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चीन क्यों रोक देता है कैलाश मानसरोवर यात्रा?
कैलाश मानसरोवर की यात्रा को लेकर चीन ने आपत्ति की है. आम तौर पर ये माना जाता है कि कैलाश मानसरोवर एक भारतीय तीर्थस्थल है लेकिन यहां जाने के लिए चीन की सीमा में प्रवेश करना होता है.
चीन जब चाहे भारतीय तीर्थयात्रियों का रास्ता रोक सकता है और परमिट कैंसल कर सकता है. चीन का क्या असर है इस यात्रा में, ये बता रहे हैं कैलाश यात्रा कर चुके एक यात्री. उन्होंने अपना नाम उजागर न करने की शर्त पर ये जानकारी दी है. पढ़िए, उन्हीं के शब्दों में उनका अनुभव.
कैलाश मानसरोवर मैं तीन बार गया हूं. दो रास्ते हैं. एक सिक्किम के रास्ते से होकर और दूसरा नेपाल के रास्ते से आप कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर सकते हैं.
इसके अलावा उत्तराखंड के पिथौरागढ़ के ज़रिए भी रास्ता है, लेकिन वो रास्ता बेहद लंबा है.
ज़्यादातर लोगों को लगता है कि कैलाश मानसरोवर भारत में होगा जबकि ऐसा है नहीं. आप समझिए कि आप नेपाल से जाएं या सिक्क्मि से जाएं आपको चीन का बॉर्डर पार करना ही पड़ेगा.
सरहद पार करने के बाद पांच दिन यात्रा करके आप मानसरोवर पहुंचते हैं जहां दायचिंग बेस कैंप है. वहां से फिर आपको तीन दिन मानसरोवर की परिक्रमा करने में लगते हैं.
फिर वापसी में पांच दिन और लगते हैं. तो ये समझ लीजिए कि चीन जब चाहे, जहां चाहे, इस यात्रा को रोक सकता है.
एक तो बॉर्डर पर ही वो यात्रियों को रोक सकता है और इसके बाद यात्रियों के जत्थे को अपनी सीमा में जहां चाहे रोक कर वापस कर सकता है. क्योंकि ये सामान्य कानून है कि आप जिस देश में हैं उस देश के क़ानून का आपको पालन करना ही पड़ेगा.
मानसरोवर की यात्रा कठिन होती है. बर्फ़ीले रास्तों पर चलना होता है. चीन में सरहद पार करने के बाद आप बस या कार से यात्रा करते हैं और फिर पहुंचते हैं दायचिंग के इलाक़े में जहां बेस कैंप है.
कई बार चीनी अधिकारी आपको मानसरोवर झील के पास कैंप करने से भी रोक देते हैं और कहते हैं कि कैंपिंग कहीं और करें.
ये सब उनके अधिकार क्षेत्र में है. वो मौसम ख़राब होने की बात कह कर भी यात्रा को बाधित कर सकते हैं. चीन और भारत में इस यात्रा को लेकर संबंध सहज रहे हैं लेकिन कई बार दोनों देशों के संबंधों का असर इस यात्रा पर देखने को मिल जाता है.
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