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खाने के ठेकेदारों के आगे रेल प्रशासन मजबूर?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मुझे बचपन के वो दिन भी याद हैं जब लंबी ट्रेन यात्रा शुरू करने से पहले घर से ही खाने का इंतज़ाम कर चलना पड़ता था. लंबा सफर हो तो इंतज़ाम कई दिनों का. ऐसा नहीं है कि स्टेशनों पर खाना नहीं मिला करता था.
उस समय 'बेस किचन' हुआ करते थे जिन्हें रेलवे के वाणिज्य विभाग द्वारा संचालित किया जाता था. 'बेस किचन' से स्टील की बड़ी थालियों में निर्धारित स्टेशनों पर खाना ट्रेन में चढ़ाया जाता था. खाना स्वादिष्ट हुआ करता था और बड़े चाव से हम उसका इंतज़ार करते थे.
ट्रेन में सवार होने से पहले ही पीने के पानी का इंतज़ाम भी कर लेना पड़ता था.
सफर में पानी को ठंडा रखने के लिए लोग सुराहियाँ भी लेकर चला करते थे. बड़े-बड़े जंक्शनों पर पीने का पानी भरने के लिए लंबी क़तारें लगा करती थीं. बोतलबंद पानी या 'पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर' की कोई परिकल्पना ही नहीं थी.
भारतीय रेल का विकास हुआ और सुविधाओं का भी. आहिस्ता-आहिस्ता खाना सप्लाई करने की व्यवस्था निजी हाथों में चली गयी. कुछ 'बेस किचन' रह गए मगर खाने की व्यवस्था ज़्यादातर निजी हाथों में चली गयी.
इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पोरेशन यानी 'आईआरसीटीसी' का भी गठन हुआ जिसकी देख-रेख में खाने के सप्लाई की व्यवस्था काम करने लगी.
व्यवस्था चलती रही मगर समय के साथ-साथ व्यवस्था में गिरावट की शिकायतें आम होने लगीं.
हाल ही में संसद में भारत के नियंत्रक व महालेखा परीक्षक यानी 'सीएजी' ने अपनी पेश की गयी रिपोर्ट में भारतीय रेल में यात्रियों को दिए जाने वाले खाने की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े किये हैं.
सिर्फ गुणवत्ता ही नहीं, सवाल तो खाने के एवज़ में पैंट्री के लोगों द्वारा यात्रियों से वसूली गयी रक़म पर भी उठाये गए.
हालांकि, रेल की तरफ से ट्रेन में बिकने वाली हर खाद्य सामग्री का शुल्क निर्धारित किया गया है. सीएजी की रिपोर्ट में ख़ुलासा किया गया है कि कई ट्रेनों में इस निर्धारित रक़म से ज़्यादा वसूला जा रहा है.
सीएजी की रिपोर्ट के बहाने मैंने भी ट्रेन का एक लंबा सफर तय किया. पुरानी दिल्ली से न्यू जलपाईगुड़ी तक का सफर. 36 घंटों के सफर में कई बार ट्रेन में मौजूद पैंट्री से खाना भी मंगवाया और पानी भी.
हालांकि यह सफर सीएजी की रिपोर्ट के आने के बाद तय किया गया और तब तक रेलवे प्रशासन एहतियाती क़दम उठाने शुरू कर दिए थे.
पता चला कि हर ट्रेन में आईआरसीटीसी की तरफ से निरीक्षक तैनात कर दिए गए. आईआरसीटीसी का कहना है कि इसी साल फरवरी माह से उसने अपनी नयी कैटरिंग पॉलिसी शुरू की है.
फिर भी जो चीज़ें नहीं बदलती नज़र आयीं वो थीं ट्रेन में अनाधिकृत 'वेंडरों' द्वारा खाना बेचा जाना.
पुरानी दिल्ली से जब ट्रेन रवाना हुई उसके कुछ ही घंटों के अंदर ही खाना और पानी बेचने वाले सवार हो गए. इनमे से कइयों ने वैसी ही पोशाक पहन रखी थी जैसी पोशाक पैंट्री में काम करने वाले पहनते हैं.
मेरे सामने से ट्रेन की पैंट्री का ही एक सदस्य पानी लेकर गुज़र रहा था.
नियम के अनुसार पानी आईआरसीटीसी द्वारा निर्धारित 'रेल नीर' ब्रांड का ही होना चाहिए था, मगर वो कुछ और ब्रांड का निकला. पूछा तो पैंट्री वाले ने बताया कि 'रेल नीर' ख़त्म हो गया है.
ट्रेन की पैंट्री के मैनेजर राकेश यादव ने मुझे अपने 'किचन' का मुआयना करवाया. ज़ाहिर सी बात है कि रिपोर्ट के बाद उठाये क़दम की वजह से स्थितियां उतनी खराब नहीं थीं जितनी पहले हुआ करती थीं.
यादव ने उन अनधिकृत वेंडरों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि इनपर कोई नियंत्रण नहीं है.
यादव का कहना था: "ये सब संगठित हैं. इनसे सब मिले हुए हैं. ये टीटी, पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल के साथ मिलकर काम करते हैं. इसलिए इन्हें ट्रेन में चढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. कई स्टेशन ऐसे हैं जहां हमें कह दिया जाता है कि हम वहाँ पैंट्री से सामान नहीं बेच सकते हैं. अब हमारा किचन सबके सामने है. ट्रेन में है. ये लोग कहाँ खाना पकाते हैं? कैसे पकाते हैं? किस तेल और मसाले का इस्तेमाल करते हैं? कोई नहीं जानता. ये खाना खाकर लोग बीमार होते हैं और बदनाम हम होते है."
मगर ऐसा नहीं है कि सबकुछ ठीक चल रहा है. मेरे साथ सफ़र करे रहे विवेक साह हमेशा ट्रेन से ही सफर करते हैं. अपने काम की वजह से उन्हें इस ट्रेन में ज़्यादा सफर करना पड़ता है. अपने अनुभव को साझा करते हुए विवेक राकेश यादव के दावों को ख़ारिज करते हैं.
उनका कहना है कि पैंट्री से मिलने वाला खाने की गुणवत्ता भी ठीक नहीं है और तादात भी. उन्हें लगता है कि शिकायतों के बावजूद इस व्यवस्था में सुधार नहीं हो रहा है.
आईआरसीटीसी की कर्मचारियों की यूनियन के सुरजीत श्यामल ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि कॉर्पोरेशन ट्रेनों में परोसे जाने वाले खाने की गुणवत्ता निगरानी अच्छी तरह नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास कर्मचारी ही नहीं हैं.
श्यामल कहते हैं कि जहाँ एक तरफ नयी ट्रेनें शुरू हो रही हैं, वहीँ आईआरसीटीसी अपने कर्मचारियों की छटनी कर कर रहा है.
रेलवे के अधिकारी जेपी तिवारी से मेरी मुलाक़ात तब हुई जब वो ट्रेन में यात्रा करने वालों से खाने और दूसरी सुविधाओं के बारे में जानकारी ले रहे थे. बीबीसी से बात करते हुए तिवारी का कहना था कि रेल प्रशासन ने खाना और दूसरी सुविधाओं में बेहतरी के लिए कड़े क़दम उठाये हैं.
इस क्रम में वैसे ठेकेदारों को बर्खास्त किया गया है जिनके बारे में शिकायतें ज़्यादा मिलने लगीं.
हाल ही में रेल मंत्रालय ने भी ट्वीट के ज़रिये इन ठेकेदारों को 'ब्लैक लिस्ट' में डालने की बात भी कही थी. मगर जानकार कहते हैं कि रेलवे में ठेकेदारों की एक ऐसी 'मोनोपोली' है जिसकी वजह से कोई उनके खिलाफ कार्यवाही नहीं कर सकता.
इनमें से कुछ ऐसे हैं जिन्हे पूरे भारत की 70 प्रतिशत ट्रेनों में खाना सप्लाई का ठेका मिला हुआ है. इन्हें पूरी तरह हटाने की सूरत में रेलवे के पास कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं है जिससे ट्रेनों में बिना किसी दिक्कत के खाने की सप्लाई की व्यवस्था की जा सके. तो सवाल उठता है कि क्या खाने के ठेकेदारों के आगे रेल प्रशासन मजबूर है?
इसी को देखते हुए रेलवे ने अब हर स्टेशन पर और निजी कंपनियों को खाने की सप्लाई के लिए आमंत्रित करने का फैसला किया है. ये व्यवस्था कितनी कारगर साबित होगी? ये तो वक़्त ही बताएगा.
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