You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
#70yearsofpartition: 'सभी पाकिस्तान में, दिल्ली में सिर्फ़ मैं बचा हूं'
- Author, मिर्ज़ा ए.बी बेग
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, दिल्ली
नब्बे के दशक में जब दिल्ली में स्थापित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दाख़िला लिया तो मुझे एक शिक्षक अच्छे लगे और वह भी इसलिए कि उनमें महान अभिनेता दिलीप कुमार की हल्की-सी झलक आती थी और शायद वह ख़ुद को उनकी तरह से रखने की कोशिश करते थे.
वह भारतीय भाषाओं के केंद्र में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर असलम परवेज़ थे. सैकड़ों मील दूर से आकर हम हॉस्टल में रहने वालों को सबसे अधिक त्योहारों में कठिनाई होती थी और ऐसे में जब कोई निमंत्रण मिल जाए तो क्या कहने.
ईद, बक़रीद पर पुरानी दिल्ली में तुर्कमान गेट और जामा मस्जिद के बीच असलम साहब के घर पर हमें न्योता मिलता और लज़ीज़ भोजन के साथ वह हमें विभिन्न प्रकार के रोचक क़िस्से भी सुनाते. दिल्ली के कूचे अगर चित्रकारों के कैनवस थे तो दिल्ली की बातें मनमोहक.
उन्हें छोड़कर पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया
एक दिन बातों-बातों में उन्होंने विभाजन की बात छेड़ दी और फिर मेरी हैरत की कोई सीमा नहीं रही जब यह पता चला कि उन्हें छोड़ कर उनके परिवार के सारे सदस्य पाकिस्तान जा बसे हैं.
फ़िल्मी कहानियों की तरह मेरे मन में यह विचार आया कि हो न हो अपने प्यार की ख़ातिर वह अपने घर से अलग हो गए हों और घर वालों से अलग होकर बाकी जीवन दिल्ली में ही बिताने का फ़ैसला कर लिया हो. वैसे भी बाज़ौक़ आदमी हैं और कहते हैं ना कि "कौन जाए ज़ौक़ दिल्ली की गलियां छोड़कर."
उन्होंने सरसरी बताया कि वह और उनके पिता तो दिल्ली रह गए और उनकी माँ तीन भाइयों और बड़ी बहन के साथ पाकिस्तान चली गईं. माँ का मानना था कि यह दोनों भी चले आएंगे लेकिन वे अपनी धुन के पक्के निकले.
उन्होंने दो साल पहले प्रकाशित होने वाली अपनी पुस्तक "हमारी दिल्ली" में इसका ज़िक्र किया है.
वे लिखते हैं: "1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के अंत पर स्वतंत्रता संग्राम में राजनीतिक गरमागर्मी का दौर शुरू हुआ. सन 1947 में स्वतंत्रता के साथ पूरे उपमहाद्वीप में सांप्रदायिक दंगों की आग भड़क उठी. दिल्ली के करोल बाग़, पहाड़गंज और सब्ज़ी मंडी के क्षेत्र मुसलमानों से पूरी तरह ख़ाली हो गए."
"मुसलमानों ने न सिर्फ़ फ़साद पीड़ित क्षेत्रों से पलायन शुरू कर दिया बल्कि जो इलाक़े दंगों की आग से सुरक्षित रहे वहाँ की भी बड़ी आबादी पाकिस्तान जाने लगी. उधर पाकिस्तान से हिंदू शरणार्थियों के क़ाफ़िले दिल्ली पहुँजने शुरू हो गए."
"हमारे पड़ोस में हमारे ही परिवार के दस बारह घर बसे थे सबने पाकिस्तान का रुख़ किया, केवल हमारे बाप इस बात पर अटल थे कि उन्हें हर हाल में यहीं जीना और मरना है. बुज़ुर्गों ने समझाया कि इस कारख़ाने को बेचो और अपना बोरिया-बिस्तर यहां से उठाओ, उन्होंने कहा: मैं कारख़ाने की एक कील तक नहीं बेचूंगा. हाँ कोई बहुत बुरा समय आ गया तो उसे यमुना में ले जाकर विसर्जित कर दूंगा."
'दंगे पुलिस के बस की बात नहीं रह गए थे'
उन्होंने बताया, "1947 के एक साल बाद जब स्थिति कुछ सामान्य होना शुरू हुई तो एंग्लो-अरबिक स्कूल फिर से खुला. दंगों के हंगामों का शिकार एंग्लो-अरबिक स्कूल की इमारत भी हुई थी जिसकी एक ख़ाली पड़ी इमारत में सरकार ने मद्रास रेजिमेंट की एक टुकड़ी बैठा दी थी ताकि दंगे पर क़ाबू पाया जा सके क्योंकि यह दिल्ली पुलिस के बस की बात नहीं रह गई थी."
"1948 में मुसलमानों के उजड़ने के बाद एंग्लो-अरबिक की तीन में से केवल एक ही शाखा अजमेरी गेट वाली इमारत में खुली और उच्च माध्यमिक के 1948 और 1949 की परीक्षा के परिणामों में एंग्लो-अरबिक का हिस्सा शून्य रहा, यानी इन वर्षों में कोई भी वहाँ पास न हुआ."
"इसका कारण अधिकांश तो दिल्ली के मुसलमानों की ख़राब हालत थी लेकिन कुछ लोगों को अविश्वास ने घेर लिया कि शायद मुस्लिम दुश्मनी के कारण एंग्लो-अरबिक के छात्रों को जानबूझ कर फ़ेल किया गया. लोगों को यह आशंका होने लगी कि दिल्ली में अब मुसलमानों की शिक्षा का कोई भविष्य नहीं है और अधिकांश छात्रों ने मुस्लिम विश्वविद्यालय अलीगढ़ का रुख़ किया जिसके क़ाफ़िले में मैं और ख़लीक़ अंजुम भी थे. "
गौरतलब है कि ख़लीक़ अंजुम बाद में उर्दू के प्रसिद्ध शोधकर्ता कहलाए और असलम परवेज़ की शादी उनकी बहन से हुई.
उन्होंने अपनी किताब में लिखा है: "1947 के मुश्किल दौर में हमारे परिवार और रिश्तेदारों के सभी परिवार सिमट कर पाकिस्तान चले गए. एक हमारे पिता थे जो किसी क़ीमत पर वहां जाना नहीं चाहते थे ... माँ ने मेरे तीन छोटे भाइयों को तुरंत मेरी बहन के पास कराची भेज दिया और ख़ुद इसलिए रुकी रहीं कि मैं उस समय अलीगढ़ में पढ़ रहा था ... मेरा स्वभाव पिता से मिलता था ... जब मैं अलीगढ़ से लौटकर सीधे बाजी (असलम परवेज़ अपनी माँ को बाजी कहते थे) के पास आया तो उन्होंने मेरा पासपोर्ट बनवाया और मुझे पाकिस्तानी दूतावास से वीज़ा दिलवाकर कराची के लिए रवाना कर दिया."
"वाघा से सीमा पार करने के बाद पहले हम लाहौर पहुंचे. यहाँ मेरी मौसेरी बहन और सगी बुआ पहले से ही रह रही थी. एक सप्ताह लाहौर में रहा. लाहौर के गली-कूचे और साझा हिंदू-मुस्लिम नाम लाहौर का रावी नदी का नज़ारा, और लाहौर में आ बसने वाले दिल्ली वालों ने मुझे दिल्ली का सा आनंद पहुंचाया ... "
'पहले सभी बच्चों को पाकिस्तान भेजा'
"बाजी की सभी औलादें उनकी व्यवस्था के अनुसार कराची पहुँच चुकी थीं, उनमें अंतिम पहुँचने वाला मैं था और बाजी किसी भी पल कराची की उड़ान के लिए पर तोल रही थीं. इस दौरान मेरे बाप ने मेरी बाजी के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर कर दिया कि "मेरी पत्नी गौहर सुल्तान (असलम परवेज़ की माँ) ने मेरे चारों बेटों का अपहरण करके पाकिस्तान रवाना कर दिया है. बाजी मुक़दमेबाज़ी में बाप का मुक़ाबला तो नहीं कर सकती थीं वे तो बस अदालत का समन आने से पहले भारत से बाहर जाना चाहती थीं जिसमें वे सफल हो गईं.
"आख़िर अगर पिता ख़ान-ज़ादे थे तो वह मुग़ल बच्ची. बहरहाल अब दिल्ली में मुहम्मद अकबर ख़ान की पीढ़ी के अंतिम चश्मो-चिराग़ में मैं यानी असलम ख़ान, उर्फ़ मोहम्मद असलम, उर्फ़ असलम परवेज़ रह गया हूँ. "
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)