You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नज़रिया: भारत को नवाज़ शरीफ़ नहीं, सेना की 'शराफ़त' चाहिए
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
क्या नवाज़ शरीफ़ की कुर्सी जाने से भारत की चिंताएं बढ़ेंगी? ये सवाल लोगों के ज़ेहन में आना स्वाभाविक है लेकिन ये भी सवाल पूछना ज़रूरी है कि उनके पद पर रहते दोनों देशों के बीच हालात कैसे रहे हैं?
नवाज़ शरीफ़ तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं लेकिन भारत के साथ संबंध में कभी कोई उत्साह शायद ही नज़र आया हो.
पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा के अनुसार प्रधानमंत्री कोई हो पाकिस्तान में सेना की ही चलती है. "बुनियादी बात ये है कि इस्टैब्लिशमेंट जो रही है पाकिस्तान की, इस्टैब्लिशमेंट का मतलब सेना से, वो कंट्रोलिंग सीट पर 1947 से है और वो आगे भी रहेगी चाहे प्रधानमंत्री कोई हो."
विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान मामलों के जानकार और पूर्व राजनयिक विवेक काटजू कहते हैं पाकिस्तान की सेना ही असल पावर रखती है. "हम अपने आपको तसल्ली दे सकते हैं कि भारत की पाकिस्तान की सिविलियन नेताओं से बातचीत हो रही है और सिविलियन नेता चाहता है कि रिश्तों में सुधार हो. लेकिन ये तसल्ली एक झूठी तसल्ली होगी क्योंकि पाकिस्तान की सेना भारत को एक स्थायी दुश्मन समझती है"
यूँ तो भारत की तरजीह लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित नेताओं से बातचीत करने की रही है लेकिन पिछले 70 सालों में पाकिस्तान में चार सेना जनरल सत्ता में रहे हैं -- अयूब ख़ान, याह्या ख़ान, ज़िया उल हक़ और परवेज़ मुशर्रफ. भारत को इन चारों से बात करना इसकी मजबूरी रही है.
अब धारणा ये बन रही थी कि पाकिस्तान सैन्य तख्तापलट का दौर ख़त्म हुआ और लोकतंत्र मज़बूत हुआ है. नवाज़ शरीफ़ तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो लगा अब उनकी पकड़ मज़बूत हुई है. लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार भारत की पाकिस्तान से दोस्ती के हर बार क़दम बढ़ाने से एहसास हुआ कि "असल सत्ता सेना के पास है"
विवेक काटजू कहते हैं कि इसके बावजूद नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने पाकिस्तान की तरफ़ काफी लचक दिखाई और नवाज़ शरीफ से दोस्ती का कई बार हाथ बढ़ाया. पहले मई 2014 में अपने शपथ ग्रहण के समय उन्हें दिल्ली बुलाया. इसके बाद जुलाई 2015 में दोनों नेता जब विदेश में एक बार मिले तो औपचारिक रूप से बातचीत दोबारा शुरू करने का फ़ैसला हुआ.
इस मुलाक़ात के बाद ये कहा गया कि बातचीत आतंकवाद हमले पर होगी और ये दिल्ली में दोनों देशों के सुरक्षा सलाहकारों के बीच मुलाक़ात से शुरू होगी. इसके बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाकिस्तान गईं और मोदी अचानक नवाज़ शरीफ के घर लाहौर पहुंचे.
विवेक काटजू के अनुसार प्रधानमंत्री की ये कोशिशें पाकिस्तान की सेना को पसंद नहीं आई. "उसके बाद तीन जनवरी 2016 को पठानकोट में आतंकी हमला हुआ. उसके बाद दोनों देश के संबंध बिगड़े जो आज भी बिगड़े हैं"
पाकिस्तान का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा ये पाकिस्तान का अंदरूनी मामला है. इसमें भारत या किसी दूसरे देश का दखल नहीं होगा. भारत की ख़्वाहिश कुछ भी हो, नवाज़ शरीफ़ के वारिस से भी उसे कभी न कभी बातचीत करनी होगी लेकिन राजीव डोगरा कहते हैं कि भारत को मालूम है कि सत्ता सेना के पास रहेगी.
राजीव डोगरा कहते हैं, "देखिए भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में उतार-चढ़ाव आता रहता है. लेकिन उनके बीच रिश्तों का एक धागा है वो कभी टूटता नहीं, लेकिन वहां की सेना हमेशा सुप्रीम होती है."
पिछले कुछ महीनों में नवाज़ शरीफ़ के सत्ता में रहने के बावजूद दोनों देशों के बीच रिश्तों में दरार सी है. भारत ने नवाज़ शरीफ़ से कहा था कि दोनों मुल्कों के बीच दोबारा बातचीत उसी समय शुरू होगी जब पाकिस्तान" सरहद पर घुसपैठ बंद करे, आतंकवादियों की मदद रोके". पाकिस्तान इनकी मदद से इनकार करता है.
फ़िलहाल तो भारत पाकिस्तान से बातचीत करने के लिए तैयार नहीं है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)