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जेटली के केरल दौरे से भाजपा को कितना सियासी फ़ायदा?
- Author, इमरान कुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
केरल में भाजपा और संघ ने कथित 'वामपंथी हिंसा' के ख़िलाफ बड़ा अभियान शुरू किया है और इसीलिए केंद्रीय वित्त और रक्षा मंत्री अरुण जेटली का केरल दौरा संगठन के लिए राजनीतिक तौर पर अहम था.
सीपीएम के इस गढ़ को संघ 'लाल चरमपंथ के प्रदेश' की तरह प्रचारित करना चाहता है और इस लिहाज से राज्य में जेटली की मौजूदगी अहम थी.
लेकिन कुछ राजनीतिक जानकार उनके दौरे को संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं की राजनीतिक हत्याओं के मुद्दे को तूल देने के प्रयास की तरह देखते हैं, ताकि इस मसले को ज़िंदा रखकर 2019 के लोकसभा चुनावों में इसका फ़ायदा लिया जा सके.
'घाव देखकर आतंकी भी शरमा जाए'
तिरुवनंतपुरम में जेटली ने संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं की ओर से कथित तौर पर सीपीएम कार्यकर्ताओं की हत्या के सवाल को ख़ारिज़ कर दिया. उन्होंने कहा कि हत्याओं पर रोक लगाने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह प्रदेश सरकार की है.
जेटली उस संघ-भाजपा कार्यकर्ता के घर भी गए, जिसकी 29 जुलाई को हत्या कर दी गई थी इसका आरोप सीपीएम कार्यकर्ताओं पर है. उन्होंने कहा, 'राजेश के शरीर पर जैसे घाव हैं, उन्हें देखकर कोई आतंकी भी शरमा जाता.'
जेटली ने इस राजनीतिक संघर्ष में जान गंवाने और ज़ख़्मी होने वाले संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं के परिवारों के साथ भी बैठक की.
'सीपीएम की तरफ़ हत्याएं ज़्यादा हुईं'
इसी दिन, कथित तौर पर संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं की ओर से मारे गए सीपीएम कार्यकर्ताओं के परिजनों ने राजभवन पर विरोध प्रदर्शन किया और जेटली से मुलाक़ात की मांग की.
सीपीएम सांसद एमबी राजेश ने बीबीसी हिंदी से कहा, "यह सीपीएम और दूसरे वामपंथी दलों को बदनाम करने की कोशिश है. राजनीतिक हिंसा के लिए संघ और बीजेपी भी बराबर ज़िम्मेदार है. केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 2000 से 2017 के बीच सीपीएम के 86 और संघ के 65 कार्यकर्ताओं की मौत हुई है."
एमबी राजेश ने जेटली को चिट्ठी लिखकर केरल में उनका स्वागत किया और फिर कथित 'दोहरेपन' के लिए उनकी आलोचना की.
उन्होंने अपनी चिट्ठी में लिखा, 'संघ कार्यकर्ताओं, अलेप्पी के अनंत और त्रिशूर के निर्मल की हत्या के आरोपियों के ख़िलाफ़ संघ-बीजेपी ने कोई क़दम नहीं उठाया.'
'वामपंथ को ख़त्म करने की कोशिश'
राजेश कहते हैं, 'हमें इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि संघ-भाजपा की राजनीति केरल में नाकाम हो चुकी है. वो जानते हैं कि केरल में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई शांतिपूर्ण तरीके से रहते हैं और ये उन्हें पसंद नहीं है. ये कोशिश 2019 के चुनावों में कुछ सीटें जीतने से कहीं ज़्यादा की है. यह सीपीएम और वामपंथ को ख़त्म करने की कोशिश है.'
केरल में वामपंथी और संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच दशकों से ख़ूनी संघर्ष हो रहे हैं. लेकिन केंद्र में भाजपा सरकार आने के साथ सीपीएम की अगुवाई वाली केरल की एलडीएफ़ सरकार पर इसे नियंत्रित करने का दबाव बन रहा है.
'द हिंदू' अख़बार में एसोसिएट एडिटर सी. गौरीदासन नायर कहते हैं, "संघ-भाजपा को लगता है कि अगर ये दबाव 2019 तक बनाकर नहीं रखा गया तो चुनावों में यहां से उनके हाथ ज़्यादा कुछ नहीं आएगा. इसलिए बाक़ी भारत में केरल के लिए 'ख़ूनी प्रदेश' जैसा अभियान शुरू किया गया है. ईमानदारी की बात यही है कि पिनराई विजयन की सरकार ने बीते एक साल में कुछ अच्छे काम किए हैं."
'मध्य वर्ग हो सकता है प्रभावित'
नायर यह भी कहते हैं, "लेकिन संघ-भाजपा का यह अभियान केरल में मध्यवर्ग का ध्यान खींच सकता है. प्रदेश सरकार ने भले ही उनकी अनदेखी न की हो, लेकिन वे संघ-भाजपा के इस अभियान से प्रभावित हो सकते हैं."
नायर मानते हैं कि देश में राजनीति के आयाम बदल गए हैं. भाजपा केंद्र और 18 प्रदेशों में सत्ता में है. उनके मुताबिक, "बीजेपी अनुच्छेद 356 (कानून व्यवस्था की स्थिति के आधार पर सरकार बर्खास्त करना) का इस्तेमाल शायद न करे, लेकिन कुछ भी हो सकता है."
लेकिन नायर सवाल उठाते हैं, "क्या सीपीएम अपने कार्यकर्ताओं को काबू कर पाएगी?"
बीते हफ़्ते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता राजेश एडावाकोड की हत्या के बाद से राज्य में सियासत गर्माहट बढ़ गई है. संघ ने इस हत्या के लिए सीपीएम कार्यकर्ताओं को ज़िम्मेदार ठहराया है.
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