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जब भारत को था जापान के हमले का डर
भारत छोड़ो आंदोलन के 76 साल पूरे हो चुके हैं.
आख़िर, इतने साल बाद भारत छोड़ो आंदोलन की प्रासंगिकता क्या है? और, भारत छोड़ो आंदोलन से सत्तारूढ़ बीजेपी का क्या संबंध है?
बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार ने इतिहासकार मृदुला मुखर्जी से बात करते हुए इन सारे सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की.
कभी ख़त्म नहीं होगी भारत छोड़ो आंदोलन की प्रासंगिकता
भारत छोड़ो आंदोलन की प्रासंगिकता कभी ख़त्म नहीं होगी. इस आंदोलन की चाहे जो भी वर्षगांठ हो ये हमेशा महत्वपूर्ण रहेगा.
आंदोलन का नेतृ्त्व कर रही कांग्रेस ने पहली बार अंग्रेज़ों के सामने मांग रखी थी कि आपको भारत अभी छोड़ना होगा.
आज़ादी की मांग तो बहुत पहले से चल रही थी लेकिन तब इसे लेकर बातचीत होती थी. 1942 में जब यह आंदोलन शुरू हुआ तो कांग्रेस ने साफ़ कहा कि अब इस बारे में कोई बातचीत नहीं होगी और आपको तत्काल जाना होगा.
यह आंदोलन दूसरे विश्व युद्ध के बिल्कुल बीच में शुरू हुआ था.
जापान करना चाहता था भारत पर आक्रमण
उस वक़्त हालात ये थे कि एक तरफ़ से जापान पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया को पार करते हुए भारत की तरफ़ बढ़ रहा था.
हमारे जो राष्ट्रीय नेता थे, ख़ासकर महात्मा गांधी, जिनकी समझ थी कि जापान ने अगर इधर हमला कर दिया तो क्या होगा? अंग्रेज़ों ने दक्षिणी-पूर्व एशिया में जापान के सामने पूरी तरह से सरेंडर कर दिया था. ऐसे में जापान ने भारत पर हमला किया तो क्या होगा?
कांग्रेस को लग रहा था कि हमले की सूरत में अंग्रेज़ छोड़कर भाग गए तो यहां फिर जापानियों का राज होगा.
दूसरे विश्व युद्ध में जापान और ब्रिटिश एक दूसरे के दुश्मन थे. दोनों दुनिया भर में एक दूसरे से लड़ रहे थे.
ऐसे में भारतीय नेताओं के मन में जापान के हमले की आशंका घर करना कोई चौंकाने वाली बात नहीं थी. ऐसा लग रहा था कि जापान भारत में भी अंग्रेज़ों पर हमला कर सकता है.
इससे पहले पूर्वी एशिया से अंग्रेज़ आत्मसमर्पण करके भाग गए थे. ऐसे में भारत को लग रहा था कि वह एक उपनिवेश से मुक्त होकर दूसरे उपनिवेश में चला जाएगा.
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भारतीय नेताओं को लगने लगा कि अब लड़ाकू रुख अपनाना चाहिए.
भारतीय नेताओं ने अंग्रेज़ों से साफ़ कहा कि अगर वो दूसरे विश्वयुद्ध में सहयोग चाहते हैं तो भारत के राष्ट्रीय नेताओं को सत्ता में शामिल करना होगा. एक राष्ट्रीय सरकार बनाइए जो लड़ सके. अगर ब्रिटिश उन्हें बाहर रखकर ऐसा करना चाहते हैं तो भारत से जाइए.
दूसरा विश्व युद्ध और भारत छोड़ो आंदोलन यही पूरा संदर्भ था.
अंग्रेज़ों के लिए यह युद्ध का समय था और उन्हें लगा कि वो कोई भी ऐसा क़दम नहीं उठाएंगे जिससे उन्हें झटका लगे.
आंदोलन कुचलने के लिए अंग्रेजों ने चलाए बम
भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए ब्रितानी हुकूमत ने बड़ा ही कड़ा रवैया अपनाया.
हवाई जहाजों से बम तक गिराए गए. एक अनुमान के मुताबिक़ इसमें कम से कम 10 हज़ार लोग मारे गए थे. हालांकि, भारतीयों ने भी हार नहीं मानी और राष्ट्रीय स्तर पर आंदलोन फैलता गया. भारतीय दबे बिल्कुल नहीं. यह आंदोलन अंडरग्राउंड भी चला.
भारत छोड़ो आंदोलन में लोगों ने ग़ज़ब की बहादुरी दिखाई. इसमें हर तबके के लोग शामिल थे. भारी संख्या में स्टूडेंट शामिल थे. छात्रों ने गांव-गांव जाकर प्रचार किया. किसानों को जगाया. पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में कई समानांतर सरकारें बनीं.
महिलाएं और मजदूरों ने भी इस आंदोलन में भाग लिया. कई उद्योगपतियों ने भी इसमें हिस्सा लिया. इसमें राष्ट्रीय एकता साफ़ दिखी.
इसमें लोगों की व्यापक पैमाने पर भागीदारी थी. यह आंदोलन विश्वयुद्ध ख़त्म होने के बाद भी चला.
इस आंदोलन से जुड़े कई बड़े नेता तीन-तीन साल तक जेल में रहे. इस आंदोलन ने साफ़ कर दिया था कि अब आप यहां रह सकते हैं.
संसद में भारत छोड़ो आंदोलन को श्रद्धांजलि दी जा रही है उससे बहुत खुशी हो रही है. इस आंदोलन का संदेश यही था कि इसमें कोई भेदभाव नहीं था.
अगर आज हम इस आंदोलन को याद करते हैं तो हमें उसकी भावना को याद रखना चाहिए. आज जिस तरह से धर्म के नाम पर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, भीड़ लोगों को पीटकर मार दे रही है और अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तो यह भारत छोड़ो आंदोलन की भावना नहीं है. हम इसे नहीं रोकेंगे तो सिर्फ़ शब्दों में ही इस आंदोलन को याद कर इसकी भावना का सम्मान नहीं कर पाएंगे.
भारत छोड़ो आंदोलन कांग्रेस की विरासत है इससे कौन इनकार कर सकता है? जितने भी नेताओं ने भारत छोड़ो आंदोलन का फ़ैसला लिया और जेल गए वो कांग्रेस के थे.
संघ और हिन्दू महासभा जैसे संगठन इसमें शरीक नहीं हुए थे. उन्हें इस बात को स्वीकार करना चाहिए और कहना चाहिए कि यह ग़लत क़दम था. कम से कम कांग्रेस को इसके लिए क्रेडिट तो देना चाहिए.
वाम दलों के इसमें हिस्सा नहीं लेने की वजह ये थी कि वो सोवियत यूनियन को अपना आदर्श मानते थे.
सोवियत यूनियन कई मोर्चों पर अंग्रेजों का साथ दे रहा था इसलिए वो उन्हें दुश्मन नहीं मानते थे. वहीं संघ वालों को लगता था कि उनके दुश्मन अंग्रेज़ नहीं मुसलमान हैं. उन्हें कांग्रेस का स्वतंत्रता आंदोलन स्वीकार नहीं था तो अपना भी कोई आंदोलन नहीं चलाया.
(बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार से बातचीत पर आधारित.)
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