नज़रिया: भारत के विभाजन के बाद मुसलमानों पर सबसे बड़ा संकट

    • Author, शकील अख़्तर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अगले हफ्ते भारत के राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है.

इस राष्ट्रपति चुनाव में दोनों ही प्रमुख उम्मीदवारों का संबंध दलित समुदाय से है. यह बात तय है कि देश का भावी राष्ट्रपति दलित होगा.

सामाजिक बराबरी की लड़ाई में दलित समुदाय की यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है.

दलित सदियों से चले आ रहे भेदभाव, अपमान और अत्याचार के ख़िलाफ़ जूझ रहे हैं. उन्हें आज भी सामाजिक नफ़रतों और भेदभाव का सामना करना पड़ता है, लेकिन राजनीतिक रूप से वह पहले की तुलना में काफ़ी शक्तिशाली हुए हैं.

स्वतंत्रता से पहले उन्हें भीमराव अंबेडकर जैसे विचारक और नेता मिले, जिन्होंने दलितों की छिनी हुई गरिमा और सामाजिक समानता के लिए एक असामान्य आंदोलन का नेतृत्व किया.

इस आंदोलन को कांशीराम जैसे नेता ने दलितों में राजनीतिक जागरूकता की लहर से एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया.

आरक्षित होने से...

आज भारत की संसद में किसी भी समय 530 सदस्यों में से लगभग 100 सदस्य दलितों और जनजाति समुदाय से आते हैं.

भारत की अधिकांश विधानसभाओं में भी दलितों के लिए सीटें आरक्षित हैं.

शैक्षिक संस्थानों और नौकरियों में दलितों के लिए सीटें आरक्षित होने से वे अब शिक्षा और रोजगार में भी आगे आए हैं.

भारतीय समाज में दलितों की एक नई पीढ़ी उभर रही है. यह नई युवा पीढ़ी विश्वास से लबरेज़ और राजनीतिक रूप से जागरूक है और नेतृत्व करने के लिए बेचैन है.

दलितों के बाद देश के दूसरे सबसे बड़े अल्पसंख्यक मुसलमान हैं.

भारत में मुसलमानों की आबादी लगभग 14 प्रतिशत है. शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आधार पर वह अब देश में सबसे पीछे हैं.

उनकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हालत एक जैसी नहीं है.

हिंदू राष्ट्र बनाने की अवधारणा

भाजपा के सत्ता में आने के बाद मुसलमानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. उन्हें केवल भीड़ के हाथों हिंसा का ही डर नहीं है, सरकार ने अवैध बूचड़खानों को बंद करने के नाम पर और पशुओं के क्रय-विक्रय के नए नियमों से मुसलमानों की एक बड़ी आबादी को एक झटके में बेरोजगार कर दिया है.

सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर राष्ट्रवाद की लहर जारी है. मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणित संदेश पोस्ट करने और टिप्पणियों की एक व्यवस्थित श्रृंखला चल रही है.

सत्तारूढ़ भाजपा हिंदू समर्थक पार्टी है. वो हिंदुत्व की राजनीतिक और धार्मिक विचारधारा में विश्वास रखती है. कई विश्लेषकों का मानना ​​है कि वह देश को एक हिंदू राष्ट्र बनाने की अवधारणा का पालन कर रही है जिसमें मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यक समुदायों के लोग दूसरे दर्जे के नागरिक होंगे.

भाजपा की नज़र में मुसलमान

मुसलमानों ने शुरुआत से ही भाजपा का विरोध किया है. अब जब कि भाजपा अपने बल पर सत्ता में है, उसने मुसलमानों को पूरी तरह ख़ारिज ही नहीं, बल्कि सीमित भी कर दिया है.

विपक्ष बेहद कमजोर और पूरी तरह छितराया हुआ है.

राष्ट्रवाद के इस दौर में मीडिया सरकार समर्थक हो चुका है. भाजपा का राजनीतिक प्रभाव बढ़ता जा रहा है और विपक्षी दल कोई सैद्धांतिक या राजनीतिक चुनौती बनने की बजाय अपने शेष अस्तित्व को बचाने की कोशिश कर रहे हैं.

कई मुसलमानों का मानना ​​है कि उन्हें विभाजन के बाद अब तक के सबसे गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है.

लेकिन कई विश्लेषकों का मानना ​​है कि यह सिर्फ मुसलमानों का नहीं देश के उदारवादियों और लोकतंत्र समर्थक बहुमत का संकट है.

'मुसलमानों की एक अलग राजनीतिक पार्टी'

ब्रिटिश पर्यवेक्षक और सांसद मेघनाद देसाई ने अपने एक लेख में लिखा है कि भारत के 18 करोड़ मुसलमानों को अपना अधिकार पाने के लिए अपनी एक अलग राजनीतिक पार्टी बनानी चाहिए.

मुसलमान भारतीय लोकतंत्र में हमेशा मुख्यधारा के राजनीतिक दलों या सामुदायिक धारा से जुड़े रहे हैं.

इन राजनीतिक दलों ने मुसलमानों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया और उन्हें गरीबी और पिछड़ेपन में धकेल दिया.

हालांकि ऐसे कठिन दौर में भी मुसलमानों का रवैया हमेशा सकारात्मक रहा है. मुसलमानों ने अपने अलग राजनीतिक दल की अवधारणा को कभी स्वीकार नहीं किया.

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह पहला मौका है जब देश की संसद में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व सबसे नीचे है.

मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश है, जहां सत्तारूढ़ दल के विधायकों में एक भी मुसलमान नहीं है.

मुस्लिम विरोधी पार्टी?

मुसलमान भाजपा को एक हिंदुत्ववादी और मुस्लिम विरोधी पार्टी समझते आए हैं और भविष्य में उनकी इस सोच को और भी मजबूती मिल जाएगी.

वह भाजपा को केवल अपने लिए नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र के लिए भी ख़तरा मानते हैं.

देश में मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का जिस तरह का माहौल बना है, इस माहौल में देश में हर जगह मुसलमानों में बेबसी, घबराहट और बेचैनी फैली हुई है.

हर तरफ बहस छिड़ी हुई है. एक युवा दलित नेता ने कुछ दिनों पहले कहा था कि मुसलमानों को ऊपर लाने के लिए एक अंबेडकर की जरूरत है.

शायद इन्हीं बेचैनियों में कोई अंबेडकर या कांशीराम पैदा हो जो भारत के ख़तरे में घिरे हुए लोकतंत्र की चुनौतियों में भारतीय मुसलमानों का राजनीतिक मार्गदर्शन कर सके.

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