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क्यों अमरीका और भारत एक दूसरे के लिए हैं ज़रूरी ?
- Author, शिल्पा कन्नन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तीन देशों के दौरे पर निकले मोदी रविवार को अमरीका पहुंचे हैं. वहां रहने वालों भारतीयों से मुलाक़ात करने के बाद वो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से मुलाकात करेंगे.
दोनों देश विश्व में चरमपंथ के और दक्षिण एशियाई देशों के साथ अमरीका के संबंधों पर भी चर्चा करेंगे. जिन बातों पर चर्चा होगी उनमें दोनों देशों के बीच व्यापार संबंध भी हैं.
ट्रंप के 'मेक अमरीकी ग्रेट अगेन' स्लोगन और अमरीकियों को नौकरियों में प्राथमिकता देने की बात के बाद भारतीय व्यापार जगत में भी काफी हलचल है.
कई कपड़ा व्यापारियों को लगता है कि अमरीका में अब उनकी मांग कम होने वाली है और वो चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी अपने अमरीका दौरे के दौरान इस पर भी चर्चा करें.
अमरीका में अपना सामान निर्यात करने वाले एक व्यवसायी का कहना है कि अमरीका अपने आयात शुल्क को ख़त्म करे या कम करे.
अमरीकी ग्राहकों के लिए हम भारत में तैयार किए सामान को एक विकल्प के तौर पर पेश करना चाहते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि हम चीन से बेहतर सामान बनाते हैं.
हम मानते हैं कि हमारे दाम थोड़े अधिक हो सकते हैं लेकिन हम भविष्य में अपने दाम कम करने की कोशिश कर रहे हैं.
अमरीकी व्यापार में एक बैलेंस बनने की कोशिश कर रहे ट्रंप के लिए ये एक चिंता का विषय है.
बीते साल अमरीका ने भारत के साथ 24.3 अरब डॉलर के घाटे में व्यवसाय किया. भारत सरकार के अनुसार अमरीकी अर्थव्यवस्था पर असर डालने के लिए या एक छोटा सा आंकड़ा है.
लेकिन अमरीका इस दलील से सहमत नहीं है और यह मुद्दा मोदी की यात्रा के दौरान उठ सकता है.
भारत और अमरीका के बीच साल 2000 तक 19 अरब डॉलर का व्यापार होता था जो साल 2016 में बढ़ कर 115 अरब डॉलर हो गया.
लेकिन ट्रंप की नीतियों और भारतीयों के लिए एच 1 बी वीज़ा पर लगाम लगने के बाद अब अमरीकी बाज़ार तक भारतीय सामान और सेवाओं का पहुंचना थोड़ा मुश्किल हो गया है.
अमरीकी कंपनियों के लिए भी भारत में अपने पैर फैलाना आसान नहीं रह गया है. जहां फोर्ड और जेनेरल इल्क्ट्रिक्स जैसी कंपनियों को भारत में सफलता मिली है, वहीं ऐपल और वॉलमार्ट अब भी भारतीय बाज़ार में पैर जमा नहीं सकी हैं.
एक बाज़ार विशेषज्ञ के अनुसार, "मैं एक बड़ा उत्पादक हो सकता हूं और मेरे पास बेहतर तकनीक भी हो सकती है, लेकिन मुझे अपने सामान के लिए ख़रीदार चाहिए. मुझे लगता है कि अमरीका जैसे एक देश को इस मामले में भारत को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए."
वो कहते हैं, "पहले भारतीय दो हफ्तों में एक बार बाहर खाते थे अब हम हफ्ते में एक बार बाहर खाना खाते हैं. जल्द ही हम लोग तीन दिन में एक बार बाहर खाना खाने लगेंगे, वो दिन आने में देर नहीं... किसी और देश में ऐसा नहीं है. "
फास्ट फूड चेन कार्ल्स जूनियर बर्गर उन कुछ अमरीकी कंपनियों में से है जो भारतीय बाज़ार में उतरना चाहते हैं.
कार्ल्स जूनियर अपने बड़े बर्गर के लिए जाना जाता है और वेंडी, मैकडोनल्ड और बर्गर किंग जैसे कंपनियों का प्रतिद्वंदी है.
भारत में अमरीकी व्यापारियों के लिए बहुत कुछ है तो भारतीयों के लिए भी अमरीकी बाज़ार में बहुत कुछ है. उम्मीद है कि इसके लिए मोदी शायद ट्रंप पर दबाव बनाने की कोशिश करेंगे.
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