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ब्लॉग: मैंने कितनी बार अपने पति को नहीं पीटा
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
"कई बार तो सिर्फ़ गहरी सांस लेकर छोड़ दी. मन में एक से 10 तक गिनती की. गुस्से को आने से पहले ही फूंक दिया.
पर कई बार उबाल इतना था कि मुट्ठी भींची, अपने ही नाख़ूनों से हथेलियों में गड्ढे बना दिए और फिर भी आग ठंडी नहीं हुई तो बाथरूम में बंद होकर अपना ही सर दीवार में दे मारा.
इतना कुछ किया पर अपने पति पर हाथ नहीं उठाया.
जबकि मेरे पति के लिए ये बहुत आसान था. मेरे ही क्यों, लाखों करोड़ों पति अपनी पत्नियों को पीटने से नहीं हिचकते."
वसुधा ने बाएं हाथ की मुट्ठी फिर भींच ली थी. चेहरा तमतमा रहा था. माथे पर पसीना चमक रहा था.
दाएं हाथ में एक रिपोर्ट थी जिसमें लिखा था- 33 देशों के एक नए सर्वे में पता चला है कि भारत समेत दस और देशों में 'घर में पत्नी को मारना सही है' ऐसी सोच पिछले एक दशक में बढ़ी है.
मैंने रिपोर्ट वसुधा के हाथ से ले ली, तो वो फिर धारा प्रवाह बोलने लगी.
"कल बॉस से झगड़ा हुआ था, मेरी तनख़्वाह नहीं बढ़ाई थी, बल्कि मुझसे जूनियर आदमी के सामने मुझे जलील किया.
ऐसे मन से जब घर पहुंची तो देखा नौकरानी नहीं आई थी. खाना नहीं बना था, बरतन गंदे थे.
मैंने कहा खाना बाहर से मंगा लें, तो पति बोले इतना कमाती हो क्या?
मन तो किया कि भद्दे चुटकुलों को चरितार्थ कर बेलन उसके सर पर दे मारूं.
कहूं कि पैसे बचाने की इतनी ही ज़रूरत है तो खुद बना लो ना खाना, मैं बहुत थकी हूं.
पर जो बॉस की बद्तमीज़ी नहीं सहती, अपने पति की सह गई. इतना ही नहीं खाना भी बनाया. क्योंकि सोचा शायद उसका दिन भी बुरा बीता हो.
और मुझे अपने दफ़्तर का गुस्सा घर पर निकालने का कोई हक़ नहीं.
उसका मूड इतना ख़राब हो तो अक़्सर व्हिस्की पी लेता है.
पहले सोचती थी जाने दो, उसका मन शांत हो जाएगा.
पर वो बुरे से और बुरा हो जाता है. ख़र्चे की बात को हमारी बेटियों से जोड़ देता है.
'दो हो गईं हैं, अब इन्हें पालो फिर पता नहीं तीसरी भी बेटी ही पैदा हो गई तो...
तुम्हारी तरह किसी के गले बांधनी पड़ेगी.'
उफ़! ऐसी भाषा उसने शादी से पहले कभी इस्तेमाल नहीं की.
मन किया एक खींच के उसकी खुरदरी दाढ़ी वाले गाल पर फ़ौरन जड़ दूं.
कह दूं, गले में फांसी की तरह तो तुम बंधे हो, इन दो बेटियों की ख़ातिर झूल रही हूं.
और अपना स्पर्म सही चुनो ना, मुझे क्यों कोसते हो... वगैरह वगैरह..
पर नहीं बोलती, क्योंकि मैं भला इतना कड़वा कैसे बोल सकती हूं.
नशे में की गई बात को इतनी संजीदगी से लेना भी नहीं चाहिए ना, अगली सुबह सब ठीक हो जाएगा.
पर सुबह से पहले रात होती है. नशे में उसकी मर्दानगी बेशर्मी की हद पार करना चाहती है.
वो मुझे सोने नहीं देता, बिस्तर में भी उसकी खुशी और आराम ऊपर है.
मैं क्यों नहीं रोकती? जब थकी हूं और उसकी बातों और बर्ताव पर प्यार नहीं सिर्फ़ घिन आ रही है?
क्यों ख़ुद को पत्थर सा बनाकर, ग़ुस्से को दबाकर उसे वो सब करने देती हूं जो वो चाहता है?
जब उसके छूने से बदन में प्यारी सी सिहरन नहीं सिर्फ़ कंटीले दर्द का अहसास होता है.
क्योंकि मैंने उसे चुना है, ये प्रेम विवाह था, मुझे उसमें प्रेम बनाए रखना है.
शायद शारीरिक संबंध के इस नाटक में कहीं दबा-छिपा वो पुराने गहरे लगाव का अहसास मिल जाए.
ये मेरी ज़िम्मेदारी है. मैंने मम्मी-पापा से लड़कर शादी की थी.
शहर में पली-बड़ी, आज़ाद ख़्याल, नौकरीपेशा नए ज़माने की औरत जो अपने फ़ैसले ख़ुद लेना चाहती है.
जो नहीं चाहती थी कि जैसे हक़ से उसके पिता अक़्सर अपने दोस्तों के बीच अपनी पत्नी का मज़ाक बना देते थे, कभी हाथ उठा देते थे, वैसा हक़ वो अपने पति को दे.
लेकिन मेरे ख़ुश मिज़ाज, आज़ाद ख़्याल ब्वॉयफ़्रेंड ने पति बनकर वो हक़ छीन ही लिया.
कभी हाथ नहीं उठाया पर और जो कुछ किया उसने मुझे अंदर से घायल कर दिया है.
गुस्सा आता है, बहुत आता है. सपने में उसे बहुत सुनाया भी है. पर असलियत में ये सब पी जाती हूं."
वसुधा बोलती जा रही थी, मानो ये उसका सपना हो, मानो मैं वहां हूं ही नहीं.
इसीलिए रोकना ज़रूरी था ताकि जो बात वो ख़ुद से कह रही थी, मुझसे कह रही थी, अपने पति से कहे.
उसे रोका, हाथ में रिपोर्ट थमाई और कहा, "एक बार पति को तो बताकर देखो कि कितनी बार मन होते हुए भी उसे क्यों नहीं पीटा".
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