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नज़रिया: 'कश्मीर में जो हो रहा है उससे दिल्ली ख़ुश होगी'
- Author, बशीर मंज़र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
कश्मीर घाटी में संविधान के अनुच्छेद 35ए के समर्थन में शनिवार को पूर्ण बंद रहा.
चारों ओर से घिरी मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती को उस समय राहत मिली जब उनकी गठबंधन सहयोगी बीजेपी के मुखिया और राज्य के उपमुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी राज्य में अनुच्छेद 35ए पर मौजूदा स्थिति को बरकरार रखने के गठबंधन के एजेंडे पर टिकी रहेगी.
देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के 14 मई 1954 को पारित आदेश के तहत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35ए अस्तित्व में आया था जो जम्मू और कश्मीर पर लागू हुआ था.
ये अनुच्छेद राज्य विषय सूची के उन क़ानूनों को संरक्षित करता है जो महाराजा के 1927 और 1932 में जारी शासनादेशों में पहले से ही परिभाषित किए गए थे.
राज्य के विषय क़ानून हर कश्मीरी पर लागू होते हैं चाहे वो जहां भी रह रहे हैं. यही नहीं ये संघर्षविराम के बाद से निर्धारित सीमा के दोनों ओर भी लागू होते हैं.
भारतीय संविधान के इस अनुच्छेद को एक ग़ैर सरकारी संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
कश्मीर में ये आम भावना है कि ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इशारे पर हुआ है और ये जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के उद्देश्य से किया गया है.
अलगाववादियों ने बुलाई हड़ताल
दिल्ली में एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती के एक बयान के बाद कश्मीर में ये बड़ा विवादित मुद्दा बन गया है. महबूबा मुफ़्ती ने कहा था कि यदि अनुच्छेद 35ए से छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर में भारत का झंडा थामने वाला कोई नहीं बचेगा.
महबूबा के इस बयान के बाद जम्मू-कश्मीर की मुख्य विपक्षी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) ने महबूबा पर निशाना साधते हुए कहा कि वो ही जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के ख़िलाफ़ साज़िश रच रही बीजेपी के साथ राज्य में सत्ता साझा कर रही हैं.
भारतीय संविधान को नकारने वाले अलगाववादी नेता भी इस तर्क के साथ विवाद में शामिल हो गए कि बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर की जनसंख्या बदलकर उसे हिंदू बहुल बनाने के लिए अनुच्छेद 35ए को खत्म करने की कोशिश कर रही है ताकि यदि भविष्य में कभी कश्मीर की आजादी को लेकर जनमतसंग्रह हो तो नतीजे को भारत के पक्ष में लाया जा सके.
इसलिए ही शनिवार को कश्मीर के तीन बड़े अलगाववादी नेताओं सैयद अली गिलानी, मीरवाइज़ उमर फारूक़ और यासीन मलिक ने हड़ताल बुलाई थी.
दबाव में आई मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सांसद और नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला से मुलाक़ात की. यही नहीं महबूबा ने कांग्रेस समेत अन्य छोटी विपक्षी पार्टियों के साथ भी बातचीत की.
मुलाकात पर सवाल
महबूबा मुफ्ती ने जब इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात का फ़ैसला लिया तो सवाल उठे कि जब मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में है तब वो प्रधानमंत्री से मिल कर क्या हासिल करना चाहती हैं.
दोनों नेताओं के बीच हुई बैठक में क्या हुआ इसका अधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री की ओर से कुछ पता नहीं चल पाया. हालांकि महबूबा मुफ्ती ने कहा कि प्रधानमंत्री ने धारा 370 पर पीडीपी-बीजेपी सरकार के स्टैंड के प्रति सहयोग जाहिर किया है.
महबूबा मुफ्ती से जब बार बार यह पूछा गया कि क्या उन्हें प्रधानमंत्री मोदी से धारा 370 को लेकर कोई भरोसा मिला है तो उन्होंने जवाब दिया, "हमारा गठबंधन इसी आधार पर हुआ था कि धारा 370 के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी इसलिए हममें (बीजेपी और पीडीपी) में से कोई भी इसके ख़िलाफ़ नहीं जाएगा."
महबूबा मुफ्ती या उनकी विपक्षी नेशनल कांफ्रेंस जो भी कहें लेकिन कश्मीर घाटी में अनुच्छेद 35ए को लेकर चिंताएं गंभीर हैं. आम लोग भी ये मान रहे हैं कि अनुच्छेद 35ए से छेड़छाड़ का मतलब कश्मीर के लोगों की पहचान को कम करना होगा.
मुद्दा बदलने की खुशी?
संविधान के एक विशेषज्ञ कहते हैं, "जम्मू-कश्मीर हरियाणा या बिहार नहीं हैं. हमारा इतिहास अलग है. हम कुछ शर्तों के साथ 1947 में भारत में शामिल हुए थे. यदि उन शर्तों का सम्मान नहीं किया जाता है फिर अलगाववाद हो या न हो, भारत समझौते को कमज़ोर कर रहा है."
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर में जो हो रहा है उससे दिल्ली सरकार ख़ुश होगी. वो कहते हैं, "अलगाववादी आज़ादी चाहते हैं और पाकिस्तान का समर्थन करते हैं और अब इस नए मुद्दे के साथ वो सड़कों पर हैं, भारत के संविधान को बचाने के लिए."
ये बिडम्बना है, लेकिन सच है.
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