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19 बाघ और 14 तेंदुए के शिकार के बाद बाघों के संरक्षण में जीवन लगाने वाले जिम कार्बेट
- Author, तारेंद्र किशोर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
आम तौर पर हम पेशेवर शिकारियों का नाम नहीं जानते हैं. लेकिन 18वीं सदी (25 जुलाई 1875) में जन्मे भारत के इस एंग्लो-इंडियन शिकारी की इतनी ख्याति है कि एक बार रस्किन बांड जैसे मशहूर लेखक ने इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में उनकी लोकप्रियता से जुड़ा का एक दिलचस्प वाकया सुनाया था.
रस्किन बांड भारत सरकार की ओर से पदमश्री दिए जाने के मौके पर दिल्ली आए हुए थे तब उस समय एक मंत्री ने उन्हें बधाई देते हुए उनका हाथ पकड़ा और कहा, "कुमायुं के आदमखोर बाघों को मारने वाले शख़्स से मिलकर उन्हें बहुत खुशी हो रही है."
रस्किन बांड ने बताया कि वो मंत्री उन्हें जिम कॉर्बेट समझ रहे थे.
जिम कॉर्बेट की बहादुरी के क़िस्से
जिम कॉर्बेट के बहादुरी के क़िस्सों ने लोगों के मन पर कैसी उत्साहजनक छाप छोड़ी है, इसका अंदाज़ा इस एक वाकये से बख़ूबी लगाया जा सकता है.
कुछ साल पहले बीबीसी के रेडियो एडिटर राजेश जोशी ने जिम कॉर्बेट के साथ कई बार शिकार पर गए एक शख़्स दिवेन गोस्वामी से मुलाकात की थी.
दिवेन गोस्वामी ने जिम कॉर्बेट की बहादुरी का क़िस्सा कुछ यूं बयां किया था.
उन्होंने बताया कि शिकार पर जिम कॉर्बेट के साथ उनके अलावा सिर्फ़ एक महावत जाते थे. मतलब कुल मिलाकर सिर्फ़ तीन लोग आदमखोर बाघों और तेदुओं के शिकार पर निकलते थे.
एक बार दिवेन गोस्वामी जब शिकार पर जिम कॉर्बेट के साथ थे तब एक बाघ एक भैंस का शिकार करने वाला था. तभी कॉर्बेट ने आवाज़ की और बाघ का ध्यान अपनी ओर खींचा और सीधे बाघ के सिर के बीच में गोली मारी. बाघ वहीं ढेर हो गया.
आदमखोर बाघों का शिकारी
जिम कॉर्बेट ने अपनी पूरी ज़िंदगी में 19 बाघ और 14 तेंदुए मारे थे. इसमें चंपावत की वो मशहूर आदमखोर बाघिन भी शामिल है जिसने आधिकारिक तौर पर करीब 436 से ज़्यादा लोगों की जान ली थी.
इसके अलावा रुद्रप्रयाग का वो तेंदुआ भी इस सूची में शामिल है जिसने केदारनाथ और बद्रीनाथ जाने वाले हिंदू तीर्थ यात्रियों को 10 साल से ज़्यादा समय तक आतंकित कर रखा था.
लेकिन इसके बावजूद बाघों के संरक्षण के लिए उत्तराखंड के नैनीताल में उनके जैसे मशहूर शिकारी के नाम पर जिम कॉर्बेट बाघ अभ्यारण्य खोला गया.
दरअसल जिम कॉर्बेट बाद के दिनों में वन्यजीव संरक्षक बन गए थे और अपनी इस नई भूमिका में भी उन्होंने बाघों का बचाव उतनी ही शिद्दत से किया जितने जुनून के साथ उन्होंने आदमखोर बाघों का शिकार किया था.
जिसे अभी हम जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के नाम से जानते हैं वो पहले हेली नेशनल पार्क था और यह जिम कॉर्बेट के प्रयासों से ही 1936 में तैयार हुआ था.
बाद में जिम कॉर्बेट के सम्मान में 1957 में इसका नाम बदल कर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क कर दिया गया.
शिकारी से हमदर्द बनने की कहानी
जिम कॉर्बेट दुनिया के अकेले ऐसे शिकारी होंगे जिन्होंने पहले आदमखोर बाघों से इंसानों की ज़िंदगी बचाई और फिर ताउम्र इंसानों से बाघों की ज़िंदगी बचाने में लग गए.
लेकिन ये कोई चमत्कार नहीं था और ना ही हृदय परिवर्तन जैसा कुछ. जिम कॉर्बेट ने अपनी चर्चित किताब 'मैनईटर्स ऑफ़ कुमाऊँ' में ख़ुद में आए इस बदलाव की चर्चा की है.
वो लिखते हैं कि जब उन्होंने मारे गए बाघों की लाशों की जांच की तो पाया कि ये आदमखोर बाघ कुछ ख़ास तरह की बीमारी या फिर पहले से लगी चोटों से ग्रस्त हैं. इनमें से कुछ घाव तो गोलियों से हुए थे और कुछ घाव साही (एक कांटेदार जानवर) के कांटों की वजह से हुए थे.
उन्होंने लिखा है, "बहुत संभव है कि लापरवाही में चलाई गई गोली से कोई बाघ जख़्मी हुआ हो और उसके बारे में पता नहीं चला हो. यह भी हो सकता है कि किसी साही का शिकार करते हुए वो बाघ चूक गया हो और साही के कांटे से उसे जख़्म हो गया हो. वो बाघ इसके बाद आदमखोर बन गया हो."
इससे वो इस नतीजे पर निकले कि जख़्मी बाघ धीरे-धीरे आदमखोर बन जाते हैं. इसलिए उन्हें आदमखोर बनने से रोकने का सबसे बेहतर तरीका उन्हें गोलियों के जख़्म से बचाना है.
कॉर्बेट के नज़रिए की जरूरत
पूरी ज़िंदगी कुमायुं के पहाड़ों में बिताने के बाद जिम कॉर्बेट देश की आज़ादी के बाद कीनिया चले गए थे जहां 79 साल की उम्र में साल 1955 में उनकी मौत हो गई थी.
दुनिया के 60 फ़ीसदी बाघ भारत में पाए जाते हैं और साल 2006 से बाघों को संरक्षित करने के लिए भारत सरकार की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं. बजट में बाघों को बचाने के लिए मोटी रकम भी आवंटित की गई.
इसके बाद से बाघों की संख्या बढ़ी है लेकिन पिछले दो सालों में बाघों की मौत के मामले में रिकॉर्ड वृद्धि देखी जा रही है.
पिछले साल 2016 में 120 बाघ मारे गए थे तो अभी हाल ही में वन्यजीवों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि इस साल अब तक भारत में 67 बाघों की मौत हो चुकी है.
ऐसे में जिम कार्बेट की विरासत को समझे जाने की ज़रूरत है.
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