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इंफ़ोसिस के 'चक्रव्यूह' में कैसे फंसे 'क्षत्रिय' सिक्का
इंफ़ोसिस से विशाल सिक्का जाना अचानक नहीं हुआ है. इसकी ज़मीन पहले से ही तैयार होनी शुरू हो गई थी.
जब विशाल सिक्का ने इंफ़ोसिस की कमान संभाली थी तो इस कंपनी के संस्थापकों में से एक एन नारायणमूर्ति ने यह कहते हुए उनका स्वागत किया था कि विशाल सिक्का का मतलब 'मोर मनी' होता है.
नारायणमूर्ति के लिए विशाल सिक्का बहुत दिनों तक 'मोर मनी' नहीं रहे और विवादों का सिलसिला शुरू हो गया था. इसी साल फ़रवरी महीने में इंफ़ोसिस बोर्ड और इसके संस्थापकों के बीच मतभेद खुलकर सामने आए थे.
कंपनी के नेतृत्व में मतभेदों के कारण निवेशकों में निराशा बढ़ने लगी थी. इन्हीं विवादों और कलह के बीच विशाल सिक्का ने कहा था, ''मैं क्षत्रिय योद्धा हूं. मैं यहां अडिग हूं और लड़ने के लिए तैयार हूं.''
हालांकि विशाल सिक्का ने जब अपनी यह पारंपरिक पहचान बताई थी तो सोशल मीडिया पर उनकी जमकर आलोचना हुई थी. लोगों का कहना था कि विशाल सिक्का ने 'पॉलिटिकली करेक्ट स्टेटमेंट' नहीं दिया है.
जब इंफ़ोसिस में ये सब चल रहा था तब अमरीका में इस बात का शोर था कि टेक कंपनियां स्थानीय नौकरियों पर डाका डाल रही हैं. अमरीका का यह शोर सच में बदलता दिखा जब ट्रंप ने अमरीका की कमान संभाली. कहा जाता है कि सिक्का इस समस्या से निपटने में कामयाब रहे थे.
शुक्रवार को अपने त्यागपत्र में सिक्का ने बताया कि कैसे वह नकारात्मकता के दुष्चक्र में फसंते गए.
उन्होंने लिखा है, ''पिछले कई महीनों से हमलोग एक किस्म के झूठ, आधारहीन और दुर्भावनापूर्ण चीज़ों में घिरते गए. लोगों पर निजी हमले बढ़ने लगे. जितने आरोप लग रहे थे, वे सारे झूठे साबित हुए. कई बार तो स्वतंत्र जांच में चीज़ें बेबुनियाद साबित हुईं. इन सबके बावजूद हमले थमे नहीं. स्थिति काफ़ी नाजुक होती गई. कई लोगों ने इसे काफ़ी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया.''
विशाल सिक्का ने आगे लिखा है, ''पिछले कई महीनों से नकारात्मकता और ध्यान भटकाने की प्रक्रिया जारी रही. इससे हमारी क्षमता बुरी तरह से प्रभावित हुई और इस वजह से जो सकारात्मक बदलाव होने चाहिए थे वो थम गए. इन चीज़ों से जूझने में मैंने अपना ख़ुद का नुक़सान किया. हाल के दिनों में मेरे सैकड़ों घंटे बर्बाद हुए हैं. इन हालात में कई तरह की चुनौतियां सामने आईं. कंपनी को हम जिस रास्ते और गति से आगे ले जाना चाहते थे उसकी कीमत चुकानी पड़ी.''
विशाल सिक्का की भावना से कंपनी के बोर्ड ने भी सहमति जताई है. बोर्ड ने कहा है कि नारायणमूर्ति का विशाल सिक्का पर हमला थम नहीं रहा था. इसी वजह से सिक्का ने कंपनी बोर्ड के समर्थन के बावजूद इस्तीफ़ा दे दिया.
जब सिक्का ने इंफ़ोसिस की कमान संभाली थी तो उन्होंने चुनौतियों की व्याख्या करते हुए कहा था, ''हमारी (इंफ़ोसिस) की वृद्धि दर धीमी है और नौकरी छोड़ कर जाने वालों की दर ज़्यादा है. लोगों की समझ है कि मैं यहां चीज़ों को दुरुस्त करने आया हूं. हमारे ऊपर कई तरह के दबाव हैं.''
विशाल सिक्का इंफ़ोसिस के पहले ग़ैर-संस्थापक सीईओ थे. उनसे उम्मीद थी कि वो कंपनी को निराशा के दौर से बाहर निकालेंगे. विशाल सिक्का के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने एक बदलाव यह किया कि ऑफिस बेंगलुरु से अमरीका में पालो अल्टो लेकर चले गए. विशाल सिक्का इंफ़ोसिस के पहले सीईओ थे जो कंपनी का संचालन अमरीका से कर रहे थे. वह अमरीका से बेंगलुरु आते-जाते रहते थे.
सिक्का इंफ़ोसिस में अपनी प्राथमिकताओं के साथ पहुंचे थे. उन्होंने कंपनी के विस्तार पर ध्यान दिया. सिक्का ने निवेश का दायरा बढ़ाना शुरू किया. कंपनी ने अब तक का सबसे बड़ा अधिग्रहण किया.
विशाल सिक्का की नीतियों से कंपनी के संस्थापक शेयरधारक सहमत नहीं थे. ख़ासकर मूर्ति चाहते थे कि सिक्का कंपनी की जो पुरानी संरचना है उसी के दायरे में बदलाव करें.
दूसरी तरफ़, सिक्का कंपनी की पुरानी संरचना को बदलना चाहते थे. विशाल सिक्का अगस्त 2014 में इंफ़ोसिस आए थे.
कई विश्लेषकों का कहना है कि विशाल सिक्का पुरानी संरचना में बदलाव नहीं देख रहे थे. मूर्ति मीडिया में अक्सर बयान देने लगे थे. ऐसा करके वह सिक्का पर लगातार दबाव बनाते रहे.
सिक्का ख़ुद को इसी चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकाल पाए. उनके इस्तीफ़े का ठीकरा कंपनी के बोर्ड ने नारायण मूर्ति पर फोड़ा तो उन्होंने कहा कि उन्हें अपने बच्चों के लिए पैसे और पद की ज़रूरत नहीं है. वह बोर्ड के आरोपों पर बुरी तरह से भड़के हुए थे.
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