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ब्लॉग: क्या मस्जिदों के लिए लाउडस्पीकर ज़रूरी हैं?
- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के पश्चिमी शहर बरेली में कई मुस्लिम और हिंदू लोगों ने स्थानीय प्रशासन से रमज़ान के इस महीने में सहरी के समय रोज़ेदारों को जगाने के लिए लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध किया है.
इसके बाद अधिकारियों ने संबंधित मस्जिदों के इमामों को लाउडस्पीकरों की आवाज को मुनासिब हद तक कम करने का निर्देश दिया और कहा गया कि ऐसा नहीं करने पर उनकी मस्जिदों से लाउड स्पीकर हटा दिए जाएंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल के लिए एक गाइडलाइन तय कर रखा है. इसके तहत लाउडस्पीकर की आवाज़ की एक सीमा तय की गई थी.
लाउडस्पीकरों का शोर शराबा
इसके अलावा रात दस बजे से सुबह छह बजे तक लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल पर पांबदी लगी हुई है क्योंकि संविधान की धारा 21 के तहत चैन की नींद सोना नागरिकों के अधिकारों के दायरे में आता है.
बरेली में एक शिकायतकर्ता का कहना था कि उनके पिता दिल के मरीज हैं. पिछले साल उनका ऑपरेशन हुआ है. लाउडस्पीकरों के शोर शराबे से उनके पिता और 73 साल की माँ कई रातों से सो नहीं सकी हैं.
उनका कहना है कि चाहे वह मंदिर हो या मस्जिद, किसी को भी दूसरे के आराम में खलल डालने का कोई अधिकार नहीं है.
गैरमुसलमानों की दिक्कत
पिछले दिनों केरल से खबर आई थी कि मुस्लिम बाहुल मल्लपुरम में कुछ मस्जिदों ने अज़ान के लिए अपनी मर्जी से लाउड स्पीकरों का इस्तेमाल बंद कर दिया था ताकि स्थानीय लोगों, खासकर गैर मुसलमानों को दिक्कत न हो.
अब कुछ दशक पहले तक भारत के मौलवियों में यह बहस छिड़ी हुई थी कि लाउडस्पीकर पर अज़ान देना इस्लामी है या गैर इस्लामी. आज भारत के लाखों मस्जिदों में शायद ही ऐसी कोई मस्जिद हो जहां लाउड स्पीकर न लगे हों.
साल के ग्यारह महीनों में तो केवल अज़ान ही लाउड स्पीकर पर दी जाती है लेकिन रमजान के महीने में तो कई मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर तरावीह (एक ख़ास नमाज़) और नमाज़ें भी प्रसारित की जाती हैं. सुबह तीन बजे से ही लाउडस्पीकरों से रोज़ेदारों को पूरी ताकत से जगाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है.
मानवीय और धार्मिक कर्तव्य
मंदिरों में सुबह होते ही लाउड स्पीकरों पर भजन कीर्तन और प्रवचन (उपदेश) शुरू हो जाते हैं. धार्मिक प्रतिस्पर्धा और टकराव के इस दौर में लाउडस्पीकरों की आवाज़ और तादाद बढ़ गई है. लाउडस्पीकर अब धार्मिक टकराव और नफरत का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गए हैं.
उनका इस्तेमाल देश के अधिकतर नागरिकों के लिए एक बवाल बन गया है. आज की जटिल और दौड़ती भागती ज़िंदगी में धर्म और अध्यात्म का महत्व पहले से बढ़ गया है लेकिन इबादतगाहों में लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल ने आध्यात्मिकता के शांत माहौल को बेपनाह शोर से अस्त-व्यस्त कर दिया है.
धर्म शांति और प्रेम का संदेश देते हैं. लाउड सपीकरों की आवाज़ के शोर में यह संदेश तो कहीं खो गया, साथ ही लोगों की शांति भी अशांति में बदल गई है. अब समय आ गया है कि मस्जिद और अन्य धर्म स्थल इस हक़ीक़त को समझें कि धर्म और अध्यात्म की सेवा लाउडस्पीकर के बिना भी बेहतर तरीके से हो सकती है.
अगर लाउडस्पीकर से नागरिकों को तकलीफ पहुंच रही है तो उसे हटा देना एक मानवीय और धार्मिक कर्तव्य है.
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