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नज़रिया: 'सीबीआई को दिए जाते हैं राजनीति से प्रेरित मामले'
- Author, एनके सिंह
- पदनाम, पूर्व संयुक्त निदेशक सीबीआई, बीबीसी हिंदी के लिए
एक परेप्शन (समझ) तो आज है कि सीबीआई का इस्तेमाल विरोधी दल के नेताओं के ख़िलाफ़ किया जा रहा है.
जहां भ्रष्टाचार का अभियोग हो, वहां जांच जरूर होनी चाहिए. लेकिन सीबीआई को लेकर इन दिनों प्रश्न ज़्यादा उठ रहे हैं.
एक पूर्व सीबीआई अधिकारी होने के नाते मुझे दुख होता है कि इसकी वजह से सीबीआई की साख पर असर हो रहा है.
एक समय था जब सीबीआई निष्पक्षता के लिए जानी जाती थी. इसमें (पूर्व प्रधानमंत्री ) लाल बहादुर शास्त्री का बहुत योगदान था.
सीबीआई डायरेक्टर
उन्होंने सीबीआई की स्थापना ही नहीं की थी बल्कि उसकी परंपराएं तय करने में भी उनकी बड़ी भूमिका थी.
मोरारजी देसाई और वीपी सिंह के समय में भी निष्पक्षता और योग्यता के लिए सीबीआई का नाम हुआ.
लेकिन इधर जो लोगों के मन में संदेह है, उसका कारण ये है कि जब सीबीआई के डायरेक्टर अनिल सिन्हा का रिटायरमेंट हुआ, उनके बाद स्पेशल डायरेक्टर और वरिष्ठतम अधिकारी आरके दत्ता को चार्ज दिया जाना था लेकिन दो-तीन दिन पहले उन्हें एमएचए (गृह मंत्रालय) भेज दिया गया और चार्ज गुजरात कैडर के जूनियर अधिकारी को दे दिया गया. हालांकि, निश्चित तौर पर वो योग्य अधिकारी हैं.
सीबीआई का इस्तेमाल
उसके बाद आलोक वर्मा को सीबाआई डायरेक्टर बनाकर लाया गया. उनको सीबीआई तो दूर एंटी करप्शन का अनुभव नहीं है.
मुझे दुख है कि वो निष्क्रिय निदेशक बनकर बैठे हैं. इससे लोगों का संदेह बढ़ा है. लोकपाल बना तो सीबीआई के लिए कुछ सेफ़गार्ड की व्यवस्था की गई.
कार्यकाल और नियुक्ति के दिशा-निर्देश तय हुए ताकि वो निष्पक्ष होकर काम कर सके लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
लेकिन जब तक राजनीतिक समर्थन न हो ऐसे प्रावधान होने के बाद भी सीबीआई का इस्तेमाल हो जाता है.
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट
लोकपाल अभी तक कार्यान्वित नहीं हुआ है. लोकपाल का अगर गठन हो जाता तो जितने राजनीतिक भ्रष्टाचार से जुड़े मामले हैं वो उनके पास जाते और वो फ़ैसला करते.
मैं जानना चाहता हूं कि आख़िर सरकार क्यों चुप बैठी हुई है?
लोकपाल अगर बना दें और सारे सेफ़गार्ड के साथ सीबीआई बराबर में हो तो शायद ये परेशानी नहीं होगी और सीबीआई निष्पक्षता के साथ काम कर पाएगी.
सीबीआई की चार्टर ऑफ ड्यूटी तय है. मैं बड़े अदब के साथ कहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट भी सीबीआई को जांच के आदेश दे देते हैं.
सीबीआई ऐसे मामलों के लिए नहीं बनी है. कानून व्यवस्था या सामान्य अपराध से जुड़े मामले सीबीआई का काम नहीं है.
सीबीआई का काम है भ्रष्टाचार के मामले और पेचीदे केस को देखना लेकिन उसे ज़्यादा से ज़्यादा काम दिया जा रहा है. उन्हें राजनीति से प्रेरित मामले दिए जाते हैं.
सीबीआई के लिए जो काम निर्धारित हैं, एजेंसी के पास उन्हें करने के लिए भी वक़्त नहीं है.
इससे स्वाभाविक है कि फ़ाइलों का बोझ बढ़ेगा और सीबीआई की कार्य क्षमता पर असर पड़ेगा. सीबीआई को वही काम दिए जाने चाहिए जिसके लिए उसका गठन हुआ है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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