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दार्जिलिंग चाय के शौक़ीन अब तरसने वाले हैं
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
अगर आप भी चाय के शौक़ीन हैं तो आपके लिए एक बुरी ख़बर है. किसी सुबह आपको गरमा गरम दार्जिलिंग चाय मिलना कठिन हो सकता है.
''चायों की शैम्पेन'' कही जाने वाली ये चाय पश्चिम बंगाल राज्य के दार्जिलिंग में हिमालय के तराई इलाकों में स्थित 87 बगीचों में उगाई जाती है.
इनमें से कुछ बागान तक़रीबन 150 साल पुराने हैं. इन्हें स्कॉटलैंड के एक सर्जन ने इस क्षेत्र में लगाया था.
80 लाख किलो में आधे से ज़्यादा- जिसका 60 फ़ीसदी हिस्सा ऑर्गेनिक है, हर साल चाय उत्पादन के बाद ब्रिटेन, यूरोप और जापान निर्यात किया जाता है.
चाय की सालाना बिक्री क़रीब 80 मिलियन डॉलर (लगभग 5 अरब रुपये) की होती है.
दार्जिलिंग चाय दुनिया की सबसे महंगी चायों में से एक है. इसमें से कुछ की कीमत 850 डॉलर (लगभग 54000 रुपये) प्रति किलो तक है.
जून से गोरखा समुदाय के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर हिंसक विरोध-प्रदर्शन और लंबी हड़ताल की वजह से दार्जिलिंग काफ़ी ज़्यादा प्रभावित है.
चाय के इन बागानों पर काम करने वाले करीब 100,000 स्थायी और अस्थायी मजदूरों ने काम रोक दिया है. इससे उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है.
ऑर्डर रद्द
बीते साल के मुक़ाबले, इस साल एक महज़ एक तिहाई चाय का उत्पादन की हो पाया है. अगर इसी तरह काम बंद रहा तो बागीचों के मालिकों का मानना है कि उन्हें तक़रीबन 40 मिलियन डॉलर (लगभग 2.5 अरब रुपये) का नुकसान होगा.
दार्जिलिंग चाय एसोसिएशन के प्रधान सलाहकार संदीप मुखर्जी ने बीबीसी को बताया, ''यह अब तक का सबसे बड़ा संकट है. आगे के सभी ऑर्डर रद्द किए जा रहे हैं और कोई भी नई सप्लाई नहीं हो रही. दार्जिलिंग के शौक़ीनों को हो सकता है ज़ल्द दूसरी चायों से काम चलाना पड़े.''
दार्जिलिंग में पैदावार का सीज़न मार्च से अक्टूबर के बीच महज़ सात महीने का होता है. यह भी चार अलग-अलग सीज़न में बंटा होता है.
मौजूदा हालात दूसरे सीज़न के बीच में बने हैं. इसी मौसम में चाय में एक ख़ास महक आती है और साल की आधी पैदावार और कमाई इसी में होती है.
''लिमिटेड एडीशन पेय''
दार्जिलिंग में अलगाववादियों के विरोध की वजह से यहां जनजीवन 1980 के दशक से ही प्रभावित है. लेकिन पहले ऐसे विरोध प्रदर्शन आम तौर पर मंदी वाले सीज़न में होते थे.
चाय के ख़रीदार पहले ही कमी से जूझ रहे हैं. भारत में चाय की काफ़ी ख़पत होती है. जापान के कुछ सुपरमार्केट बताते हैं कि अगर सप्लाई शुरू नहीं हुई तो उनका स्टॉक नवंबर तक ख़त्म हो जाएगा.
जर्मनी में चाय आयात करने वाले एक शख़्स ने कहा कि इस चाय के अब लिमिटेड एडीशन पेय बनने का ख़तरा लग रहा है.
अगर प्रदर्शन कल ख़त्म हो जाए और मजदूर काम पर लौट आएं तो भी खेती के पटरी पर लौटने में एक महीना लग जाएगा.
चाय के बागान क़रीब दो महीने से खाली पड़े हैं. इतने समय में झाड़ियां ज़्यादा बढ़ गई हैं. चाय की पत्तियां तोड़ने से पहले मजदूरों को झाड़ियों की सफ़ाई करनी पड़ेगी.
स्पष्ट है कि अगर राजनीतिक गतिरोध इस महीने सुलझा लिया गया तो दार्जिलिंग के बागानों में अगले साल फिर बहार आएगी.
13 बागानों के मालिक संजय लोहिया कहते हैं, ''इस वक़्त यही लग रहा है कि दार्जिलिंग लिमिटेड एडिशन चाय बनने वाली है. लेकिन मैं इसके शौक़ीनों से अपील करूंगा कि वो हमारा साथ दें, हम जल्द सबसे अच्छी गुणवत्ता के साथ वापसी करेंगे.''
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