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यूपी में अमित शाह की नई 'सोशल इंजीनियरिंग'
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
लखनऊ के गोमती नगर जैसे पॉश इलाक़े से लगी गरीबों की एक कॉलोनी है- जुगौली. रविवार को इस कॉलोनी के लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक उनकी बस्ती को 'वीआईपी ट्रीटमेंट' क्यों मिलने लगा?
लेकिन दोपहर तक स्थिति स्पष्ट हो गई कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी, दोनों उपमुख्यमंत्रियों और कुछ अन्य मंत्रियों के साथ पार्टी के एक कार्यकर्ता सोनू यादव के घर पर 'लंच' के लिए आ रहे हैं.
ज़ाहिर सी बात है कि सोनू यादव और उनके परिवार वालों के लिए ये किसी आश्चर्य से कम नहीं था, मोहल्ले वालों के लिए कौतूहल से कम नहीं था और राजनीति पर नज़र रखने वालों के लिए ये एक नई 'सोशल इंजीनियरिंग' की कोशिश थी.
कौतूहल वाली बात
अमित शाह के तीन दिवसीय लखनऊ दौरे के पहले दिन विपक्षी दलों के विधान परिषद सदस्यों के इस्तीफ़े ने राजनीतिक हलचल पैदा की तो दूसरे दिन एक छोटे से कार्यकर्ता के यहां भोजन करने के फ़ैसले ने.
कौतूहल वाली बात ये थी कि ये राजनीतिक कार्यकर्ता सोनू यादव हैं और जानकारों के मुताबिक जातीय समीकरणों के राजनीतिक महत्व वाले इस राज्य में उनका 'यादव' होना ही तमाम संदेश देने में सक्षम है.
वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं, "यूपी में पिछले पचीस साल से यादव समुदाय समाजवादी पार्टी का कोर वोटर माना जाता है. लोकसभा और विधान सभा में मिली अप्रत्याशित जीत ने बीजेपी को तमाम नए प्रयोग करने और दूसरे राजनीतिक दलों को 'डराने' का आत्मविश्वास दिया ही है, सो वो कर रहे हैं."
स्थिति और मज़बूत करने की कोशिश
दरअसल, उत्तर प्रदेश में क़रीब 12 प्रतिशत यादव मतदाता हैं. जानकारों का कहना है कि 2014 में सभी ग़ैर मुस्लिम जातियों और समुदायों ने बीजेपी को वोट दिया था. उस समय ये सामाजिक विमर्श धरा रह गया कि कौन-सा जातीय समुदाय किस राजनीतिक पार्टी का कोर वोट बैंक है. समाजवादी पार्टी का सिर्फ़ पांच सीटों पर सिमटना और बीएसपी का पत्ता साफ़ होना इसका प्रमाण है.
ये मतदाता पार्टी में आगे भी बने रहें, बीजेपी इस कोशिश में लगी है. दूसरे, बीजेपी की इन कोशिशों को समाजवादी पार्टी में चल रहे पारिवारिक संकट ने और बल दिया है. जानकारों के मुताबिक शिवपाल यादव लगातार अमित शाह, नरेंद्र मोदी और आदित्यनाथ योगी की तारीफ़ों के पुल बांध रहे हैं और देर-सवेर एनडीए के कुनबे में शामिल हो सकते हैं, भले ही बीजेपी की बजाय जनता दल यूनाइटेड के रास्ते से आएं.
ऐसी स्थिति में बीजेपी को लगता है कि 12 प्रतिशत में यदि कुछ हिस्सा भी उनके पास आ गया तो उनकी स्थिति और मज़बूत हो जाएगी. कारण ये है कि अन्य तमाम पिछड़ी जातियों को वो अपनी ओर करने में विधान सभा चुनाव से पहले ही सक्षम हो चुके हैं.
हालांकि सुभाष मिश्र ये भी कहते हैं कि सोनू यादव के यहां ठीक उस तरह से भोजन करना जैसा कि अमित शाह ने दलितों या आदिवासियों के यहां किया, समझ से परे है. वो कहते हैं, "सामाजिक ढांचे को देखा जाए तो यादव समुदाय पिछड़े वर्ग में ज़रूर आता है, लेकिन न तो वो कभी अछूत रहा है और न ही उसकी सामाजिक हैसियत किसी तरह से कमज़ोर रही है. ऐसे में उनके घर पर ज़मीन पर बैठकर और पत्तल-दोने में भोजन करना सिवाए एक राजनीतिक नौटंकी के और कुछ नहीं है."
उल्टा दांव
वहीं एक राजनीतिक दल से जुड़े बड़े यादव नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "अति आत्मविश्वास से लबरेज़ अमित शाह को ये दांव उल्टा भी पड़ सकता है. यादव जाति कोई ऐसी नहीं है कि आप जैसे लोग उनके घरों में जाकर भोजन कर लेंगे तो वो कृतार्थ हो जाएंगे. देखा जाए तो इससे यादवों के आत्म सम्मान को ठेस पहुंची है. आप यादवों को उस सामाजिक स्थिति में पहुंचाना चाहते हैं जहां से निकलने के लिए दलितों को सदियों से संघर्ष करना पड़ा है."
जिस जुगौली मोहल्ले में सोनू यादव रहते हैं, वहां यादवों के और भी कई परिवार हैं. 'लंच प्रोग्राम' के बाद जब हमने ऐसे कुछ लोगों से बात की और ये जानने की कोशिश की कि इससे क्या यादव समुदाय का रुझान समाजवादी पार्टी से हटकर बीजेपी की ओर हो जाएगा, तो लोगों ने जवाब देने में तो संकोच किया, लेकिन उनका अंदाज़ ये साफ़ बता रहा था कि अभी इस 'सोशल इंजीनियरिंग' की सफलता में समय लगेगा.
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