इस्लाम वही था जिसने औरतों को इतना बड़ा हक़ दिया, उसी इस्लाम को आज जो अपने आप को इस्लाम के विद्वान कहते हैं, उन्होंने दुनिया की नज़रों में क्या से क्या बना दिया.
ज़रूरत
मेरी गुजारिश उन लोगों से है जो लाखों मुसलमानों के बीच पकड़ रखते हैं, खुतबा (भाषण) रखते हैं, उनका ये कर्तव्य है कि वे इस्लाम की मूल भावना से लोगों को अवगत कराएं और लोगों को उन ग़लत कुरीतियों से रोकें जिनका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है.
जब मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली, मौलाना अशरफ अली थानवी जैसे रौशन ख़याल इस्लाम के विद्वान जब खुतबा देते थे तो सुनने वाले फूट-फूट कर रो पकड़ते थे क्योंकि उनको अपनी ग़लतियों का एहसास होता था और वो ये सोचकर उठते थे कि वो अपने आप को उन गुनाहों से पाक रखेंगे.
इसी प्रकार की भावना मुसलमानों में जगाने के लिए ख़ास तौर से महिलाओं में आजकल की अहम ज़रूरत है.
आखिर में मौलाना हाली की औरतों के प्रति श्रद्धा में लिखी वो पंक्तियां, जो उन्होंने ''चुप की दाद'' में व्यक्त की है. जो हम सबको अपने दिल में उतार लेनी चाहिए.
ऐ मांओं, बहन बेटियों,
दुनिया की जीनत तुम से है.
मुल्क़ों की बस्ती हो तुम्हीं,
क़ौमों की इज्ज़त तुमसे है.
(सैय्यदा हमीद मुस्लिम विमेंस फ़ोरम की संस्थापिका हैं और योजना आयोग की पूर्व सदस्या हैं. आलेख में उनके निजी विचार हैं.)
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